सादर प्रणाम
उम्मीद है आप जहाँ भी होंगे सकुशल होंगे..देखिये न आज आपके बनारस में सूरज दिल खोलकर निकला है,हवा पंख खोलकर बह रही है…पक्षी दिल खोलकर उड़ रहे हैं.कहीं दूर एक बांसुरी की आवाज शंख की गूंज से टकराती है,मानों शताब्दियों बाद दो सुषिर वाद्यों का मिलन हो रहा हो.मौसम खिला है..आपकी उजली और निश्छल हंसी की तरह लोग आज चैन की साँस ले रहे,मानों आप आज भारत के प्रथम स्वाधीनता दिवस पर शहनाई बजाकर नए सूरज का स्वागत कर रहें हों.पानी में नावें इस तरह से चल रहीं..उनकी आवाज सुनकर चौंक जाता हूँ.. ओह ..कहीं आपने चारुकेसी में आलाप तो नहीं छेड़ दिया.या उस्ताद अमजद अली खान के साथ मिलकर रघुपति राघव राजा राम बजा रहें हैं.? मेरी तबियत जरा नरम है.आजकल अक्सर ही रहती है.क्या कहूँ.
अभी घाट किनारे छत पर अखबार खोलकर बैठा हूँ..धूप सेंक रहा..आधा बनारस और आधा VARANASI NEWS आँखों के सामने है…लेकिन अफ़सोस ! मेरी आँखें नहीं खुल रहीं.ऐसा लग रहा जैसे किसी ने बनारस से सदा के लिए दूर कर दिया हो मुझे..अख़बार पलटते मेरे हाथ काँप रहे हैं..दिल पर हाथ रखकर तबसे सोच रहा.
अरे ! उनके हाथ कापें नहीं क्या ? जिन्होनें आपको अपने हाथों से सरे बाजार बेच दिया.उनकी आत्मा से आवाज नहीं आई क्या कि वो क्या करने जा हैं..? कि वो मात्र एक लकड़ी और चांदी से बनीं शहनाई नहीं बेच रहे हैं..वो शहनाई के साथ एक सभ्यता और समूची संस्कृति को बेच रहें हैं..जिस सभ्यता में सैकड़ों वर्षों के बाद कोई बिस्मिल्लाह खान पैदा होता है.
मेरा दिल बैठा जा रहा.ओह ! विश्वास नहीं होता उस्ताद की आज आपके नाती ने आपको अपने हाथों बेच दिया.
मुझे पता है आप भी यही सोच रहे होंगे..और मेरी तरह आपकी आँखें एक बार जरूर बन्द हो गयीं होंगी.
लेकिन मैं आपसे नाराज हूँ.मुझे शिकायत है आपसे बहुत.आप अभी मेरे सामने होते तो मैं आपसे पूछता कि आपने पूरे जीवन इतनी बड़ी गलती क्यों की..आप जीवन भर सिर्फ शहनाई ही क्यों बजाते रहे.? फकीरी में क्यों जीते रहे.?
आप चाहते तो हड़हा सराय की जगह कैलिफोर्निया में घर बनवा सकते थे..लल्लापुरा की जगह लन्दन में चाय पी सकते थे..रोज बाबा विश्वनाथ के नौबत खाने में बजाने की जगह व्हाइट हॉउस के किसी डिनर को संगीतमय कर सकते थे.कुछ नहीं तो पद्म पुरस्कारों की जगह अपने पांच बेटों और चार बेटियों के लिए नौकरी की मांग कर सकते थे.किसी नरसिम्हा राव,लालू यादव,मोलायम सिंह, कपिल सिब्बल,और न जाने कितने जो रोज आपके यहाँ आते थे.उनकी कॉलर पकड़ के कह सकते थे..कि “ए नेता जी..हम तुम्हारे इस चांदी की शहनाई का अँचार डालेंगे..देना ही है तो विधान सभा,लोकसभा,राज्यसभा का टिकट दे दो.”
उस्ताद आपको पता नहीं था शायद.आपको टिकट कोई भी दे देता..हाँ..क्योंकि आप उनके लिये एक शहनाई वादक से ज्यादा मुसलमान और मुसलमान से ज्यादा वोट बैंक थे.लेकिन अफसोस ! की आप आजीवन मुसलमान न हुए सिर्फ कलाकार ही रह गए.क्यों नहीं आपने भारत रत्न फ़ेंक दिया ये कहकर की “इसका क्या करूँगा..? दो वक्त का चूल्हा भी तो नहीं जलेगा इससे..देना ही है तो समूचे खानदान को कम से कम दो-चार पेट्रोल पम्प तो देते जाओ.”
उस्ताद यही गलती आपने किया है..आज दुनिया भर का रस अपने भीतर समेटी शहनाई..में अब उन्हें चाँदी,सोना और लकड़ी ही नज़र आने लगी है,आप नहीं..बिस्मिल्लाह खान के अंदर धन,यश,कीर्ति नज़र आ रही..उसके पीछे छिपा त्याग,समर्पण और तहज़ीब नहीं.आज मेरी तरह समूचा संगीत जगत स्तब्ध है…क्योंकि आज शहनाई के साथ थोड़ा बनारस भी बिक गया…आज चाँदी के साथ आपकी रूह,आपकी उजली मुस्कान भी गल गयी..आज आपके साथ मेरे जैसे कलाकार भी रो दिए.लेकिन आप चिंता न करियेगा आप ज़िंदा हैं अपनें करोड़ों चाहनें वालों के दिल में.
हाय ! लेकिन एक सवाल तो हमेशा ज़िंदा रहेगा.आप ऐसे क्यों हुए.. ? बस आज राहत इन्दौरी बड़े याद आ रहे.और आपके साथ उस्ताद अमजद अली खान भी.
ये ज़िन्दगी सवाल थी जवाब माँगने लगे
फरिश्ते आ के ख़्वाब मेँ हिसाब माँगने लगे
इधर किया करम किसी पे और इधर जता दिया
नमाज़ पढ़के आए और शराब माँगने लगे
सुख़नवरों ने ख़ुद बना दिया सुख़न को एक मज़ाक
ज़रा-सी दाद क्या मिली ख़िताब माँगने लगे
दिखाई जाने क्या दिया है जुगनुओं को ख़्वाब मेँ
खुली है जबसे आँख आफताब माँगने लगे












Ty sm Atul g. jo bhi h aap ki Kalam me jaan h.aap Banaras walao ko aise hi jagate rahe.hum Allah se aap k good future ki Dua krte h..
Atul Kumar Rai aap ne bahut hi umda aur sach likha h.lekin jab unke pariwar ka koi aadmi sahnai bech deta h to aap sub ko bahut taklif hoti h.lekin kabhi kisi ne itne mahan aadmi k pariwar walo ka kabhi koi haal chal liya ki wo kis tarah apni zindagi guzar rahe h.nahi hargiz nahi Q ki wo log musalman h.inko kaun puchega.inko to sirf Atankwadi kah kr zalil kiya jata h.aaj hamare jitne bhi Mahan purwaj the subka pariwar garibi aur dukho me ji raha h.Aap APJ Abdul kalam Veer Abdul Hameed Aur Ustad Bismillah khan ke pariwar palo ka haal dekh sakte h.is desh ka haal tab tak theek nahi ho sakta jab tak hum apne ko ganga jamuna tahzeeb wale kahne k bajaye .usper Amal kr k nahi dikhyenge.Aaj bhi mauka h ki hum Hindu muslim bhai bhai wali baat per Amal ker k zindagi guzare to is desh se sara ghagda khatm ho jaye…JAI HIND
सईद भाई..बहुत बहुत धन्यवाद..लेकिन विरासत को सम्भालना अपने आप में बहुत बड़ी चुनौती है..जिस चुनौती के कारण ही आज उस्ताद बिस्मिल्लाह खान से लेकर पंडित सामता प्रसाद मिश्र गुदई महाराज का खानदान अभी भी नाकामयाब है