सुख-दुःख की छोटी बातें

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घर से लौट रहा था। बेहिसाब गर्मी थी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय सेमेस्टर की परीक्षा ले रहा था। देख रहा ट्रेन पकड़ने के लिए लोग भाग रहें हैं। इधर जनरल डिब्बे का हाल इतना बेहाल कि यमराज भी अंदर आने से पहले सौ बार सोचें।

जैसे-तैसे डेढ़ पैर पर खड़ा हो गया।

ट्रेन भारतीय रेलवे की उसी पारम्परिक लय में चल रही थी,जहाँ ये तय करना मुश्किल था कि हम सुपरफास्ट में बैठे हैं या किसी सवारी गाड़ी में ?

खड़े-खड़े दो घण्टे हो रहे थे । अभी बनारस आने में समय था। पानी,चाय,पकौड़ी वाले आते तो थे लेकिन डिब्बे का हाल देखके बाहर से ही लौट जाते थे।

मैं उदास होकर सोच रहा था, “कहाँ फंस गया यार”?

भीड़,गर्मी,घर-परिवार और परीक्षा की चिंता से घिरा मन! ,यानी एक पल को जीवन इतना दुखदायी और बोझिल लगने लगा था कि धैर्य टूटने लगा था।

तभी अचानक सामने बैठे एक मजदूर पर नज़र जाती है। देख रहा उसके सांवले चेहरे पर सिवाय मुस्कान के कुछ नहीं है। मैं पूछता हूँ, “कहाँ जाएंगे भइया?”

वो धीरे से बोलता है,

“इलाहाबाद !
वहां क्या करतें हैं?
बालू निकालते हैं
बालू……! 45 डिग्री में ?
हं भैया
कब तक ?
सुबह 5 से 3 बजे तक
दिक्कत नहीं होती ?

दिक्कत कैसी ? इस साल टारगेट बनाए हैं कि कम से कम चालीस हजार कमा के लौटेंगे।”

इतना सुनने के बाद मैं चुप हो गया।

मानों मेरे सुप्त प्राणों में उम्मीद का ठंडा झोंका बह गया हो। मानों कोई निराशा के घने जंगल में टॉर्च जलाकर रोशनी कर रहा हो।

मैं बारी-बारी से कभी खुद के नकारात्मक विचारों और कभी मजदूर का चेहरा देखता हूँ।

देखता हूँ उसने क्या धैर्य और उत्साह पाया है और ख़ुद पर तरस खाता हूँ, “एक मैं हूँ ? जरा सी दिक्कत क्या हुई कि एक पल में संसार असार नज़र आने लगा।”

मैंनें मन ही मन उस मज़दूर को सलाम किया था। औऱ उसी दिन जान गया था कि हर आदमी बहुत महत्वपूर्ण होता है। अगर सीखने की कला विकसित की जाए तो एक साधारण आदमी इतना सीखा सकता है,जितना बड़े-बड़े प्रोफेसर नहीं।

लेकिन आज आपको एक साल पुराना किस्सा सुनाने का कोई और उद्देश्य नहीं था। बात तो बस ये थी कि कल से मेरे एक मित्र बहुत परेशान हैं।

पीजी हो गया,बीएड, टेट,नेट सब हो गया। पूछ रहे थे कि “प्रेम,कैरियर,
पढ़ाई का क्या होगा ?” कह रहे थे कि कभी-कभी लगता है जीवन में कुछ नहीं रखा है। बेकार है ये जीवन। दुःख बढ़ता ही जा रहा..”

मैंनें बड़ी ध्यान से देखा। उनको ही क्यों हर विद्यार्थी के जीवन में एक बार निराशा की बदली छाने ही लगती है। स्वभाविक है।

वो पूछ रहे थे, “अतुल भाई कैसे हैंडल करें.. ?”

मैंने उनको यही कथा सुनाई कि मैं यूनिवर्सिटी का स्टूडेंट होकर उस गर्मी में निराश हो गया था। और एक कम पढ़ा-लिखा मजदूर उस यात्रा में उत्साह से बातें करता रहा था।

कंडीशन एक थी,ट्रेन एक थी,चाल एक थी। लेकिन मुझे गर्मी दिख रही थी और उसे चालीस हज़ार रुपया दिख रहा था।

हम दोनों में बस देखने का यही फ़र्क था।

ये जीवन में कुछ और नहीं है मित्र..बस यही देखने का फ़र्क है।

ये सुख-दुःख कुछ और नहीं होता। ये बस एक स्टेट ऑफ माइंड है। चित्त की अवस्था है।जिसे हम अपने स्वभाव के अनुसार बना-बिगाड़ लेते हैं।

और इस बनाने-बिगाड़ने की सबसे बड़ी वज़ह कुछ और नहीं हैं। दोष हमारा भी नहीं है। दरअसल आज हम जिस माहौल में जी रहें हैं,वो बड़ा ही नकारात्मक है।

आज अगर भावों पर जरा नियंत्रण नहीं साधा गया तो कुछ भी हो सकता है। जरा सा होशियार न रहा गया तो आदमी डिप्रेशन का शिकार हो सकता है।

ठंडे दिमाग से सोचने वाली बात है कि युवा अवस्था में अगर हम बहुत छोटी सी बात पर खुश हो जातें हैं। थोड़ी सी दिक्कत आने पर दुःखी हो जातें हैं। झट से किसी के प्रेम में हो जातें हैं या झट से किसी को अपना दुश्मन समझ बैठते हैं।

ये सब अस्थिर चित्त के लक्षण हैं।

ये सब लक्षण बतातें हैं कि आप संवेदनशील और बड़ी भावुक हैं।लेकिन ये जरूरत से ज्यादा कोरी भावुकता,सिवाय मूर्खता के कुछ नहीं है।

और इस मनोवृत्ति को सुधारा न गया तो चाहें हम अमरीका के राष्ट्रपति क्यों न बन जाएं..हमें दुनिया कि कोई ताकत खुश नहीं कर सकती है

इसलिए कई बार लगा है कि आज टाइम मैनेजमेंट की तरह इमोशन मैनेजमेंट का होना भी आवश्यक है।

किसी को कैसे झट से निराशा आ जाती है? झट से कैसे लोग प्रसन्न हो जाते हैं। तुरंत किसी से प्रेम हो जाता है। झट से वो दुश्मन भी नज़र आने लगता है।

अरे! भाई – आप जिससे प्रेम करतें हों,जरूरी नहीं कि उसमें सारे गुण होंगे। कुछ कमियां तो हमेशा रह जाएंगी। लेकिन उसकी तमाम अच्छाइयों के साथ उसकी इन कमियों को स्वीकारना ही प्रेम का उदात्त पक्ष है।

आप जिससे नफ़रत करने लगें हैं। जरूरी नहीं कि उसके व्यक्तित्व में सिर्फ दोष ही हो। कुछ अच्छाईयाँ जरूर होंगी,जो आज भी सीखी जा सकती हैं।

यही तो जीवन के प्रति एक सकारात्मक मनोवृत्ति है। यही सन्तुलन है भावों का।

लेकिन आज समस्या है कि हर आदमी अपनी भावनाओं को संतुलित न करके चीजों को अपनी सुविधा और शर्त के अनुसार बदलना चाहता है।

प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे को बदल रहें हैं । पति अपनी पत्नी को,पत्नी अपने पति को,भाई अपने भाई औऱ बाप अपने बेटे को।

मैं कहूँ कि दुःख यहीं से शुरु होता है तो ये ग़लत न होगा।आर्थिक,शारीरिक दुःख की एक मियाद होती है। लेकिन इस अस्थिरता,अतिशय भावुकता से आदमी ताउम्र प्रभावित रहता है।

और मैं कहूँ कि इस पर नियंत्रण करने के लिए डिप्लोमा करने की जरूरत नहीं है।

इसका एक ही मंत्र है कि जीवन में आजीविका के अलावा जरा सा सृजनात्मक हो लिया जाए। कमाई-धमाई,पढ़ाई के साथ कुछ शौक पाल लिया जाए। लिखने, पढ़ने,घूमने और रचने का !

कुछ न हो तो किसी से निश्छल प्रेम कर लिया जाए..ये मानकर कि वो बदले हमें प्रेम नहीं करेगा।

कोई गीत सीख लिया जाए कि कभी अकेलेपन में गुनगुनाया जा सके। ये जानकर कि गीत में कुछ सुर-ताल इधर-उधर रह जाएंगे।

कोई कविता लिख ली जाए..ये सोचकर कि ये छपेगी नहीं,न ही इसे हिंदी की कालजयी कविताओं में शुमार किया जाएगा..

लेकिन आज तो आफ़त है। कल एक लड़का कह रहा था, अतुल भैया मेरे लाइक्स नहीं बढ़ रहे हैं। कैसे बढाऊँ ?

अरे! मेरे भाई, कैसे समझाऊँ तुमको। लाइक्स का अंचार डालोगे ? ये तो अहंकार तृप्ति का साधन भर है।

तुम लाइक्स के चक्कर में लिखने के सुख से वंचित मत रहो.. मत सोचो लोग क्या कहेंगे। वाह-वाह कहेंगे कि कमियाँ निकालेंगे।

जब भी दिल में कुछ उमड़े उसे उतार दो। रचने का सुख अलहदा है। कहीं गहरा है,बहुत जादुई है।

मैंने महसूस किया है कि कविता लिखी जाती है तो कविता पन्ने से पहले हमारे अंतर्मन के पन्ने पर उतरती है,तब जाकर शब्द संगीत बनतें हैं। गीत कण्ठ से पहले हृदय में बजतें है। चित्र कैनवास पर नहीं आत्मा के रंग में पहले रंगा जाता है।

मैंनें पाया है कि जब हम रच रहे होते हैं तो हम अपने अस्तित्व के सबसे करीब होते हैं।

और अपने अस्तित्व के करीब व्यक्ति, कुछ भी हो सकता है उदास और हताश नहीं हो सकता है।

मैं बस अपनी बात कहूँ तो दुनिया में किसी काम से ज्यादा मुझे संगीत और साहित्य नें आनंद दिया है।

और इस मनमौजी आनंद के कारण हानि ये हुई कि लिखने का क्रम नहीं बन पाया। जब मन किया लिखा,नहीं तो रहने दिया। जबकि फेसबुक के अलावा ट्वीटर और लिंक्डइन जैसे प्लेटफार्म पर भी हज़ार दो हज़ार लाइक्स मिल जातें हैं।

लेकिन नहीं। आज भी जबरदस्ती नहीं किया। जब तक रोज़ लिखने का मन नहीं करने लगेगा,नहीं लिखूंगा।

क्योंकि मेरा आनंद तो बस लिखने में है न कि लाइक्स में।

ऐसा होता तो आज तक किसी के इनबॉक्स में गया होता कि भैया मेरे पोस्ट पढ़ो और अपने वॉल पर शेयर करो,मेरी तारिफ़ करो।

लेकिन हिम्मत ही न हुई।

यहाँ तक कि लिखने के आनंद के चक्कर में ये भी भूल गया कि लिखने के दौरान बस लिखने का आनंद ही नहीं ,व्याकरण भी कोई चीज़ होती है। और मुझे वर्तनी के दोष भी अब सही करना चाहिए। 😊

लेकिन इससे बड़ी बात कि लिखने में मजा आया। मैं जानता था कि बात दिल से निकलेगी तो लोगों के दिलों में जरूर जाएगी। संयोग से गई भी और जाती भी रहती है।

इसी बीच कल किसी ने कहा कि अतुल आप लेखक टाइप आदमी है। संगीत पढ़ते हैं। तबला में पीएचडी करेंगे। कुछ दिन पहले मेज़र,माइनर कार्ड्स में उलझे थे। अब फोटोग्राफी करने लगे, और क्या-क्या करोगे..?

मैं तब चुप रहा था। कैसे कहता कि मुझे रघु रॉय नहीं बनना है। ये सही है,मैनें संगीत में पीजी किया,ये भी सही है कि मुझे संगीत में कुछ नहीं आता है।

लेकिन मेरे दोस्त- मैं कुछ भी करने लगूंगा। भरोसा न करो। क्योंकि मज़ा करते रहने में है। मज़ा अपनी सृजनात्मक शक्ति को बढ़ाते रहनें में है।

मजा ये देखने में है कि इसी सृजनशीलता नें मेरी संवेदनशीलता को बढ़ाया है और संवेदनशीलता ने भावुकता को। भावुकता से बड़ा नुकसान भी उठाया है। उठाता रहता भी हूँ,लेकिन जागरूकता ने मुझे संभाला भी है।

और बताया है कि जीवन का संतुलन बस ज्ञान और डिग्री और पैसे का संतुलन नहीं। वो विचारों और भावों का भी संतुलन है।

ये हमारी खुशी जब-जब वाह्य कारणों पर निर्भर रहेगी,तब-तब दुःख में पड़ते रहेंगे।

जरूरी है कि हम थोड़ा कम पढ़ लें,कम लिख लें,कम प्रेम-मोहब्बत कर लें। लेकिन भावों का संतुलन साधने की जरूरत कहीं ज्यादा है।

नहीं तो एक दिन आईएएस,पीसीएस,आईपीएस जैसी कठिनतम परीक्षा पास करके जीवन की परीक्षा में फेल होना पड़ेगा।

इसलिए मेरे उदास भाई – ये छोटा सा क्षणभंगुर जीवन बहुत धन,पद और यश से बड़ा नहीं,इन्हीं छोटी-छोटी बातों से बड़ा बनता है।

📸✍ – atulkumarrai.com

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