तुलसी दास अखाड़ा – यहाँ नारी ताड़ना की अधिकारी नहीं है

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गीजर के पानी से नहाने वाले क्या जानें कि जाड़े के दिनों में एक आम भारतीय के शरीर में एक संगीतकार की आत्मा किस भांति प्रविष्ट हो जाती है,सुबह 5 बजे एक औसत भारतीय टोंटी खोलकर दस मिनट पहले किशोर कुमार के दर्द भरे नग़में गाता है,नहाता हुआ हनुमान चालीसा पढ़ता है और कपड़ा पहनते हुए भरतनाट्यम करता है.फिर अपने संगीतकार की डिग्री के साथ घाटों पर धूप सेंकता है।

बात नवम्बर के 27 तारीख की है..उस दिन ठण्ड तो नहीं थी.लेकिन हमारे दिल में कुछ दर्द भरे गीत थे और हाथों में कोर्स की किताबें थीं.सामने आने वाली परीक्षा का सिलेबस था.और उसके सामने हमेशा की भांति अस्सी घाट और गंगा का विस्तृत नज़ारा.मनोहारी शब्द की जितनी परिभाषाएं साहित्य के सूरमाओं ने कहीं हैं,वो सब एक-एक करके सामने सालसा नृत्य कर रहीं थी..दिल तीन ताल के दुगुन में धड़क रहा था। विचार कथकली की मुद्रा धारण कर चूके थे।

सामने देख रहा कि हर साल की भांति इस साल भी कुश्ती की प्रतियोगिता चल रही है.आयोजक वही सदा की भांति अखाड़ा गोस्वामी तुलसी दास.पता चला आज बनारस केशरी का चयन होना है.बनारस के आस-पास और जिला-जवार से नाना प्रकार के पहलवान आए हैं,कुछ कुश्ती के शौकीन तो सुबह से ही हाथों में झाल मूड़ी लेकर झोला-झण्डा गाड़ चुके हैं। वहीं कुछ पुराने उस्ताद अपनी मूछों में तेल लगाकर अपने चेले-चपाटीयों को जीत के दांव-पेंच समझा रहें हैं.

नए उस्ताद भी महावीर जी का सुमिरन कर लँगोट कसने में तल्लीन हैं..कुछ की कुश्ती सांझ को पांच बजे के आस-पास है.लेकिन अभी से उनकी देह में लुत्ती जल रहा है..दंड-बैठक लगाकर जमीन को खाल करने का कार्य कर रहें हैं.अखाड़ों के स्वरूप ने भले माटी की जगह मैट ने लिया हो लेकिन इन चार सौ सालों में दर्शकों के मिजाज में कोई बदलाव नहीं आया है.भीड़ से रह-रह के वही पारम्परिक आवाज आती है.जिसे मंगल ग्रह पर रहने वाला कोई बहरा भी सुन ले.तो उसे एहसास हो जाएगा कि उसे उठाकर बनारस के किसी घाट पर फेंक दिया गया है।
“हर-हर महादेव..”ई सरवा.भोस** ई लड़ी भाय .?

मैं किताब लेकर सोचने लगा कि तुलसी बाबा भी क्या अद्भुत आदमी थे न ? हिंदी के छात्र और अध्यापक उनकी रचनाओं से कुश्ती लड़ रहे हैं.आलोचक और उनके घोर निंदक उनकी कुछ चौपाइयों और दोहों से.वहीं 450 से चली आ रही उनके अखाड़े की इस परम्परा में बड़े-बड़े सुरमा पहलवान उनके सिखाए दाँव और पेंचों से.लेकिन विनम्रता कितने उदात्त स्वरूप में उनके यहां मौजूद थी.कि वो कहतें हैं.
“काव्य विवेक एक नहीं मोरे..सत्य कहहुँ लिखि कागद कोरे”

फिर भी मन पूछने को करता है कि हे संगीत,सहित्य,दर्शन की प्रतिमूर्ति, रस,अलंकार,छंद सहित भाव के शिरोमणि तुलसी आपको कुश्ती लड़ने की जरूरत क्यों पड़ी ..कौन सी विपदा आन पड़ी थी ? कितना समय था आपके पास ? दंड, बैठक ,रियाज करने का,पूजा करने का.छंद,सवैये की मात्रा बिठाने का,रामनगर वाली रामलीला से लेकर तुलसी घाट वाली कृष्णलीला शुरू करने का,? फिर काशी में दर्जनों संकटमोचन मंदिर स्थापित करने का,और ये सब करने के बाद काशी के पण्डितों का प्रचण्ड विरोध सहने का ?

लेकिन तुलसी तो तुलसी हैं..अंतरविरोधों के  स्वामी..इतना जल्दी कहाँ समझ में आने वाले जी ?.(वो भी मेरे जैसे मन्द मति के..) किसी जगह परसाई जी ने जिक्र किया है कि तुलसी का अंतर्विरोध हर बार सोचने पर मजबूर करता है.जैसे देखिये न उन पर आरोप है कि वो नारी विरोधी हैं.

ढोल गंवार शुद्र पशु नारी ये  सब ताड़न के अधिकारी.

मगर फिर नारी की स्थिति पर कितनी करुणा है.

केहि विधि नारी रचेउ जग माहीं।पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं।।

उन पर आरोप हैं कि वो भाग्यवादी हैं..
हुई हैं वही जो राम रचि राखा.को करि तरक बढावही साखा

मगर फिर कर्म की महत्ता पर क्या है.. ?
कर्म प्रधान विश्व करि राखा.को करि तरक बढावहिं साखा

फिर
कादर मन कर एक आधारा.दैव-दैव आलसी पुकारा।

लेकिन मजे कि बात देखिये तुलसी को कोट करके उनकी खिंचाई करने वाले कुछ बौद्धिक कुटिल सभी दोहे और चौपाइयों को एक साथ नहीं रखते.सहसा मन में चल रहे इस हलचल ने विराम लिया और हल्ला हुआ कि गोस्वामी तुलसी दास अखाड़े द्वारा सैकड़ो वर्षों से चली आ रही कुश्ती परम्परा में एक महिला पहलवान खुशी ने एक पुरूष पहलवान करन को पटक दिया.

एक झटके में लगा कि ये क्या हो गया..? सच में ऐसा हो गया..? मुझे तो सहसा विश्वास ही नहीं हुआ कि एक लड़की ने लड़के को उठाकर पटक दिया..लोग कहने लगे कि देखो भाई करन को खुशी ने पटक दिया ! भरी दोपहरी में मचा हाहाकार कि उ “लैकिया जौन पलवान रहे न भाय ऊ लैकवा सारे के पटक दिहलस भाय.लोग काम-धाम छोड़कर देखने दौड़ पड़े.

कुछ लोग पूछने लगे कि हनुमान जी को समर्पित इस अखाड़े में महिलाओं का प्रवेश कबसे हो गया ? पता चला कि इसमें कोई आश्वर्य करने की बात ही नहीं है..अपनी 450 साल की परंपरा को तोड़ते हुए इस साल नागपंचमी के अवसर पर नंदिनी सरकार और आस्था वर्मा नाम की पहलवानों को गोस्वामी तुलसी दास अखाड़ा ने न सिर्फ प्रवेश दिया है.बल्कि समय-समय पर हर सुविधा देने का निर्णय भी लिया ताकि ये लोग असुविधा को त्यागकर राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम कर सकें।

tulsi akhada,tulsi ghat varanasi
तुलसी अखाडा में लड़तीं लडकियां

उधर जीत का जश्न मनाया जाने लगा…इधर मैं मन ही मन संकटमोचन फाउंडेशन और महंत जी को इस जोरदार पहल के लिए बधाई देने लगा..गोस्वामी जी की परम्परा से लेकर अखाड़ा को सहेजने वाला ये परिवार किस तरह बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और बिना किसी हो हल्ला के प्रगतिशील है इसे मैंने करीब से देखा है।
महंत शब्द आते ही हमारे दिमाग में माथे पर त्रिपुंड लगाए.चार फीट की शिखा लिए,मणि माला से सुसज्जित गेरुआ वस्त्र धारी मूर्ति उभर आती है.

लेकिन तुलसी की विरासत के महंत जरा हटकर हैं। एक सफेद धोती और कुर्ते में रहने वाले तुलसी अखाड़ा के महंत पण्डित विशम्भरनाथ मिश्र जी आज आईआईटी बीएचयू में इलेक्ट्रॉनिक्स के प्रोफेसर हैं.उनके पिता पूर्व महंत स्व वीरभद्र मिश्र जी  देश के प्रख्यात पर्यावरण विद और आईआईटी बीएचयू में ही सिविल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के हेड थे।
तुलसी की ये पीठ एक साथ धर्म और विज्ञान का सुंदर समन्वय है.,मन्दिर और आईआईटी को इतने सौंदर्य,सहजता और सादगी,समन्वय के साथ इस परिवार ने सम्भाला है कि आपको अचरज होने लगता है। 

अगले दिन अखबारों से पता चला कि पहली बनारस की महिला केशरी फ्रीडम यादव हैं..फ्रीडम यादव..नाम सुनकर बड़ी हंसी आई मुझे..लेकिन उनकी ‘जीत’ महज एक पहलवान की जीत नहीं थी..वो एक ट्रेडिशन से फ्रीडम हो जाने की प्रतीक थी..। एक परम्परा परिवर्तन की गवाह थी।

फ्रीडम यादव

हमें नहीं भूलना चाहिये कि किसी परम्परा के पीछे उस देश और काल की परिस्थितियां जिम्मेदार होतीं हैं.हर साहित्य और साहित्यकार अपने देश काल और परिस्थिति से प्रभावित रहता है। बस ठीक से किसी को जाने बिना दिन-रात कोसना कौन सी बौद्धिकता और स्त्री विमर्श है मुझे आज तक समझ में नहीं आया.

2017 का सत्य,2055 का सत्य नहीं हो सकता.समय बदलता है..चीजें बदलती रहती हैं…रूढ़ियाँ सँस्कृति नहीं हैं जिसकी हम रक्षा करने को बड़े आतुर हैं..बेवजह की परंपरा को लादना पशुवत संस्कृति है.आज जब देश के रक्षा मंत्रालय से लेकर विदेश मंत्रालय और संसद से लेकर कारपोरेट तक में आधी आबादी ने अपना झंडा बुलंद किया है.तब यहाँ भी ये परिवर्तन होना ही चाहिए।तुलसीदास अखाड़े के इस परिवर्तन का जोरदार स्वागत है। आइये हम फ्रिडम को बधाई दें कि वो काशी और तुलसी दास अखाड़ा का नाम रोशन करें.

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