देखी हमरी काशी,मिलिए गली,साँड़,किस्सा और कॉमरेड शंकर जी से

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Varanasi News –                                                                                                             सावन की पहली सोमारी..आस्था के समन्दर में डूबती काशी..गलीयों में घण्टा घड़ियाल की  शोर,घाटों पर भीड़ का जोर उफान मार रहा है..भोरे-भोरे रुद्राभिषेक कराने गये मनोहर पंडित अभी तक नहीं लौटे हैं.. 12 बज गये..
उधर पंडीताइन नौ बजे से  सोरहो श्रृंगार करके अपने सैमसंग गैलेक्सी से अब तक पचहत्तर से ज्यादा सेल्फ़ी  लेकर चार बार whats app की डीपी बदल  चुकी हैं.. हेने  पंडी जी का दो घण्टे से  पांच मिनट नहीं हो रहा है….जबकी घड़ी उनको ससुराल से सरहज द्वारा मिला है।

लेकिन ये क्या..इधर  पंडीताइन का गुस्सा भ्रष्टाचार की तरह बढ़ रहा है..जब देखती हैं कि बगल वाली दिनेश बो शरमाइन पूरा आठ किलो मेकअप मारके  अपने हसबैंड के साथ तिलभण्डेश्वर महादेव में जल चढ़ाकर स्टेटस अपडेट कर दी है..“फीलिंग आध्यात्मिक विद चिंटुआ के पापा  एट शिवाला”

हाय! उस पर अद्भुत,अनुपम,दिव्य,सौंदर्य के अस्सी कमेंट और चार सौ लाइक देखकर पंडीताइन के मुंह से सहसा निकल जाता है…

” अउर अमरीशपूरीया जइसन मुंह नहीं होता तो जीने नहीं देती शरमाइन किसी को”

हाय! पंडी जी !आग ना लॉग जाये तोहरे पंडीताई में..
“अब तक हमू सेल्फ़ी डाले होते न..बस आ जाओ जरा….
कल रात में ही कहे की पहले अपने घर का पूजा करवाके तब कहीं जाइयेगा…लेकिन ये हमारी सुनेंगे तब न..”

बेचारे पंडी जी भी क्या करें..यही तो सीजन है..कमा लेंगे तभी न पंडीताइन  के लिए झुमका बनेगा..पेहेन के झमकाते हुए नइहर जाएंगी…
लेकिन ई बात पंडीताइन कहाँ समझ पाती हैं.

बस बाबा भंग वाले पंडीताइन को धीरज दें
मुझे पंडी जी पर ही नहीं शादी-शुदा सभी अपने भाइयों पर तरस आती है.जो सुबह-शाम अपनी फूलकुमारियों से  लगातार यही सुनते हैं… “मेरी सुनेंगे तब न..”
बाबा भंग वाले  इनकी श्रवण शक्ति को मजबूत करें,यही कामना है।

इधर घाट से लेकर सब्जी हॉट तक काशी बम बमा रही है..
मोहल्ले की एन्जेल टीना आज मन्दिर क्या गयी..दो दिन पर नहाने वाले लौंडे भी आज बाबा को गंगा जल चढ़ाकर  आध्यात्मिक हो गये..

अभी-अभी ट्रिपल बीए,डबल एम ए,और सिंगल पीएचडी,साहित्य रत्न,ज्योतिषमणि बाबा योगेश चतुर्वेदी उर्फ़ संटू बाबा ने एन्जेल टीना के पापा से कहा है कि..
“जरा बिटिया को समझाइये..मन्दिर पाश्चात्य वेश-भूषा में न ही आए तो अच्छा है..लड़के सब भीड़ लगा देते हैं…फिर बड़ा विघ्न उतपन्न होता है…”

ज्ञातव्य हो कि इसी टीना के चक्कर में मोहल्ले के चार कोचिंग संस्थान बन्द हो चुके हैं..
क्योंकि जिस कोचिंग में टीना पढ़ने जाती है..उस कोचिंग में विद्यार्थियो की संख्या में इस कदर वृद्धि हो जाती है कि कोचिंग वाले पढ़ाई का कारोबार छोड़कर टीना के पापा की तरह जलेबी छानने के कारोबार में ज्यादा फायदा समझने लगते हैं..
ये अलग बात है कि
मोहल्ले के कुछ बुजुर्ग टीना के पापा को गरियाते हैं…
“सार जिनगी भर जलेबी छानो..और तुम्हरी इ बबुनी इज्जत का ईंधन जला रही है..”

छोड़िये..रोज का किस्सा है.

जरा आगे आइये….
घर से निकलते ही पहली गली में साँड़ जी लोग मोर्चा सम्भाल लिए हैं…जो जैसे,जहाँ खड़ा हैं वहीं पड़ा है..जिसे देखकर एक बार बुद्ध भी शरमा जाएं..एक साँड़ जी से मेरी मित्रता है..
देखते ही मुझे राग दरबारी में ऐसा तान और आलाप ऐसा  लेते हैं कि मैं बस खड़ा का खड़ा ही रह जाता हूँ…
पता न किस कमबख्त ने बनारस के सांडो से बचने की सलाह दी है जी..जरा बुलाइये तो यहाँ..

अरे! ऐसा सीधे-साधे सज्जन साँड़ आपको पूरी दुनिया में नहीं मिलेंगे…

मन करे तो उनके ऊपर चढ़कर आप गली पार कर जाइए..मन करे तो उनसे कुछ बोल बतीया लिजिये…बेचारे कुछ नहीं बोलेंगे..

 

कई बार लगता है की ये  शादी-शुदा साँड़ तो नहीं..?
खैर… कम जग़ह में खुद को एडजस्ट कैस किया जा सकता है ये बनारस के सांड़ो से कोई सीख सकता है।

अब जरा आगे आइये….
गली से निकलने पर बाबा विश्वनाथ मन्दिर का प्रवेश द्वार है।
बेगूसराय से लछमिनिया बम और सुदर्शन बम आ गये हैं…संगवा में गौरी बम, मुनेसर बम,पतिराम बम और रमेसर बो चाची भी हैं..

सबको देखकर लग रहा की धान की रोपनी खतम करके  देवघर चल दिए हैं..

 

पतिराम का पैंट ही फट गया है तो उहाँ रस्सी से बाँध लिए हैं..मुनेसर का मोबाइले पानी में गिर गया है..बड़ी निराश हैं..घरवा  मलीकाइन से का कहेंगे हो..उ तो यही कहेगी कि “कहीं गाँजा पीके सूत रहे थे तो सब निकाल लिए होंगे…
होश रहेगा तब न”
जा रे करम…फिर भी बोल रहे हैं..

“बोल बम का नारा है

बाबा नाम सहारा है”

इधर चाची का गोड़ आज जमीन पर नहीं पड़ रहा  है..पहली बार तो बनारस आई हैं…जल ढारने के बाद बिंदी खरीद रही हैं..हरियर-हरियर चूड़ी..अरे अगवा तीज भी तो है…का बुझे?
सबके थके चेहरे से एक अजब सा उमंग और उत्साह झाँक रहा..पता न कहाँ से एनर्जी आ रही है…कौन सा आनंद मिल रहा है।।
इसे समझनें के लिए आपको अपना समस्त ज्ञान,सम्पूर्ण बौद्धिकता आलमारी में बन्द करना पड़ेगा..
अरे यही असली भारत है…ये लोग भारत के नागरिक हैं इंडिया के नहीं। का बुझे…?

आगे..मन्दिर द्वार के सामने छत पर भाकपा माले का कार्यालय है..उसके नीचे चाय,बैग की दुकान…
यूँ तो हिन्दुस्तान की सभी राजनीतिक पार्टियों के कार्यालय जमीन पर होते हैं..लेकिन जल,जंगल,जमीन की बातें करने वाली पार्टी का कार्यालय जल,जंगल,जमीन से बहुत दूर छत पर है…

अभी ये सोच ही रहा था कि मेरे एक परिचित कॉमरेड चन्दन टिका लगाए दीख  गये…

घोर आश्चर्य..इ कैसे..?
मैंने उनको एक बार बताया था कि शंकर जी साम्यवाद और समाजवाद के सबसे पहले पुरोधा हैं न की मार्क्स और लेनिन..तभी किसी पहुंचे हुये कॉमरेड ने पार्टी का आफिस बाबा के मन्दिर के ठीक सामने बनाया है….

कॉमरेड आज भी इस बात पर हंसते हैं…और जमीन पर अच्छा काम भी करते हैं..बस उनका नाम नहीं होता..क्योंकि नाम वाले कॉमरेड काम नहीं करते वो सिर्फ भाषण देते हैं..

खैर जरा आगे आइये…. राजेन्द्र प्रसाद घाट।
अभी चिलम का धुंआ बुझा नहीं की बाबा सुखबेलास बोल पड़े हैं….।

“गुरु मैवतीया क बियाह केसे भइल हौ?”

बगल वाले बाबा को जरा चढ़ गयी है. वो अभी मायावती जी की शादी में शरीक होना नहीं चाहते हैं..उनको मानस और तुलसी बाबा  से मिलने की बड़ी जल्द बाजी है..आगे टिका लगाये दस पन्द्रह भक्त बैठे हैं.जिनमें  चन्दन टिका लगाये चार विदेसी भी हैं.. ..बात पर बात और चिलम पर चिलम चढ़ रही है…

गुरु देखा…बाबा पारबती जी से का कहे..

“उमा कहँऊँ मैं अनुभव अपना।

सत हरी नाम जगत सप सपना।।”

माचिस बारो महादेव का नाम लेकर..इ सब सपना है बबुआ..हरी जी का नाव ही संगवा में जाएगा…बोला महादेव…
थोड़ी देर में सामने सब धुंआ-धुंआ हो जाता है..

दो मिनट की चुप्पी के बाद..बाबा आसमान की तरफ फ़ेंककर बोल पड़ते हैं..

“कांसीरमवा रखले रहल न हो मैवतीया के..”?
आ सुनले हई कि मोलैमा भी संसद साड़ी फरले रहल…
बक इ बात ना हौ…
गुरु..
तब्बो अकलेस जादो जी के बड़प्पन देखा…जमाना भर मैवतीया के बहन जी कहेला..आ इ  बुआ जी कहेलन……

हाय!  अकलेस भाई की बुआ जी का नाम सुनकर गाँजा का धुंआ और हंसी का गुबार एक साथ उस कदर निकलता है की मुझे वहां से खिसकना ज्यादा उचित लगता है।

कमबख्त न आज अखबार मिला न कायदे की चाय…सर भारी है..
बस खड़ा होकर भीड़ को कोस कर बाबा को दूर से ही प्रणाम कर लेते हैं…
अरे! वही बुर्जुआ हिप्पोक्रेसी…कि हिन्दुस्तान में सबके पास स्मार्ट फोन हो,वातानुकूलित कमरों में सब सुखी और सम्पन्न हों तो शायद ही कोई भीड़ में मरने जाए..लेकिन नहीं ।ये मरने का सवाल नही..ये हिन्दुस्तान का लोकमानस है जिसमे आस्था कूट-कूट कर भरी है..शिव जिसमे संहारक नहीं उद्धारक हैं.. अफ़सोस की इस लोक मानस को इंडिया में रहने वाले बुद्धिजीवि आज तक नहीं समझ पाए हैं।

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