भारतीय बुद्धिजीवी और ऑरगेज्म का बाज़ार !

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आजकल महुआ,आम,लीची ही रस से आच्छादित नहीं हैं..फेसबुक टाइमलाइन भी रसमय होकर फीमेल प्लेज़र और आर्गेज्म से आच्छादित हो चुका है।

एक पक्ष अपने मदन छतरी में सुख को अनुभूत करने के लिए उद्दत हो चुका है। एक जनता इसके आगे नैतिकता की तलवार लेकर खड़ी हो चुकी है।

इस धूप भरे दिन में छतरी लगाकर जब भी फेसबुक स्क्रॉल करता हूँ तो देखता हूँ,कोई न कोई बौद्धिक शीघ्रपतन का शिकार हो चुका है।

इधर दो दिन से एक भाई कह रहा,” आप क्यों नहीं लिखते अतुल .? इस संवेदनशील विषय पर आप जैसे युवा को लिखना चाहिए।

मैं कहता हूं,यही सब लिखवाएंगे हमसे..? मैं वैलिड नही हूँ…! लिख दूँगा तो घर वाले अगले दिन कह देंगे,गांव आकर घेंवड़ा की खेती करो..बम्बई रहने की जरूरत नही है।

फिलहाल मैं तो इसी चिंता में मरा जा रहा कि मेरी फ़िल्म की स्क्रिप्ट कब पूरी होगी ?

तीन दिन पहले गेंहू दँवा गया। अनाज घर आ गया लेकिन भूसा अब तक खेत से घर क्यों नहीं आ पाया..? ! आज ही रात को अगर आंधी-पानी आ गया तो दो गाय, एक बछिया क्या खाएंगी ?

इसलिए मेरे लिए ऑर्गेज्म फिलहाल भूसा हो चुका है… !

मैं देख रहा कि मेरे एक जानने वाले मित्र के लिए सबसे बड़ा ऑरगेज्म फिलहाल नौकरी बन गई है क्योंकि वो बहन की शादी में लिये गए लोन की emi और घर के खर्च से तबाह हो चुके हैं।

इधर कोविड में अपने पिता को खोकर आज तक रोने वाले एक दोस्त के लिए किसी अग्रज का वात्सल्य भरा स्नेह ही सबसे बड़ा ऑर्गेज्म बन चुका है।

अपनी माँ के कैंसर और आर्थिक अभाव से लड़ती एक परिचित लड़की के लिए मां के स्वस्थ हो जाने से बड़ा चरम सुख कुछ नहीं लगता।

एक बेरोजगार के लिए नौकरी,प्यासे के लिए पानी,भूखे के लिए भोजन और बीमार के लिए स्वास्थ्य से बड़ा ऑरगेज्म तो कुछ नही लगता।

ध्यान से देखिये तो ये ऑरगेज्म बड़ा ही सब्जेक्टिव मामला लगता है।

अपने आस-पास हैरान-परेशान लोगों की एक पूरी समानांतर दुनिया है। जिनके लिए सेक्स और ऑरगेज्म से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ और है।

ये लोग कितने प्रतिशत हैं। इसका डाटा न who के पास है न भारत सरकार के पास तो durex और मैनफोर्स के पास क्या होगा ?

लेकिन न जाने क्यों हम अपने सुविधावादी कोटरो में बैठे लोग अपनी इच्छा,अनिच्छा को एक सिद्धांत बनाने पर तुल जाते हैं। और इसके लिये हमें आंकड़ा भी मिल जाता है।

उन आंकड़ों में उलझकर हम नहीं जानते कि आंकड़े बाजारवाद के लिए एक टूल हैं… हमें असंतुष्ट करके खरीदार बनाने की साजिश हैं।

आप देखिये 70% महिलाओं को ऑर्गेज्म नहीं मिलता ये कौन कह रहा है..? एक कंडोम बनाने वाली कम्पनी न ? उसके टीवी एड देखिये।

वही कम्पनी कह रही है कि एक्स्ट्रा डॉटेड कंडोम का जमाना गया। अब और एक्स्ट्रा ribbed कंडोम लीजिये… ये नया intence महंगा वाला पैक लीजिये,इससे आपके फीमेल पार्टनर को ज्यादा प्लेजर मिलेगा।

इधर ब्यूटी प्रोडक्ट बेचने वाले कह रहे हैं..देश में अस्सी प्रतिशत लोग स्किन केयर करना नही जानते। कोई भी क्रीम लगा ले रहे हैं..कैसे गोरे होंगे भला ?

तो इसके लिए दिन में दो बार फेस क्लींजिंग करिये..? उसके लिये 300 का सालिसीलिक एसिड वाला क्लींजर लीजिये… उसके बाद टोनर लगाइये। तब मॉइस्चराइजर लगाकर सन स्क्रीन लगाइये…!फिर आपको पार्टनर मिलेगा और तब न ऑर्गेज्म मिलेगा ?

हवा बेचने वाले कह रहे हैं। ये कौन सा एसी लगा दिये गुरु ? एयर प्यूरीफायर वाला नया एसी लगाइये जो एलेक्सा और गूगल असिस्टेंट से कनेक्ट होता है…नहीं तो आपके बेडरूम की 70-% हवा जहर बन जाएगी।

अब बताइये, ये जहरीली हवा अंदर लेकर अगर बेडरूम में आर्गेज्म आपको मिल भी गया तो आप अंदर से कितने बीमार हो जाएंगे ? आपको पता है..?

साबुन वाले कह रहे हैं,अस्सी प्रतिशत लोग हाथ ठीक से नहीं धोते। फिर आपको ऑर्गेज्म मिल भी गया तो सेक्सुअल ट्रांसमिटेड डीजीज होने का खतरा कम होगा क्या ? सेक्स से पहले हाइजीन का ज्ञान जरुरी है।

पानी बेचने वाले बता रहे हैं..कितना प्रतिशत गंदा पानी हम पी रहें हैं। ऐसा गंदा पानी पीकर सेक्स करेंगे आप ?

आटा, चावल, तेल,मसाला,कोल्डड्रिंक,कपड़ा,जूता, साबुन और सेंट बेचने वाले अपने-अपने डाटा के साथ तैयार हैं।

लेकिन इन आंकड़ों से बाज़ार चलता है जीवन नहीं। जीवन में बहुत कुछ ऐसा है,जो इन बाजारू आंकड़ों से ऊपर है।

मैं बहुत ऐसे लोगों को जानता हूँ जो दर्जनों अवैध सम्बंध बनाकर डिप्रेशन और एंग्जायटी से भरी लाइफ जी रहें हैं। सैकड़ों हजारों लोग ऐसे भी हैं,जो जिस हाल में हैं, प्रसन्न हैं।

उनको देखकर लगता है कि खुशी स्टेट ऑफ माइंड है। प्रसन्नता और संतुष्टि खोजने वाला एक आदमी के साथ भी खुश रह लेगा,न रहने वाला दर्जनों उन्मुक्त सम्बंध बनाकर भी फ्रस्ट्रेट रहेगा।
क्योंकि शारिरिक हो या मानसिक इंसान की ख्वाहिशों का अंत नही है।

अब देखिये…जिन पश्चिम देशों की महिलाओं के उन्मुक्त सेक्स जीवन को हमारे यहां आदर्श बताया जाता है। और मेट्रो सिटी में धुँआधार फॉलो क़िया जाता है। वहां आजकल ‘स्प्रिचुअल सेक्स’ और ‘स्लो सेक्स’ की बातें की जा रही हैं।

हमारे यहां ऑर्गेज्म पता नहीं। सेक्स ट्वॉय,जी स्पॉट, ए स्पॉटऔर क्लीटोरल स्ट्यूमलेसन जैसी बेसिक बातें जनता जानती नही,उधर वो कह रहे हैं कि महिला के लिए ऑर्गेज्म से ज्यादा intence फीलिंग तो squirting होता है।

ब्रिटेन की एक स्प्रिचुअल लेखिका और सेक्स एक्पर्ट का मैं एक दिन एक ब्लॉग पढ़ रहा था ,वो कह रही थी उन्मुक्त सम्बन्धो नें इंसान को मतलबी बनाकर असंतुष्ट बना दिया है।

अगर सुख महसूस करना है तो सबसे ज्यादा सुखदायी है orgasmic meditation

यानी संभोग को मेडिटेशन की तरह करिये,इससे आप परम आनंद को प्राप्त होंगे। फिर आपकी प्यास ख़तम हो जाएगी।

कुछ नें तो बकायदा इस आर्गेज्मिक मेडिटेशन को स्लो सेक्स का नाम देकर किताब भी लिख मारी है। कुछ नें ये सब सिखाने के लिए बाकायदा कोर्स लांच किया है।

इसमें ऑरगेज्म की तलाश में भटकते लोग शामिल हो रहें हैं।

भारत में लोग इसका नाम भी नही जानते। जानते तो झट से कहते,अबे बन्द करो, ये आर्गेज्मिक मेडिटेशन कुछ और नही, बल्कि ये तो संभोग के परिप्रेक्ष्य में विज्ञान भैरव तंत्र का वही सूत्र है जो शिव नें मां पार्वती को दिया था। ये तंत्र है। भारत की आध्यात्मिक विरासत।

Tantra
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लेकिन अज्ञानता हमारी। बेसिक बात जानते नहीं,तंत्र सेक्स क्या खाक जानेंगे।

बात वही है कि तरह-तरह के आंकड़े, रिपोर्ट और सर्वे मौजूद हैं। आपको खुश करने वाले,आपको दुखी करने वाले। आपको सन्तुष्ट करने वाले और असंतुष्ट करनें वाले।

किसको पकड़कर जीवन चलाना है आपके ऊपर है।

सेक्स जीवन है या जीवन ही सेक्स है। किसी एक के साथ प्रेम और सहयोग,सामंजस्य जरूरी है या किसी के साथ सम्बंध। ये आपके ऊपर है।

जीवन किसी एक फार्मूले और एक सर्वे और एक आंकड़े से नही चलता।

ऑरगेज्म भी मनुष्य का दैहिक अधिकार है। लेकिन उससे कहीं ज्यादा जीवन में प्रेम,संवाद,सामंजस्य और सहयोग जरूरी है। बिना उसके सब बेकार है।

लेकिन दिक़्क़त यहां इसी बात की है कि हम पोर्न देखकर सेक्स करना सीख रहे हैं और सिनेमा देखकर प्रेम करना।

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