वर्चुअल और रियल वर्ल्ड की बैलेंसिंग समय की मांग

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यही सर्दी की एक साँझ थी। घड़ी साढ़े पाँच बजा रही थी। चाय की दुकानों पर भीड़ का उमड़ना जारी था। तमाम लोग टकटकी लगाए चूल्हे की तरफ़ देख रहे थे तो कुछ लोग अख़बारों के बिखरे पन्नों में खोए हुए थे। उधर चूल्हे पर चाय खौल रही थी और इधर दुकान के बाहर राजनीतिक बहस से लोगों का माथा उबल रहा था। 

तभी एक अज़ीज मित्र टकरा गए। सफ़ेद शॉल लपेटे,दाढ़ी बढ़ाए, हथेलियो को रगड़ते और हमसे नज़रें चुराते,बड़े दिन बाद वो मिले थे। मैनें इस कोविड काल में उनके स्वास्थ्य का हाल-चाल लिया। पूछा कैसे हैं आप ? आजकल दिखतें नहीं ? न कहीं बाहर,न ही कहीं सोशल मीडिया पर!

उन्होंने बताया,”अतुल भाई आपको तो ब्लॉक कर रखा है मैनें ! एक साल हो गए आपको पता नहीं चला ?”

‘ब्लॉक’ शब्द सुनते ही मुझे घोर आश्चर्य हुआ। मेरा माथा सिकुड़ गया। समझ में न आया कि मैनें ऐसी कौन सी ग़लती कर दी जो मेरे इतने अच्छे मित्र नें मुझे ब्लॉक कर दिया है। 

इसी संशय के बीच चाय आ गई। हम दोनों चाय पीने लगे। आख़िर जब रहा न गया तो मैनें पूछ ही दिया,काहें ब्लॉक किये भाई ? ऐसा क्या मैनें लिख दिया कि आपने बिन बताए ही ब्लॉक कर दिया ?

पहले तो वो हँसकर टालते रहे लेकिन बड़ी कुरेदने के बाद उन्होंने बताया कि आपकी एक दिन की एक पोस्ट मुझे अच्छी नहीं लगी। इसलिए मैनें ब्लॉक कर दिया है।

ये जानकर मुझे ताज्जुब हुआ। न मित्र की बात गले से उतरी न ही कुल्हड़ में बची चाय गले से उतरी। हम देर तक सोचते रहे कि इधर एक सालों से ये मित्र तो जब भी मिलते हैं,प्रेम से ही मिलतें हैं,मुझसे कोई शिकायत नहीं करते लेकिन आभासी दुनिया में इन्होंने मुझे एक साल से बिना बताए ब्लॉक क्यों कर रखा है ? ऐसे क्या कारण आए होंगे। आख़िर कहीं तो कहना था कि भाई ये तुम क्या लिख रहे हो।

मैनें देखा वो लजाए हुए थे। चेहरे से उनकी मासूमियत टपक रही थी और उस मासूमियत से मेरे भीतर सहानुभूति का एक ज्वार उमड़ रहा था। मामला संभालने के लिए उन्होंने बनारसी लहजे में कहा,” छोड़ा गुरु,चिंता जिन करा, हम और तू अच्छा दोस्त हईये हई,आवा अस्सी घाट बईठल जाव। “

ये सुनकर मैनें माथा पीट लिया। बहुत देर तक उनके साथ बैठे-बैठे ये बात समझ में न आई आख़िर कि ये कैसी दोस्ती है,ये कैसा प्रेम है जो सोशल मीडिया पर अलग है और इसके बाहर अलग है। हम किस ज़मानें में जी रहें हैं जहाँ तमाम लोग दो तरह का जीवन जी रहें हैं… एक सोशल मीडिया पर और एक उसके बाहर !

उस साँझ को मित्र तो कुछ कह न सके लेकिन मुझे एक ठीक एक ऐसा ही वाक़या याद आ गया। 

कुछ महीने पहले की बात है। एक व्हाट्सएप ग्रुप में जान से ज्यादा प्रेम करनें वाले मेरे दो आत्मीय लोग लड़ रहे थे। मैं दोनों को जानता हूँ। दोनों बेहद अच्छे,सुलझे और आमने-सामने एक दूसरे का सम्मान करने वाले लोग हैं।

लेकिन उस दिन उस व्हाट्सएप ग्रुप में अचानक दोनों लड़ पड़े थे। लड़ने का काऱण यही था कि तुमने फलाना की पोस्ट पर चिलाना के कमेंट को लाइक क्यों किया ? तुम घुरहू-कतवारू की पोस्ट पर जाते हो लेकिन मेरी पोस्ट पर क्यों नहीं आते हो ? उससे बड़ी बात ये कि तुम अभी और पढ़ो। तुमको घण्टा कुछ नहीं पता लेकिन ख़ुद को तीसमारखाँ का नाना समझते हो। और सुनों,फलाना नेता की बात सही है चिलाना की ग़लत,ये तुम कहोगे तो हम मानेंगे ? क्या हमारे पास बुद्धि नहीं है ? तुम बतावोगे की कौन सा नेता सही है और कौन सी पार्टी ग़लत है ?

मुझे ठीक तरह से याद है है कि तब ये धकाधक हो रही बहस बहुत देर तक चलती रही। एक से बढ़कर एक इमोजी का सहारा लेकर दोनों तरफ़ से तर्कों के तीर छोड़े जाते रहे।एक बार तो ऐसा लगा की बीच-बचाव करने के लिए मार्क ज़ुकरबर्ग को न आना पड़े। पांच-सात सौ तर्क वार के बाद जब अंत में निष्कर्ष कुछ न निकला तब एडमिन साहब नें थक हारके ग्रुप में ओनली एडमिन कैन सेंड मैसेज का ताला लगा दिया और कहा कि दस दिन तक ग्रुप में सैनिटाइजेशन का कार्य चलेगा इसलिए कृपया कोई मेम्बरान मैसेज न भेजें। 

इस सूचना के बाद तो इस वर्चुअल झगड़े का आनन्द ले रहे तमाम मेम्बरान के चेहरे बुझ से गए। उनका उत्साहित मन निराशा के भँवर में गोते लगाने लगा। 

लेकिन इसी बीच एक दूसरी घटना हुई। मैनें देखा ठीक दिन बाद एक सुबह वही दोनों मित्र फिर एक चाय की दुकान पर टकरा बैठे। उन्होंने नार्मल अंदाज में ऐसे बातचीत किया मानों कुछ हुआ ही न हो। लेकिन आदमी कितना भी होशियारी क्यों न करे आंखे तो सब कुछ बता ही देतीं हैं। मैनें देखा, दोनों में पहले वाली गर्मजोशी नहीं है।लिहाज और संकोच का एक आवरण है जो दोनों की आँखों में धीरे से उतर आया है। और दोनों उस दिन वाली बहसों को किनारे रखकर बड़े प्रेम से बात कर रहें हैं।

उस दिन मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ था। आज भी हो रहा है। शायद आपको भी हो रहा होगा।  क्योंकि ये घटना मेरे साथ ही नहीं हम सबके साथ कभी न कभी सोशल मीडिया पर घटित हुई है। और हमें समझ न आया है कि क्यों ऐसा हो रहा है ? मेरा ये दोस्त,मेरा ये परिचित सोशल मीडिया पर मुझसे अलग व्यवहार क्यों करता है और उसके बाहर अलग व्यवहार क्यों करता है ?

मुझे लगता है कि इस सवाल का जबाब अब खोजना ज़रूरी होता जा रहा है। दिन पर दिन मामले गम्भीर होते जा रहें हैं। सोशल मीडिया फैमली के फ़ोटो शेयर करने और जन्मदिन,सालगिरह मनाने से ऊपर उठकर अब एजेंडा सेट करने का खुला मैदान बनता जा रहा है। और इस ट्रैप में फंसकर लोगों का धीरज जबाब देता जा रहा है। हर आदमी सोच रहा कि जो वो सोच रहा है, बाकी लोग भी वैसा ही सोच रहें हैं। या फिर जैसा मैं सोच रहा,बाकी लोग भी वैसा क्यों नहीं सोच पा रहें हैं ?  या तो बाकी लोग मूर्ख हैं या शायद मैं ही ग़लत समय में पैदा हो गया हूँ।

यही कारण है कि सोशल मीडिया पर ज़्यादातर लोग आइडेंटिटी क्राइसिस के शिकार हो रहें हैं। सबको लग रहा है कि एक अजनबी आदमी अगर हमारी झूठी तारीफ़ कर रहा है तो वो सही है बाकी कोई अपना दिन-रात का मित्र अगर जरा सी भी आलोचना कर दे वो ग़लत है।

मुझे लगता है समस्या के मूल में यही है। और इसका समाधान हमारे ही पास है। आप हों या हम हों जब तक हमें लगेगा कि हम हमेशा सही हैं। तब तक ऐसे ही ब्लॉक-ब्लॉक का खेल चलता रहेगा और ऐसे ही चाय की दुकानों पर आंखे मिलने में शरमाती रहेंगी। 

हमें ये छद्म अहंकार का आवरण हटाकर इस बात को मानना ही पड़ेगा कि हम भी ग़लत हो सकतें हैं। हम से भी कुछ भूल-चूक हो सकती है या पोस्ट करने वाला तथ्यात्मकता रूप से सही हो सकता है, हमें एक बार फैक्ट चेक कर लेना चाहिए।

जिस दिन ये स्वीकरोक्ति ये जागरुकता उतपन्न हो गई,उस दिन न किसी को ब्लॉक करनें की नौबत आएगी न ही किसी से ब्लॉक होने की। न किसी चाय की दुकान पर किसी से नज़रें चुराने की।

इसके लिए बस थोड़ा सा हिम्मत की ज़रूरत है। ज़रूरत है थोड़े धैर्य की। ज़रूरत है सोशल मीडिया की इस आभासी दुनिया में लगे उस अहंकार के फ़िल्टर को हटाने की जो हमारी ओरिजिनलटी को हमसे छीन रहा है। जो हमसे हमको दूर कर रहा है।

याद रखें वो जो सोशल मीडिया के बाहर भी आपका अच्छा मित्र है,उससे सोशल मीडिया पर लड़ना और फिर बाहर आकर प्रेम से मिलना हमें एक व्यक्ति और एक मित्र के तौर पर संदेहास्पद और झूठा व्यक्ति बनाता है। 

हमें इससे बचना होगा। तभी इस आभासी दुनिया और उसके बाहर की दुनिया में एक संतुलन बन पाएगा।

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