कहीं न जाने वाले रास्तों पर !

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मौसम अब हथेली की तरह गर्म होने लगा है। सुबह का सूरज खिड़की पर आकर जगा जाता है। दोपहर भी कहती है,रुकना नही है लेकिन साँझ आते-आते मन किसी छोटे बच्चे सा बेचैन हो जाता है।

इधर गंगूबाई काठियावाड़ी देखने के बाद अचानक ही बेगम अख्तर से प्रेम बढ़ गया है। उन पर लिखी यतीन्द्र मिश्र की किताब मुझे नाराजगी भरी नजरों से देख रही है। बेगम साहिबा की ग़ज़लें रोज सुन लेता हूँ लेकिन कुछ किताब पढ़ने को भूल जाता हूँ।

तीन दिन से ये भी सोचता हूँ कि अपने सोसायटी के सिक्योरिटी गार्ड से कहूंगा,आपकी नई टोपी सुंदर है,इसमें आप किसी मेजर साहब से कम नहीं लगतें हैं, मुझे आपको सैल्यूट करने का मन होता है।

किसी दिन नीचें बरगद के पास जूते सिलने वाले से बताऊँगा कि आप हंसते हैं तो मुझे मेरे एक बाबा की याद आती है। लेकिन डर जाता हूँ कि कहीं जूते वाले नें हंसना रोक दिया तो?

इधर चलती राह मुझे रोककर जूस वाला मुझसे अपनी हालात बयां करता है। उससे भी आज तक कह नहीं पाता कि बीबी से झगड़ा न किया करे। प्रेम वो फल है,जिसका जूस कभी ख़तम नहीं होगा। लेकिन मैं डर जाता हूँ कि वो कहीं ये न कह दे कि शादी हुई होती तो आप ये ज्ञान नहीं देते।

इधर आजकल वो बड़ी शान से बताता है कि एक लेखक मेरी दुकान पर जूस पीते थे,आजकल वो बीएमडब्ल्यू से आते हैं,लेकिन गाड़ी से नीचें नही उतरते। इसके बाद उसकी भौहें चढ़ जाती हैं।

मानों मन ही मन वो कह रहा हो कि आप भी बड़े आदमी बनकर मुझे भूल न जाईयेगा। कल मैंनें उससे कहा, मैं ऑटो से आऊंगा आपके यहाँ। वो हंसता रहा था बड़े देर तक और कुछ देर तक भूल गया था, अपने सारे दुःख और गम।

इधर बड़ी दिन सोचने के बाद कल एक प्यारी सी लड़की से कह पाया,”सुनों,तुम अच्छा डांस करती हो। लड़की नें कहा,सच में ? और देर तक खुश रही थी पगली। अभी उससे कहना बाकी है कि तुमको नज़र न लगे पर नहीं कह पाया।

एक लड़का,जो मुझे रोज फोन करके पूछता है कि भैया मैं ऐसा क्या लिखूँ कि सबकी नजर में चढ़ जाऊं ? मैंनें उससे कहना चाहा है कि जो नज़र में चढ़ने के लिए लिखते हैं,वो बहुत जल्दी नज़र से उतर जाते हैं। तुम बस पढ़ो, लिखना अपने आप होता है। पर उससे भी कह नहीं पाया। शायद बहुत कुछ होता है,जो चाहकर भी कहना नहीं हो पाता।

इधर आज बड़े दिन बाद मैनें अपना ब्लॉग देखा है, ब्लॉग रो रहा है। उपन्यास क्या लिखा,दो हजार बाइस में एक भी नई पोस्ट नहीं आई है। ब्लॉग के पन्ने आहत हैं,ठीक वैसे ही,जैसे नई गाड़ी आने के बाद पुरानी गाड़ी आहत हो जाती है अपनी उपेक्षा से।

लेकिन कल ब्लॉग से कहा है कि तुम मेरा पहला ठौर हो,पहला ठिकाना। जल्दी आऊंगा, लिखूंगा वो सब,जो कह नही पाऊंगा किसी उपन्यास में,न ही किसी फिल्म में,न ही किसी अख़बार के कॉलम में।

पर कैसे ? इन दिनों ऐसा लगता है,ज़िंदगी किसी रिपीट मोड में बज रहे गाने जैसी हो गई है। हम रोज एक ही गाना सुन रहे हैं और खुश हो रहें हैं उन्हीं पुनरावृत्ति से जिनसे निजात पाने के लिए सारी जंग जारी है।

ऐसा लगता है इस जंग में हम खुद हथियार बन गए हैं। जहां,कई बार लगता है सब सुंदर तो है..पर उस वांछित सौंदर्य से मोहभंग भी हो जाता है। सोचता हूँ..कुछ दिन के लिए कहीं चला जाए..बहुत दूर। जहां रहने के लिए धरती हो,ताकने के लिए आसमान।

लेकिन कहाँ..मेरे सामने मेरी जिम्मेदारीयों का पहाड़ पूछ पड़ता है ? जावोगे कहाँ कितना दूर ? कहाँ जाऊंगा यही सोचते-सोचते रोज दूर तक जाता हूँ और जाकर लौट आता हूँ। वो दूर अब तक खोजा नहीं जा सका है।

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