पढ़ाकू विद्यार्थियों की मार्मिक कथा ( सेमेस्टर विशेष व्यंग )

0
1077
students story,vidyarthiyo ke prakar
image- youth ki awaz

शास्त्रों में मुख्यतः तीन प्रकार के विद्यार्थी होते हैं..एक पढ़ने वाले,दूसरे कभी न पढ़ने वाले,तीसरे परीक्षा से तीन दिन पहले सिलेबस पता करने वाले.प्रथम श्रेणी के पढ़ने वाले विद्यार्थी बड़े क्यूट टाइप के लोग होते हैं…जन्मकुंडली में ही लिखवाकर लातें हैं कि “लड़का आपका मिसिर जी मने का कहें.बूझिये की इसकी विद्या रेखा इसकी भाग्य रेखा पर सवार होकर हृदय रेखा पर चहड़ गयी है..मने आपका लड़िका बहुते पढ़ेगा,नौकरी करेगा,सुंदर-सुशील कन्या से शादी होगी,दान दहेज भी भरपूर मिलेगा.परसान मत होइयेगा.भले गाजीपुर के किसी “सिरपत जादो बीटीसी कालिज” से बीटीसी करके टेट में फेल हो जाए,लेकिन इसको शिक्षा मित्र बनने से हाईकोर्ट के बाबूजी भी नहीं रोक सकते।

मित्रों- ऐसे समर्पण भाव वाले सज्जन विद्यार्थी हमारे आस-पास बहुतायत मात्रा में मिल जातें हैं..जिनको देखकर हमारे बाप के मुंह से अचानक ही निकल जाता है.”देख नलायक एक ये है शर्मा जी का लड़का,जो तीसरी में पढ़ता है और पांचवी का मैथ  दो मिनट में हल कर देता है,और वहीं तुम हो ससुर की आज तक उन्नीस का पहाड़ा भी ठीक से याद न कर सके”
इस पारम्परिक उपदेश के बाद ऐसा एहसास होता है कि इस दुनिया में एक हमीं हैं जिसका सुधरना अब बहुत जरूरी है..हम न सुधरे तो ये दुनिया रहने लायक नहीं रहेगी।

इस ग्लोबल वार्मिंग को तो देख लिया जाएगा.महंगाई की क्या औकात जी.अभी तो सबसे बड़ी समस्या ये है कि हमें किताब खोलते ही नींद बहुत आती है और उपर से बाबूजी का थप्पड़. हाय ! तब समझ मे आता है कि ये आंतकवाद क्या चीज़ है जी ?कुछ नहीं.

इधर हम जैसे-जैसे बड़े होते जातें हैं तो देखतें हैं कि शर्मा जी के पढ़निहार टाइप लड़के स्कूल से कालेज,और विश्वाविद्यालय तक में हमारा पीछा नहीं छोड़ते हैं,जो बचपन में उन्नीस का पहाड़ा एक बार में रट गए थे वो आज कोर्स की सारी किताबें रटने के बाद योजना और प्रतियोगिता दर्पण रटने बैठने हैं.जो तीसरी में ही पांचवी का मैथ हल करते थे वो बीए में ही एमए वाली को कोचिंग पढ़ाकर आज भी हमें जला रहें हैं। ये उठते,बैठते, खाते,पीते अल्फा बीटा,गामा, लेमडा,डेल्टा टाइप शब्द उच्चरतें हैं. फिजिक्स,कैमेस्ट्री,मैथ,कोचिंग,सर जैसे शब्द पीते हैं.और यूनिवर्सिटी,फैकल्टी,बीएचयू, जेएनयू upsc,ssc,मुखर्जी नगर,केडी कैम्पस, पैरामाउंट जैसे शब्दों की माला फेरते एक दिन नौकरी और छोकरी को प्राप्त हो जातें हैं.

इधर- दूसरी कैटेगरी में वो विद्यार्थी आतें हैं.जिनको इस धरती पर भगवान ने खासतौर पर अपने बाबूजी का पइसा जियान करने के लिए डिजायन किया होता है.इनके शरीर में कुछ ऐसा साफ्टवेयर और हार्डवेयर लगाया होता है कि लौंडा जीवन भर पढ़ाई छोड़कर सब कुछ बड़े मन से करता है,मानों उसके भीतर कोई सीडी कैसेट लगा दिया गया हो.और आगे चलकर अपनी ‘हार्दिक’ इच्छा से कुछ बने या न बने नेता जरूर बनेगा।

एक कैटेगरी और है जो बुद्ध के सिद्धांतों पर चलने वाली मध्यम मार्गी है..जिनके जीवन में भाग्य में चैन,सकून जैसे शब्दों से जेठ जी टाइप रिश्ता होता है.ये वाली कैटेगरी पहले तो साल भर गेंहू और जनेरा का खेत जोतवाती है.मंसूरी बोवाने के लिए खाद छिटवाती है..बाबा का चश्मा ठीक करवाती है..भौजाई के भइया को स्टेशन छोड़ने जाती है.मामा के समधी के नाना की ससुराल में नेवता पहुंचाती है..और मौसी की ननद के घर कोंहड़ा देने जाती है।

और तभी अचानक एक दिन पाती है कि परीक्षा में सिर्फ तीन ही बचें हैं.और इस गोल-गोल कोहंडा की कसम हो सके तो सिलेबस पता कर लेना चाहिए,कुछ स्टडी मैटेरियल मांग लेना चाहिए,वरना फेल होने से कौन रोक सकता है जी ?

मित्रों एक और कैटेगरी है जो बड़ी दुर्लभ सी है.जिस पर इतना लिखा जा सकता है कि उसके सामने  टालस्टाय अपने अन्ना कैरेनिना की साइज देखकर शरमा जाएं..इसका जिक्र न करना आपके साथ नाइंसाफी होगी.शार्ट में बताते चलूं तो ये कैटेगरी इस आर्यवर्तें जम्बूद्वीपे भारत खण्डे में उत्तर प्रदेश स्थित जिला बागी बलिया में ही पाई जाती है.इस खास कैटेगरी में आने वाला छात्र सिर्फ छात्र नहीं होता वरन वो छात्र नेता होता है.जिसमें छात्र और नेता का अनुपात वही होता है जितना आजकल हवा में प्रदूषण की मात्रा का होता है।

वो सफेद कुर्ता, सफेद,पजामा,पहने होता है.मोदी जी और योगी जी से नीचे किसी को पहचानता तक नहीं है.उसके हाथों में कॉपी-किताब की जगह दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं वाला बैनर होता है.हड़ताल, धरना,चक्का जाम का पर्चा होता है.और कुछ नहीं होता तो मुँह में रजनीगन्धा और कदमों में दुनिया जरूर होती है.औऱ नाम होता है.अभिषेक कुमार राय उर्फ़ डब्लू उर्फ़ नेता जी.

इस छात्र नेता जी के मुख से पढ़ाई के नाम पर साल में सिर्फ एक बार, एक ही बात निकलती है.जो रस सिद्धांतों,वर्तमान शिक्षा नीति की चुनौतियों के सामने चुनौती उतपन्न करने के लिए काफी है..”ए गुरु जी, ए महराज अभी हम फर्स्ट ईयर में बानीं की सेकेण्ड ईयर में जी “? गुरुजी बेचारे क्या करें.उनको खुद पता नही कि उ अभी क्लास में हैं कि कार्यालय में हैं कि रोड पर खड़े हैं.. वो कैसे बताएंगे जी ?

मित्रों..ई तो संक्षिप्त वर्गीकरण हुआ.जानता हूँ कि ये सब परीक्षा में नहीं आने वाला..लेकिन आपको बताते हुए ये दुखद सा एहसास हो रहा है कि अब सेमेस्टर कपार पर नांच रहा है..बाकी सब तो मस्त हैं.लेकिन सर्वविदित है कि हम जैसे मध्यम मार्गी जो चारों ओर से पिसता है..वो आज भी पीस रहा है.आज उसे सिलेबस की चिंता सोने नहीं दे रही है.  मामा के गाँव शादी की टेंशन कपार खा रही है.

सोच रहा है कि दोस्त की साली के ब्याह में नांचने भी जाना है..दूसरे का सूट पहनकर फेसबुक पर डीपी भी बदलनी है..और बिने भइया की साली से लाइक भी लेना है,अगर  इंस्टा पर मोहल्ले की टीना अगर फॉलोबैक कर दे तो जीवन कितना धन्य होगा ये कह नहीं सकते.लेकिन हाय! रे परीक्षा..तू मर क्यों न गई कहीं ?

कम्बख्त हर बार लगता है.काश चार दिन और होते.अभी तो एडमिशन हुआ यार..और अभी एग्जाम.ये सरासर जुल्म है उन विद्यार्थीयों पर जिन्होंने पूरे सेमस्टर पढ़ाई छोड़कर सब कुछ किया हो..कभी देखा है उसके चेहरे  का भाव?
अरे ! भाव, अनुभाव और विभाव की परिभाषाएं भी एक बार तड़प उठतीं हैं.उनके मासूम चेहरे को देखकर।उसका चेहरा उस दूल्हे जैसा हो जाता है.जिसकी साली जूता चुराकर सुबह छिपाने वाली जगह ही भूल जाती है औऱ सुबह दांत चियारकर कहती है.”जीजू आप शूज़ पहनकर आए थे न “?

इधर रही सही कसर.सीरी मुकेश अम्बानी ने पूरे कर दी है.जियो ने मरने लायक भी नहीं छोड़ा है.कम्बख्त एक मध्यम वर्गीय छात्र अभी गाँव के बेरोजगारों वाले व्हाट्सएप ग्रुप से एक्जिट ही होता हूँ कि उसको फेसबुक पर नशा मुक्ति अभियान ग्रुप का एडमिन वो लौंडा बना देता है जिसको शहर के समस्त दारू बेचने वाले भइया कहतें हैं.तीस पर रात को दस बजते ही संसार की समस्त सोना बाबुओं का अत्याचार अपने चरम पर हो जाता है.कितना अच्छा तो था जब एयरटेल और वोडाफोन वाले 50-50 पैसा मिनट लेते थे.मिस काल कब मारें  इस पर लोग शोध करते थे.

अब तो कम्बख्त..दिन भर हर लड़के के कमरे से एक ही आवाज.

“मेले सोना बाबू ने क्या काया”

मेले बेबी ने क्या पेहना है अभी”

जान आपने मेरी इंस्टा वाली डीपी नहीं देखी न”

व्हाट्सप वाली से ज्यादा हॉट है.

आप बड़े न वो हो. एकदम गन्दे

जला भी प्यार नहीं करते..

कल रात को बिना क़िस्सी दिए सो गए..”कित्ती निनी आती है मेरे गन्दू को ” ?

बेचारा लड़का चिल्ला उठता है..अरे मेरी माँ- बस कर.. विद्या कसम,आँखी किरिया,काली माई डीह बाबा के कसम.अपना मुंह देखे शीशा में चार दिन हो गए तुम्हारा ममता बनर्जी जैसा मुंह वाली डीपी का अँचार डालेंगे..? और रात को जो आ गयी उसे नींद कहतें हैं लैला की मम्मी। बस यही है.

जी..यही है..दुःख.

बाकी सब ठीक है।
बकौल शिवपालगंज के मसूर शाएर रामाधीन भिखमखेड़वी जी-

क्या करिश्मा है ए रामाधीन भिखमखेड़वी

बनने विद्यार्थी चले थे,बैल बनकर रह गए.

Comments

comments