विश्वनाथ धाम : अतीत की नींव पर भविष्य की काशी

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काशी विश्वनाथ धाम शुरू हुआ। कुछ मंदिर और घर क्या टूटे,मैनें देखा कि उन लोगों नें हर-हर महादेव कहकर चूड़ियाँ तोड़ लीं,जिनका धर्म नामक शब्द से मुकदमा चलता है।

कुछ लोगों नें प्राइम टाइम को रुदालियों से भर दिया। कुछ सहिष्णुता और प्रेम के ठिकेदारों नें अपने ब्लॉग और वेबसाइट में ये तक लिख दिया कि बस ज्ञान वापी मस्जिद टूटने ही वाली है।

मुझे ये पढ़कर और देखकर हँसी आई कि बौद्धिक पतन का इससे उच्चस्तरीय उदाहरण क्या हो सकता है। ?

लेकिन हँसी से ज्यादा आश्चर्य का भाव था कि जो अपने कार्यकाल में काशी के पर्याय बाबा विश्वनाथ के दरवाजे पर इसलिए झांकने न आए कि मदनपुरा के लोग नाराज़ हो जाएंगे,वो अचानक भक्त कैसे हो गए ?

जिनके पास खूबसूरत तारिकाओं के नृत्य-नाटिकाओं को देखने और महंगे-महंगे पत्थरों से अपनी मूर्ति बनाने के भरपूर पैसे थे,वो पन्द्रह सालों में काशी विश्वनाथ मंदिर का टूटा हुआ प्रवेश द्वार तक न बनवा न पाए। वो इतने श्रद्धालु कैसे हो गए ?

इससे भी ज्यादा आश्चर्य ये था कि वो बुद्धिजीवी जो मन्दिर जाने और दर्शन-पूजन करने वालों को बौद्धिक रूप से पिछड़ा मानते हैं,उन्हें अचानक धार्मिक लोगों की चिंता कैसे होने लगी…? अचानक से काशी का हिंदू प्रेम कैसे जाग गया…?

सवाल तो उठता है न कि सावन के महीने में जब इन सँकरी गलियों में उमड़ी बेहिसाब भीड़ में लोग गाजर-मूली की तरह ठूस दिए जातें हैं और तीन-तीन किलोमीटर लंबी लाइनों में सैकड़ों लोग गश खाकर गिर जातें हैं,तब ये प्रेम कहाँ चला जाता है ?

जब देवघर से दर्शन करके लँगड़ते हुए प्रयागराज के रामसुधी,बाबा विश्वनाथ मन्दिर पहुंचते हैं,और रविवार की शाम को लाइन लगाने के बाद उनका नम्बर सोमवार की शाम को आता है,तब ये प्रेम कहाँ चला जाता है ?

जब पक्का महाल,अगस्त्य कुण्ड और विश्वनाथ गली से लेकर ज्ञानवापी,लक्सा,मैदागिन,बेनियाबाग तक के लोगों का काँवरियों के शोर में निकलना और चाय पीना दूभर हो जाता है,तब लोगों की बौद्धिकता कहाँ चली जाती है ?

जब सावन के भेड़ियाधसान में आधा बनारस थम जाता है,तब दुःख क्यों नहीं होता ?

वास्तु शास्त्र में तो ईशान कोण यानी घर का उत्तर-पूर्वी कोना भगवान शिव का घर माना जाता है। लेकिन यहाँ तो सैकड़ों सालों से तमाम शिव मंदिरों को कब्ज़ा करके घर बना लिया गया था..? और तो और दुकानें खोल ली गईं थीं..छत पर जहाँ मन्दिर का शीर्ष निकलता था वहीं कुछ लोग पेशाब और शौच करने लगे थे ?

तब काशी की अस्मिता का सवाल क्यों नहीं उठाया गया ?

गलियाँ कूड़े से बजबजाती थीं..घाट पर खुलेआम लोग मूतते थे.. अधिसंख्य पुराने किले और मन्दिर जुआड़ियों और शराबियों के अड्डे बने थे तब आपका काशी प्रेम जाग्रत क्यों न हो सका था ?

लेकिन मैं जानता हूँ आप कुछ न कह पाएँगे..आपको अपने वोट की चिंता है। आप दशकों तक रामनगर से बनारस को जोड़ने वाली एक पुल न बनवा सके थे आप क्या बनारस पर बात करेंगे ?

विगत पांच सालों में आप ने एक ही सबसे बड़ी गलती की है वो हद से ज्यादा आप नकारात्मक हो उठे हैं।और कुछ लोगों को खुश रखने के चक्कर में आपने बहुसंख्यक जनता के हितों को ताक पर रख दिया है।

वो तो शुक्र है कि महात्मा गाँधी आपके समय काशी न आए,वरना उनके मन्दिर को चौड़ा करने और गलियों के विस्तारीकरण वाले बयान पर बवाल मच गया होता। और प्राइम टाइम में कोई उनको सबसे बड़ा हिन्दू विरोधी बता दिया होता।

लेकिन श्रीमान..आज आपको काशी से इतना प्रेम है और इसके हितों से इतना लगाव है तो सोचना चाहिए कि आज सावन में कुछ सौ लोग गश खाकर गिर रहें हैं,तो आने वाले बीस साल बाद कितने लोग गिरेंगे ?

आज दर्शन करने में चौबीस घण्टा लग रहा..तो क्या होगा 2050 में और उसके दो-तीन सौ साल बाद क्या होगा.. ?

क्योंकि आप और हम आज हैं।आज योगी और मोदी हैं…बाबा विश्वनाथ और काशी तो अविनाशी हैं। ये तो सदा रहेंगे।

अरे! सरकार को घेरने के लिए तमाम मुद्दे हैं..घेरिये आपको कौन रोकता है.. बहुसंख्यक से जुड़ा मुद्दा होगा तो हम भी आपके समर्थन में रहेंगे..लेकिन कृपा करके काशी विश्वनाथ धाम के नाम पर आम जन मानस की चिंता करते हुए प्रोपेगैंडा फैलाना बन्द कर दीजिये।

ये धाम बनवाने का काम तो आपको करना चाहिए था.. लेकिन आपने इसलिए न किया कि कुछ लोग नाराज हो जाएंगे..आपने उनके अहंकार तृप्ति को छोड़कर उनका कितना समाजिक और आर्थिक नुकशान किया है,आपको उसका अंदाजा है ?

आपको तो देश की आजादी के बाद ही बैठकर मंथन करना चाहिए था कि काशी के टुरिज्म सेक्टर को हम कैसे नए आकाश पर लेकर जाएं.. आज लाख लोग आते हैं आने वाले कुछ सालों में करोड़ लोग कैसे आएं इस पर कौन सी योजना बनाई जाए..?

जो दो दिन में बनारस घूमकर चले जा रहें हैं..उनको चार दिन कैसे रोककर रखा जाए…?

आपको तो सोचना चाहिए था कि यहाँ दिखाने और बेचने लिए क्या नहीं है..उसकी ग्लोबल ब्रांडिंग कैसे की जाए..मूलभूत सुधार कैसे किये जाएं कि दुनिया भर से लोग बार-बार आने के लिए विवश हो उठें।

आप तो जानते हैं न कि आज एक तीर्थ यात्री से सिर्फ सरकार का खजाना नहीं भरता..बल्कि राजेन्द्र प्रसाद घाट पर जूते में कील ठोकनें वाले से लेकर फूल बेचने वाले और माला बेचने वाले से लेकर, फेरी वाले,नाव वाले,ऑटो वाले,होटल वाले,चाय वाले,भांग वाले और ठंडई वाले सब उससे रोज कमाते हैं।

कोई किसी होटल वाला से ये नहीं पूछता कि आप किसको वोट देते हो..कोई फेरी और रेहड़ी वाले से ये नही कहता कि भाई किस जाति और धर्म के हो ?

आपको अपने मुस्लिम वोटों की बड़ी चिंता है,लेकिन आप भूल जातें हैं कि ये बाबा का दर्शन करने वाले और गंगा नहाकर आरती करने वाले तीर्थ यात्री ही आतें हैं तो मदनपूरा और सोनारपुरा से लेकर लल्लापूरा और सारनाथ में बनी बनारसी साड़ियाँ बिकती हैं..और कोई अब्दुल और कोई बदरुद्दीन मालामाल होता है। उसका बिजनेस बढ़ता है।

लेकिन आपने तो इनका भी नुकसान कर दिया है।

जरा ध्यान से देखिये आज दिन-दशा में हमसे छोटे सुविधाविहीन देशों ने कैसे अपने देश के टूरिज्म को बढ़ाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है।

आँख खोलकर देखिये जिन देशों के पास आपकी तरह समृद्ध सांस्कृतिक विरासत नहीं है,उन्होंने कृत्रिम विरासत बना दिया है। वो सबसे बड़ा होटल, सबसे बड़ा पार्क,सबसे बड़ी बिल्डिंग बनवा रहें हैं। कुछ नहीं है तो ऐय्याशी करवा रहे हैं और लगातार उस पर काम किये जा रहें हैं कि दुनिया हमारी तरफ आए और हमारा देश एक ग्लोबल हब बन जाए..

और एक आप हैं कि दुनिया आपकी तरफ आने को बेताब है और आप महज चंद वोटों की चिंता में मग्न हैं कि लोग नाराज न हों जाएं और हमारी कुर्सी न चली जाए..

अरे! आपके इस रवैये ने देश का कितना बड़ा नुकसान और समाज को कितना संकीर्ण बना दिया है आपको पता है ?

उठाकर देख लीजिए कि भारत के जीडीपी में पर्यटन का योगदान कितना है..और आप से कम औकात वाले देशों का कितना है।

यहाँ तक कि श्रीलंका जैसा देश भी इस मामले में हमसे आगे है। आज पर्यटन पर उनकी सरकार के विज़न का ही नतीजा है कि एक बौद्ध देश श्रीलंका ने हमारे हिन्दू प्रतीकों को इतना सहेजकर रखा है कि आप उन्हें देखकर लजा जाएंगे….

एक मुस्लिम देश इंडोनेशिया ने राम के प्रतीकों को इतनी खूबसूरती से अपनी आत्मा में बसाया है कि उसे देखकर आप अपने सेक्युलरिज्म पर डूब मरेंगे।

लेकिन पता न आप कब सुधरेंगे…

आज ईश्वर का शुक्र है कि पहली बार कोई सरकार इस विज़न पर काम कर रही है।

आज वो काशी विश्वनाथ धाम बनवा रही है तो उसने बौद्ध सर्किट पर भी काम किया है। वो रामायण सर्किट पर काम कर रही है तो उसने ताज महल का बज़ट भी पिछली सरकारों की तुलना में बढ़ा दिया है।

उसने नार्थ ईस्ट को पहली बार देश की मुख्य धारा में लाकर जोड़ दिया है,तो वो अयोध्या में दीवाली और वृंदावन में होली का आयोजन कर रही है और काशी में सन्त रविदास कॉरिडोर भी बनाने जा रही है। तो उसने मगहर में कबीर के समाधि स्थल को विश्वस्तरीय बनाने का बीड़ा उठा लिया है।

और सिर्फ यही नही सबका लाभ सोचने वाली कोई भी सरकार यही करेगी..

अरे! तीन किलोमीटर लंबी लाइनों को याद करके देखिए तो पता चलेगा कि काशी के इतिहास का खूबसूरत दिन होगा जब मां गंगा अपने शिव जी को सीधे-सीधे देख पाएंगी..

मेरे जैसे लाखों लोगों के लिए वो अविस्मरणीय दिन होगा जब लाखों लाख लोग बिना किसी दिक्कत के गंगा जी में स्नान करेंगे और सीधे जाकर बाबा का दर्शन करेंगे..

जब तंग गलियों की जगह पर चालीस हजार वर्ग मीटर में बने चौड़े-चौड़े रास्ते बनेंगे,संग्रहालय होगा, बहुउद्देश्यीय हॉल, मल्टीस्टोरी शौचालय भजन संध्या के लिए हॉल, योगा स्थल और मणिकर्णिका घाट पर ओपेन थिएटर गुलज़ार होंगे तव काशी ही नहीं इसका जर्रा-जर्रा राहत की सांस लेगा।

विश्वनाथ धाम का प्रस्तावित मॉडल

आज भले किसी को खराब लग रहा हो लेकिन किसी सोमारी को जल चढ़ाने वाली लाइन में खड़े अंतिम आदमी के चेहरे को देखिएगा,तो पता चलेगा कि हमारी आने वाली पीढ़ीयाँ इसलिए आभारी रहेंगी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विज़न की….योगी आदित्यनाथ के समपर्ण की…और अवनीश कुमार अवस्थी जैसे कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी की कि इन्होंनें काशी के एक असम्भव कार्य को सम्भव कर दिखाया है।

जहाँ बूंद की कमी थी वहाँ समंदर से भर दिया है।

और आने वाली पीढ़ी ही नहीं क्या पता किसी दिन तुलसी,रैदास और कबीर भी अपने इस आनंद कानन अविमुक्तेश्वर को देखकर खिलखिला उठें..और किसी महाशिवरात्रि को आचार्य शंकर ओंकारेश्वर की गुफा से काशी लौट आएं…और ललिता घाट की सीढ़ीयों पर बैठकर धीरे से कहें…

“अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
न चासंगतं नैव मुक्तिर्न मेय:
चिदानन्दरूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।”

अपनी बौद्धिक संकीर्णता से ऊपर उठिए महराज…शिव जी आपका भला करेंगे 😊🙏


Photos – http://Instagram.com/author.atul

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