व्यर्थ आवाज़ों की सार्थकता

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साँझ सवेरे खिड़की पर गौरैया,कबूतर आकर बोल जाते हैं। न जाने क्या, बहुत जल्दी-जल्दी ! कभी ख़ूब तेज आवाज़ में,कभी मद्धिम। कभी लगता है कोई मेरे ऊपर ताना मारकर चला गया,

“इतना देर तक कौन सोता है यार…?”

मैं ये दृश्य देखकर कंक्रीट के इन बियाबानों में असहाय महसूस करता हूँ। सोचता हूँ कि चलो कम से कुछ प्राणी तो हैं, जो सुबह-सुबह खिड़की पर आकर जगा जातें हैं।

लेकिन भाषा कितनी कमज़ोर है। विज्ञान भी कितना असहाय है। रोबोट को बोलना सीखा दिया लेकिन गौरैया सुबह-सुबह मेरी खिड़की पर क्या बोल रही है,उसके भाव का अनुवाद करनें वाला कोई गूगल ट्रांसलेटर नहीं बना पाया।

अगर ऐसा होता तो कितना अच्छा होता। मैं सुबह उठकर पूछ बैठता कि का हो का हाल बा ? “का हाल बा हमार गेंहू,चना और मसूरी के ?”

गौरैया कह देती, “ठीके बा बबुआ मोदी जी सगरी स्टेडियम अपना नावे लिखवा लिहलें। तहार आलू कोड़ा गइल,कोड़ा के आलू बेचा भी गइल। मंगर से गाँव में हनुमानजी मंदिर पर फगुआ गवाता.. “

फिर क्या ? इतना कुछ भोजपुरी में सुनकर मैं क्या किसी भी परदेसी का दिल आनंदित नहीं हो जाता ?

लेकिन ए करेजा,ई बम्बई है। हैरी पॉटर का हॉगवर्ट्स स्कूल नही। जहाँ पक्षी-जानवर,आदमी सब बोल-बतिया रहें हों।

अगर ऐसा होता तो सुबह-सुबह कबूतर आकर कह जाता, “सुतले रहबा गुरु,संझा से पेट्रोल सौ रुपया लीटर होखे वाला हौ..जाके टँकी फ़ूल कराला भाय!”

लेकिन अफ़सोस कि ऐसा असम्भव है। ऐसा सोचना व्यर्थ है।

जीव-जंतु जानवरों की आवाज़ें हमारे लिये व्यर्थ हैं..क्या काम हैं इनका ?

लेकिन पहले ऐसा नहीं था। आदमी नें जब गाना-बजाना नहीं सीखा था। भाषा और लिपि का उद्भव न हुआ था, तब इस तरह की ध्वनियों का सम्मान था। ख़ासकर संगीत में..

संगीत में सात स्वर, सात जीवों से लिये गए हैं..

यानी आकाश में छाते बादल को देखकर मोर जो ध्वनि निकालता है,वही सँगीत का ‘सा’ है। गाय जब अपने बछड़े से बिछड़कर मुँह से जो मार्मिक आवाज़ निकालती है,वही ऋषभ यानी ‘रे’ है।

झुंड में बकरी के मिमियाने की आवाज़ ही ‘ग’ है। शिकार न मिलने पर दुःखी होकर रोता बगुला “म” स्वर में रोता है।

बसंत ऋतु में धरती की आभा का बखान करती कोयल “पंचम’ स्वर ही बोलती है।

घोड़ा जब जोश में हीनहीनाता है,तब उसके मुँह से धैवत यानी “ध” स्वर निकलता है। और हाथी जब मतवाला हो जाता है, तब उसका चिंघाड़ना ‘नी’ यानी “निषाद” बन जाता है।

संगीत के कई ग्रन्थों में ये भी उल्लेख है कि कोयल दो या दो से ज़्यादा स्वर निकाल लेती है। सवाल उठता है कि पंचम के अलावा दूसरा स्वर कौन हो सकता है ?

मुझे लगता है पंचम के अलावा जरूर दूसरा स्वर जरुर ‘षड्ज’ या ‘गंधार’ होगा..

कोयल के पास “सा,ग, और प..होगा..यानी एक समूचा कॉर्ड।

आज भी हारमोनियम में ये तीन स्वर एक साथ दबाकर,बिना किसी मास्टरी के हज़ारों गीत गाए जा सकते हैं।

तभी तो कोयल संगीत की रानी है। पंचम स्वर ठहरा सुरों का राजा । कोयल उसकी मल्लिका है। आज तक लोक जगत किसी सुंदर स्वरधारिणी की तारीफ करता है, तो यही कहता है.

“अहा! कोयल जैसी आवाज़ पाई है इन्होंने…..”

लेकिन कोयल की प्रिवेलेज्ड श्रेणी से जरा बाहर निकलिए। बहुत सारे कवियों,कथाकारो नें बेचारी का महिमामण्डन कर दिया है। भला मेरी खिड़की पर बोलती मासूम सी गौरैया की आवाज़ का क्या.. ?

कुत्ते,बिल्ली की बात ही नहीं की है किसी नें। साहित्य जगत नें भी इन माइनरिटी से अन्याय किया है।

आजकल तो ऐसी बातें करना बचकानापन की श्रेणी में आएगा।

मैं भी ये पोस्ट लिखते समय डर ही रहा हूँ। लेकिन हमारे संगीत के शास्त्रों नें किसी के मुँह से निकली किसी भी किस्म की आवाज़ को व्यर्थ नहीं माना है।

वो कहता है कि जीव-जंतु आदमी की निरर्थक ध्वनियाँ व्यर्थ नहीं हैं। दरअसल इनकी ये भावव्यंजक ध्वनियाँ ही भाषा और संगीत की जनक हैं।

ये पशु-पक्षी जब भी अपने भाव को व्यक्त करतें हैं,तब एक विशेष प्रकार के “काकु” यानी interjectional cry से व्यक्त करतें हैं।

उदाहरण के तौर पर बिल्ली जब भूखी होती है,तब एक विशेष प्रकार की काकु से आवाज़ करती है.. वहीं जब उसे अपने बच्चों को दुलारना होता है, तब उसके काकू बदल जातें हैं। इसी तरह गाय अपने बछड़े को दुलारते समय जो ध्वनि करती है,वो भी एक विशेष काकु है,और वही बछड़ा जब बिछड़ जाता है ,तब उसके काकु बदल जातें हैं।

कालांतर में भावों के अनुसार बदलने वाले यही काकु ही भाषा और संगीत की उतपत्ति के आधार स्तम्भ बनें हैं।

वैसे मैनें सुना है कि प्राचीन काल की कई लोककथाओं और पौराणिक कथाओं में आदमी जानवरो और पक्षियों से बतियाता था… पंचतंत्र की सुंदर कथाओं और दादी-नानी की लोककथाओं को कौन भूल सकता है।

अपने यहां हो-हो हाउ-हाऊ जैसी निरर्थक आवाज़ का भी वैदिक महत्व है।

सामवेद के समय इस तरह के ध्वनि विकार को ‘स्तोभ-गान’ कहा गया है।

हमारे एमए संगीत में “स्तोभ गान” सिलेबस का हिस्सा था। मुझे याद नहीं मैनें क्या लिखा था। परीक्षा के बाद किसे याद रहता है।

लेकिन इतना याद है कि ये जो हाऊ-हाऊ,अररर,ओहा,हौहा, किस्म की आवाज़ें हैं इनके ऊपर आदरणीय ठाकुर जयदेव सिंह नें लिखा है कि ये ध्वनि विकार विश्व भर में एक हैं। ये अलग बात है कि हीगल कहता था कि ये व्यर्थ हैं।

लेकिन भारत की प्रांजल मनीषा कहती है कि नहीं,शब्दों के अभाव में मनुष्य पहले इन्हीं से काम चलाता था… आज भी सामवेद के बहुत से गान, स्तोभ गान ही हैं। जिसमे हाऊ-हाऊ की आवाज़ आती है..

आज भी तमाम लोकगीत सुनिए..भोजपुरी,अवधी, मैथिली,ब्रज बुन्देली या राजस्थानी,पंजाबी के गीतों में कुछ निश्चित ध्वनियाँ हैं..ख़ासकर लोरियों में.. हे, ओहो, अररर, लललल, ही आता है।

गाँव में भेड़, बकरी,भैंस,गाय से बतियाने के लिए पशु पालक इसी तरह की ध्वनियाँ निकालते हैं..मानों ये कोई आदिम भाषा हो,जिसे मनुष्य आज अपने विकसित काल में भूल गया हो।

बहरहाल..मैं ज़्यादा संगीतिक चिंतन पर विराम देकर यही कहना चाहता हूं कि गौरैया बोले या गधा…ये महत्वपूर्ण नही है।

महत्वपूर्ण यही है कि क्या हम इतने सजग हैं कि कौन हमारे आस-पास बोल रहा है,हम उसे सुन पा रहें हैं.. ?

शायद नहीं !

हम भीतर से इतने शोर में जी रहें हैं कि हमें ध्यान नही आता कि अभी हमारे आस-पास कौन-कौन बोल रहा है।

सम्भव है जब आप ये पोस्ट पढ़ रहें हों, तब आकर आपके छत पर गौरैया फूदक रही हो, दरवाजे पर गाय बोल रही हो..बगीचे में कोयल..

बस, एक गहरी सांस लेकर सुनिएगा जरा !

आपको हाउ-हाऊ की कसम।

सादर !

atulkumarrai.com

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