“विरह के नांच” ( कहानी )

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hindi story by atul kumar rai
art by shekhar roy

भौजी खाना बना रहीं थीं.तब तक पड़ोस की गीता आ गयी..”ए भौजी.आज बड़ा उदास हो,का बात है.आज भइया के ढेर याद आवत है का.आँय’ ? भौजी बिन बोले रोने लगीं..गीता ने कंधे पर हाथ रख दिया.’ए भौजी चुप एकदम पागल हो का।अरे गये हैं तो आयेंगे न..काहें घबराती हो।”

ले देकर गीता ही तो उनकी एक सहेली थी.जिससे थोड़ी बहुत दिल की बातें हो जातीं थीं..भौजी कभी चिट्ठी लिखवा लेतीं थीं.कभी स्वेटर की डिजायन पूछ लेती थीं.कभी दुकान से कुछ माँग लेतीं थीं।

लेकिन आज भौजी को उदास देखकर.गीता से रहा न गया.उसने झट से कहा.”ए भौजी.का मुंह बना ली हो एकदम.एक बात बताना था..बतायें की नहीं ? यही सोच रहे.भौजी हाथ से आँख की गीले कोर को छूती हुई बोलीं..”कहिये बेबी जी.”..?

गीता ने कहने में देर न किया.अरे आज भिखारी ठाकुर के नाच आवत ह हो.चला सांझ के सब नाच देखे चलल जाई” भौजी उदास होकर चुप रह गयीं.कुछ न बोलीं.उनके लिये का नाच का बाजा अउर का भिखारी ?.उनके पीया परदेसीया क्या हुए.कोयल की बोली तक बरदास नहीं होती.नाच कवन देखने जाय।

लेकिन गीता भौजी से बताई की सारा गाँव जा रहा.चलो न.थोड़ा मन मिजाज बदलेगा सब जा रहे हैं.रोने से खेदन भइया दौड़ के थोड़े चले आयेंगे.अरे जब आना हुआ आयेंगे ही.क्या उनको तुम्हारी याद नहीं आती होगी…?लेकिन का करें मजबूर हैं।कौन अपने घर दुआर छोड़ परदेस में रहना चाहता है।अरे ! देखो तो आज सब नाच देखने जा रहे तुम भी.चलो न भौजी”

कितने दिन तो हो गए कोई नाटक नौटँकी देखे.तुम नहीं जाओगी तो हम भी नहीं जायेंगे कह दे रहे। गीता से अगाध प्रेम के कारण भौजी इस बात को टाल न सकीं.आखिरकार गीता ने भौजी को तैयार कर ही लिया.भौजी ने सोचा चलो मन. जब गांव भर जा रहा तो नाँच देख ही आएं। अम्मा बाबूजी के लिए जल्दी खाना बना देंगे.बर्तन भी धोकर रख देंगे।सुबह आकर बहुत दिक्कत न होगी।

इधर साँझ को टोला का हाल देखने लायक है.लग रहा समूचा गाँव नाच देखने के लिये तैयार हो गया है.लइका,बच्चा,बुढ़,जवान सब आज नवा-नवा कपड़ा पहन रहे हैं.पिंटूआ के पेंट का बटन ही नहीं तो आज स्कूल ड्रेस ही पहनकर चल दिया.रामबचन बाबा का लुंगी कल गेंहू काटते समय फट गया,उ आज ससुरारी से मिला धोती पहन रहे हैं.कमलावती चाची आज छींट वाला साड़ी पहन के बड़की टिकुली लगा ली हैं.सबके चेहरे पर गजब का उत्साह है.अरे दू साल बाद तो भिखारी इस जवार में आ रहे हैं.

आज ठाकुर बंस बहादुर सिंह की बेटी का बियाह है..मनियर के बड़का बाबू साहेब ठाकुर रघु सिंह बेटे की बरात लेकर आ रहे हैं.भयंकर भीड़ होगा.जल्दी चलना चाहिए न.छह कोस का रास्ता.

सो सब लोग खाना बनाकर घर का काम काज कर..आजी बाबा को घर की चाभी देकर अपनी अपनी बैलगाड़ी से चल दिए..गीता,रीमा आ गायत्री ने खेदन बो भौजी को जबरदस्ती नइहर की ललकी साड़ी आ नथुनी पहना के पाउडर लगा दिया..बाकी भउजी को इ सब श्रृंगार अच्छा कइसे लगे..केकरा पर सजे संवरे कवन देखेगा.

उ एगो कहावत है न..”केकरा पर करी श्रृंगार हो पीया मोरा आन्हर” उहे हाल भौजी का हो गया है…”हाय रे खेदन बलमुआ.आग ना लागो तोहरा नोकरी के.पइसा के चक्कर में आन्हर हो गए.

आज यहाँ होते तो साथ में नाँच देखने चलते न”।बाकी का कहें..पता न कौन सी कलम से भगवान किस्मत लिखें हैं। भौजी के मन में तूफ़ान चल रहा है।

चइत की साँझ है। नचदेखवा पार्टी को लेकर बैलगाड़ी गाँव की खड़ंजा पर चल दी.खेती के दिन हैं.लोग खेतों में डेरा डाले जमे हैं। अभी कई जगह गेंहू काटे जा रहे तो कई जगह खलिहान में बोझा बनकर सजे हैं.हवा में पछुआ का प्रभाव ज्यादा है.

इसलिए कहीं कहीं दँवरी भी हो रही। गांव के बाहर सड़क पर कुत्ते ऐसे भौंकते हैं मानों नांच देखने वालों से कह रहे हों…”अब लौटकर मत आना रे.. हम लोग अब गाँव में अकेले रहेगा।..”

बैल की घण्टी झुन-झुन बजती और भौजी की चूड़ी भी.हवा से घूंघट हट जाता है.भौजी तुरन्त ढँक लेती हैं..सूरज अब डूबने को है..मानों आज उसे भी भिखारी ठाकुर की नाँच देखने जाना हो.

कहते हैं वो साधारण नाँच न थी.गाँव में सब बतियाते हैं “जानत हो जब भिखारी नाचते हैं तब धरती और आसमान भी नाचते हैं.”.कोई कहता है.”बे..भीखरिया के पाल्टी में एगो एतना मस्त लौंडा है न कि जब कमरिया हिलाता है तो सरवा अईसा लगता है की आरा बलिया छपरा के संगे दिल्ली को भी हिला देगा. भौजी इस सब बात को सुनकर हंसती हैं.आज पहली बार तो उनके चेहरे पर थोड़ी हंसी आई है.लेकिन अधूरी हंसी.

इस बात-बतकही के बीच न जाने कब गाँव आ गया..वाह रे ठाकुर रघुवंश मणि सिंह का खानदान, क्या बेवस्था किया है.मेला फेल बेवस्था.दूर दूर के लोग लाठी लेकर भिखारी की नाँच देखने चले आ रहे.

जनवासा इतना बड़ा सजा है कि मानों साक्षात राजा दशरथ ही बरात लेकर आ रहे हैं.हाथी घोड़े..बंदूके. कार से लेकर रथ तक।.बाबू साहेब इतने दिलदार हैं की नाच देखने आये सभी गाँव वालों को शरबत पिलाया है..सब बराती मगन हैं.दारू शराब मुर्गे की भी उत्तम बेवस्था है।बाबू साब राजा आदमी जो ठहरे.अरे कलकत्ता से लेकर आसाम तक ट्रक चलता है उनका बुझे आप लोग।

इधर नाच का मंच तैयार है.देखने वालों में भारी कौतूहल..भौजी भी आज सांस थामकर बैठी हैं.कोई कहता..”आज भिखारी गबरघीचोर नाटक खेलेंगे.कोई कहता “ना ना आज भाई विरोध आ गंगा स्नान होगा..”अकलू बाबा दाढ़ी खुजाकर बोले..”बक सारे चोप..कुछ जाने सुने के हइये नही है.भक्क से बक देते हो…बड़का नचदेखवा हो गए..इहाँ ससुर तोहार बाप के पैदा होखे से पहिले से हम नाँच देख रहे हैं…..देखो हो कभी भिखारी का नाँच? ..

बाबा की बात सुनकर सब चुप हैं..कोई धीरे से कहता है..”त बड़ा देखो हो..तनी इ बतावो तो कव गो लउंडा हैं इनके नाँच में.? अकलू बाबा खिसिया कर कहे “अरे बउचट बकलोल,पाड़ा भिखारी के नाच लौंडा के नाच नही है रे..मुकुन्दी भांड़ समझते हो का ….अरे इ त देवी देवता के नाच ह रे..देखना अभी…आज विदेसिया होगा विदेसिया.बाउ साब के मेहरी के फुरमाइस है..तुम का जानोगे रे चार दिन के लौंडा..जितने दिन के तुम हुए नहीं उतने दिन से हम खेत में घास छिल रहे हैं”

तब तक कोई और बगल से पूछ बैठा..”अच्छा ए बाबा विदेसिया नाटक में का कहानी है तनी बता दिजिये न”?

ल्यो बाबा ने मूंछ पर ताव देकर झट से कहा..”अरे बनरा..हमारा टेस्ट ले रहा है..सुन. विदेसिया की कहानी उहे है..एक गाँव का आदमी गवना कराया आ गवना कराने के चार दिन बाद ही पइसा कमाने कलकत्ता चल गया.उसका नाम विदेसी हो गया.उहाँ जाकर गाँव वाली मेहरारू को भूल गया…चिट्ठी मनीआर्डर सब बन्द.अउर कुछ महीना बाद कलकत्ता में दोसर बियाह कर लिया.अब इहाँ गाँव वाली मेहरारू खूब रोये..धोये..बेचारी ओह प्यारी सुंदरी के खोज खबर लेबे वाला केहू नाहीं..”

एक दिन संजोग से गाँव का एक बूढ़ा कलकता कमाने के लिये तैयार हुआ तो प्यारी सुंदरी ने उससे अपना सब दुःख रो रोकर बताया..और कहा कि जरा खोज खाजकर लेते आइयेगा बाबा.बस इहे है ससुर..अब एह से आगे थोड़ा भी नहीं बतायेंगे.चोप चाप मुंह बन्द कर नाटक देखो”.आतना कहके अकलू बाबा खेदन बो भौजी की तरफ देखे…भौजी तुरन्त घूंघट काढ़ लीं।

बाबा के अनुपम दिव्य नाच ज्ञान के वसीभूत होकर सब उनकी ओर श्रद्धानवत हो जातें हैं। इतने में हरमुनिया वाले ने लहरा छेड़ इस अंतहीन बहस को विराम दे दिया.ढोलक आ झांझ वालों ने ऐसा लहरा बजाया की भीड़ एकदम शांत हो गयी.सबकी आँख अब मंच पर.

क्या भव्य मंच बना है.मंच के सामने बरात.और मंच के तीन ओर पब्लिक..पेट्रोमेक्स की बत्तियां दूर-दूर तक जल रही हैं.जिसको जहाँ जगह मिली बैठ गया है.कुछ लोग पेड़ पर चढ़े हैं.कुछ खड़े हैं।बच्चे,बूढ़े,जवान,अमीर,गरीब,सेठ,साहूकार, चोर और साधू सब एक जगह.ये भिखारी की लोकप्रियता का सर्वश्रेष्ठ काल है.सोचतें हैं.मानों कुछ ही समय में अब कुछ अद्भुत होगा.

तब तक सूत्रधार आये और मङ्गलाचरण शुरू…. हरमुनिया मास्टर ने धुन छेड़ दी..ढोलक मास्टर ने धम से मारा..धाक तिनक धिन।ताक धिनक धिन. समाजी के कण्ठ से निकल पड़ा..
“नावत बानी सबकर माथा रामा हो रामा
रामा चीत देहुँ सुनहुँ विदेसिया गाथा रामा हो रामा

एह किताब के सब बिस्तारी रामा हो रामा
रामा थोरही में सब कहत भिखारी रामा हो रामा।”

जनता खामोश..बाप रे….का गाइस है,का बजाइस है….अरे ! लगा रहा की मिजाज में सतुआ आ आम का चटनी घोरा गया। इधर नाटक शुरू..लोग कभी हंस रहे हैं..कभी लबार को देखकर ताली बजा रहे हैं.गीता आ गायत्री तो एकटक प्यारी सुंदरी के बीयहुती साड़ी को ही देखे जा रही हैं..आह केतना सुंदर पचरा गा रही..”निमियां के डाँढ़ मइया लावेली..झुलुअवा की..झूली झूली ना”

सूत्रधार बताता है..”विदेसी बरम.प्यारी सुंदरी जीव,रखेलिन माया और माया से हटा के जीव आ ब्रह्म के मिला देबे वाला बटोही उपदेश.एह चारो के संवाद के होखे के चाहीं”.बगल में बैठे गाँव के पण्डित सीताराम तिवारी ने अकलू काका से कहा..”वाह रे भिखारी.कातना उंच बात कह दिया.जियो मेरे माटी के शेर.”अकलू काका ने पंडी जी से सहमति जताई.और मूड़ी हिलाकर पास बैठे कुछ लौंडो को उपेक्षा की दृष्टि से देखा.मानों मन ही मन कह रहे हों…”हे सारन के का बुझाई?

खेदन बो भौजी जियत जिनगी में दुसरा बार कवनो नाँच देखने आई हैं..उ भीड़ देख के ही परसान हैं. बाप रे! एतना भीड़..वो भी एकदम चुप्प। लेकिन नाटक में खूब मन लग रहा.देखती हैं प्यारी सुंदरी विदेसी को कलकता जाने से बार बार रोकती है.”इ सीन खेदन बो भौजी के दिल को छू जाता है.पल्लू सीधा कर सीधे बैठ जातीं हैं। स्टेज पर प्यारी विदेसी से कहती है.

“पीया मोरा मत जा हो पुरूबवा”

एक पल को लगता है.स्टेज पर खेदन आ रधिका नाटक कर रहे हों.आ भौजी खेदन को कलकता जाने से रोक रहीं हों….”काश हे संझा माई रो धोकर उस दिन रोक लिया होता तो आज हई दिन नहीं देखना पड़ता न.जा ए भिखारी भौजी का सब दुःख लिख दिया..केतना अगमजानी हो.नाटक का सीन बदला गया और खेदन बो भौजी का पल्लू भी.विदेसी चुपके से कलकता चला जाता है। समाजी गा रहे हैं एक साथ..
“गोड़वा में जूता नइखे सिरवा प छातवा ए सजनी
कइसे चलीहें रहतवा ए सजनी…”

हाय इ लाइन सुनकर मन करता है भौजी खूब रोएँ बाकि चुप होकर रह जातीं हैं.आँख की कोर नम होकर मंच पर टिक जाती है। मन ही मन दुहराती हैं.पियवा गइले कलकतवा ए सजनी।तब तक नाटक में बटोही के पार्ट में स्वंय भिखारी ठाकुर का आगमन होता है..बदन में मिरजई..हाथ में लाठी और झोला के साथ पियरी धोती..चेहरे पर किसी सन्त सा तेज.आवाज में आसमान चीरने वाली ताकत.

उनके आते ही दर्शक दीर्घा में शोर.हलचल मच जाती है..सब ताली बजाकर स्वागत करते हैं.बाप अपने बेटे से,पति अपनी पत्नी से…अमीर गरिब से और चोर साधू से कहता है..”देख देख इहे भिखारी ठाकुर हैं.”…

थोड़ी देर बाद बाद करूण चीत्कार शुरु होता है..बटोही और प्यारी का मार्मिक संवाद.कलेजा को चीरने वाले चीत्कार के बीच भिखारी की आवाज चार कोस में फैली ख़ामोशी को तोड़ देती है..एक पल लगता है की प्यारी का दुःख सबका दुख है,नाच देख रहे हर आदमी को लग रहा कि वो प्यारी बन गया है.खेदन बो भौजी तो रोये ही जा रहीं हैं…..रोये ही जा रहीं हैं.आज पहली बार रोकर उन्हें थोड़ा आराम मिला है.इहाँ लोहा लोहा नहीं.दुःख दुःख को काट रहा है…

इतने में बटोही कलकत्ता चला गया विदेसी को खोजने भौजी के मन में आता है की हमू बाबा से कह दें कि “ए बाबा हमरो खेदन पीया जी को तनिक लेते आईयेगा न.लेकिन कइसे ?..इ सब सोचकर भौजी उदास हो जातीं हैं।.

नाटक में बटोही कलकता आ गया.चार दिन खोजा बिदेसी का कोई आह पता नहीं.अचानक से बिदेसी मिलता है..नया बियाह कर लिया…हाय! जादू मार दिया बगाल ने..भेँड़ा बन गया इ तो…..बटोही उसे प्यारी का चिट्ठी दे देता है.

इहाँ भिखारी जइसे ही बारहमासा गातें हैं…समाजी उनके सुर में सुर मिला देते हैं..नाच देख रही जनता की ख़ामोशी गाढ़ी हो जाती है। देखते ही देखते रस बरसने लगता है और भौजी के आँखों में देर से रुका आंशू भी..

हाय भिखारी तो करेजा ही निकाल लिए.एक एक महीने का दुःख.चइत बैसाख जेठ आसाढ़. दुःख ही दुःख…इतना बेदर्दी कोई होता है भला?….काश खेदन कहीं से चले आते।भौजी के आँख से लोर गिरने लगा..और समाजी के कण्ठ से गीत भी।
“पीया अइतन बुनिया में राखी लिहतन दुनिया में
बरसेला अधिका सवनवा विदेसिया” 

पलंग बा सुनवा का कइनी अयगुनवा
भारी ह महीनवा फगुनवा विदेसिया

अबीर के घोरी घोरी सभे लोग खेले होरी
रंगवा में भँगवा पड़ल हो विदेसिया”

कोइली के मीठी बोली लागेला करेजे गोली
पीया बीन भावे ना चइतवा विदेसिया..”

इधर गाना थमता है और भिखारी भी..लेकिन नहीं थमता है तो भौजी के आँख से निकलता पानी मानों सीने के दुखती हुई नस पर किसी दिल के डॉक्टर ने हाथ रख दिया हो….एक दो नहीं अरे बारह महीने का दुःख…एतना बेदर्दी होता है कोई भला..!!!!!

(मेरी लम्बी कहानी का एक हिस्सा- भोजपुरी के शेक्सपियर मेरे आदर्श भिखारी ठाकुर के जन्मदिवस पर सादर समर्पित )

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