इमोशन का जन-धन एकाउंट !

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पिछले दो-तीन पोस्ट पढ़कर एक मित्र नें कहा कि इतना ह्यूमर कहाँ से लाते हो भाई ? मैनें कहा,”जनधन एकाउंट में जमा किया है,जब-तब निकाल लेता हूँ।

मित्र मुस्करा रहें हैं। उनका भी क्या दोष ? आजकल शब्दों का इतना राजनीतिकरण हो गया है कि जनधन से उनके दिमाग में मोदी जी का ही ख़्याल आ रहा है। जबकि मैनें जिस जनधन की बात कही है,उस जनधन में जन का आशय जनता से है। यानी कि जो जितना जनता से जुड़ा रहेगा,हयूमर उतना ही आता रहेगा।

हयूमर लानें के लिए लेखक होना ज़रूरी नहीं है। न ही जनता से जुड़ने के लिए भारतीय जनता पार्टी ज्वाइन करने की ज़रूरत है।बस थोड़ा सा व्यक्तित्व को खोलने की ज़रूरत है। ध्यान से देखिये तो हम सब धीरे-धीरे बन्द होते जा रहें हैं। कई बार ऐसा लगता है कि अनावश्यक रूप से हम सबको गम्भीर बनानें की एक भयानक साजिश चल रही है और हम सब असहाय हो चुके हैं।

वरना मोबाइल से सर निकालकर आज भी आस-पास नज़रें घुमाइए तो चट्टी-चौराहों पर हयूमर की चलती-फिरती दुकानें घूम रहीं हैं। ऐसे-ऐसे हयूमर लानें वाले पड़े हैं कि बड़े-बड़े व्यंग्य लेखक और स्टैंडअप कॉमेडीयन की बुद्धि भूला जाएगी।

ऐसे रंगीले बुजुर्ग हैं कि न वो कपिल का शो देखते हैं,न ही उन्हें चार्ली चैपलिन का नाम पता है।लेकिन उनसे बात करनें पर पता चलता है कि हयूमर एक बाय डिफ़ॉल्ट सेटिंग है,जो उसी सिस्टम के इनबिल्ट मेमोरी में सेव रहती है,जिसका जन से जुड़ाव ज़्यादा होता है।

मुझे लगता है आज की टेक्नोलॉजी हमारी बाय डिफॉल्ट सेटिंग खराब कर रही है। हमें इस जन से दूर कर रही है। एक बड़ा वर्ग आत्मकेंद्रित होता जा रहा है।

हँसने और रोने के लिए हमनें जबसे इमोजी बना ली है। तबसे इन इमोजीयों के बोझ तले हमारी भावनाएँ फ़र्जी हो गई हैं और व्यक्तित्व बन्द हो गया है।

हाल ये है कि आज कोई चैटिंग में हँसते हुए इमोजी भेजता है तो उससे सच में पूछना पड़ता है कि भाई आप हंस ही रहे हो न ?

यानी एक तरह का संदेह पैदा हो गया है।

जबकि हम सब जानते हैं कि सच में रोना और सच में हँसना आदमी को थोड़ा और आदमी बनाता है।

मैनें बड़े-बड़े लोगों को बहुत हंसते और बहुत रोते देखा है।

मेरे एक मित्र थे बीएचयू में वो रागों का आलाप सुनकर रोने लगते थे। एक मित्र थे,जो इतने पत्थर दिल थे कि आलाप क्या दूसरे का विलाप सुनकर भी उन्हें रोना नहीं आता था।

कुछ लोग ऐसे भी मिले जो बन्द कमरे में भी हँस नही सकते थे,कुछ ऐसे थे जो सार्वजनिक जगह पर भी रोने से गुरेज नहीं करते थे।

ओशो नें रोने की बात पर एक जगह बड़ी सुंदर बात कही है। उन्होंने कहा है कि रोना कमजोर होना नहीं है। ये तो ऐसा ही है कि भाषा अब चूक रही है।व्याकरण अपने अर्थ खो रहें हैं।कुछ है जो अब मुंह से कहा नहीं जा सकता..इसलिए आंखों नें कहना शुरू कर दिया है।

अच्छा ! रोने के नाम पर दो घटनाएं याद आ गईं..

पहली घटना सन दो हज़ार पन्द्रह या सोलह की होगी।

बनारस में संकट मोचन संगीत समारोह चल रहा था। लन्दन से स्वतंत्र तबला वादन के लिए बनारस घराने के मूर्धन्य तबला वादक पंडित Sanju Sahai पधारे थे।

वो रात संगीत के तमाम छात्रों और बड़े-बड़े कलाकारों के लिए यादगार होने जा रही थी। इस यादगार रात के साक्षी होने के लिए बनारस घराने की कई पीढ़ियां जमीन पर बैठकर तबला वादन शुरू होने का इंतज़ार कर रहीं थीं।

पंडित जी मंच पर आ गए। पंडित धर्मनाथ मिश्रा नें हारमोनियम पर तीन ताल का लहरा संभाला। पंडित जी नें पेशकार शुरु किया। कायदा,टुकड़ा,परन,गत,फर्द औऱ चक्करदार पर चक्करदार। जनता एकदम स्तब्ध ! हर तिहाई पर हर-हर महादेव का शोर!

एक डेढ़ घण्टे तक ऐसा चक्कर चला कि आखिरी तिहाई का सम आते-आते पंडित धर्मनाथ मिश्र जी जैसे बड़े-बड़े लोग रोने लगे। बनारस के लिए ये भावनात्मक क्षण था। पंडित संजू सहाय को देखकर संगीत के इन सुधि जनों को बनारस घराने के संस्थापक पंडित राम सहाय से लेकर पंडित भैरो सहाय और पंडित शारदा सहाय जैसे वो गुणी लोग याद आ रहे थे,जिन्होंने अपना समूचा जीवन संगीत साधना में ही खपा दिया था।

तबला वादन ख़त्म हुआ तो दस मिनट तक हर-हर महादेव के जयकार से समूचा संकटमोचन पंडाल गूँज उठा। अगली सुबह अखबारों नें लिखा,

“आधी रात को चमका बनारस घराने का सूरज”

एक दूसरी घटना और है। 2018 का वो तीन दिसम्बर था। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जयंती पर सिवान जिले के पंजवार गांव में आखर का ‘भोजपुरीया स्वाभिमान सम्मलेन’ चल रहा था। रात के करीब नौ बज रहे थे। थोड़ी देर पहले मुम्बई से पधारे थे प्रख्यात फ़िल्म अभिनेता Pankaj Tripathi।

जनता में उत्साह था। इधर दूर-दूर से कार्यक्रम देखने आए तमाम लोग उनको सुनने और देखने के लिए उत्सुक हो रहे थे। ये वो समय था जब मिर्ज़ापुर सीजन एक का नशा सर चढ़कर बोल रहा था और बड़े-बड़े अख़बारों के मुख्य पृष्ठ पर कालीन भइया की फ़ोटो छपती थी।

थोड़ी देर में Sanjay भइया नें पंकज भइया को सम्मानित करनें और सम्बोधित करनें के लिए मंच पर आमंत्रित किया। सम्मान गुरु जी धनश्याम शुक्ल के हाथों होना था। गुरु जी नें माइक सम्भाल लिया। भोजपुरी में उनके मुंह से स्नेह और आशीर्वाद ऐसा बरसने लगा कि पंकज भइया खड़े-खड़े रोने लगे।

मैं नीचे जमीन पर बैठकर देख रहा था। ये बड़ा विलक्षण क्षण था।मैं सोच रहा था। एक आदमी जो अभी-अभी कालीन भइया जैसे क्रूर व्यक्ति का किरदार करके लौटा है,वो एक ऐसे बुजुर्ग की चार बात पर रोने लगा जिसने शायद ही उनकी कोई फ़िल्म कभी देखी होगी।

आख़िर क्या बात थी कि उस रात पंडित संजू सहाय रॉयल एल्बर्ट हाल लन्दन में भी ऐसा तबला न बजाए होंगे जो बनारस के उस मंदिर के प्रांगण में बजा रहे थे और पंकज त्रिपाठी भी राजीव मसंद,कोमल नाहटा और जयप्रकाश चौकसे की तारीफ़ पर कभी न रोए होंगे,जो उस रात एक बुजुर्ग की बात पर रो रहे थे।

ये वही अपने जन से अपनी माटी से जुड़ने की ताकत थी,जो उस रात को रूला रही थी। ये अपनी माटी और भाषा वाली बात थी।

एक रचनाकार के तौर पर मेरी भी यही ताकत है। ये ऐसी वैक्सीन है जिसके एन्टीबॉडी जीवन भर ख़तम नहीं होते हैं।

बस,मौका मिले तो आप भी लगा लिया करिये…

ये एकदम मुफ़्त उपलब्ध है 😊

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