गाँव-जवार का फगुआ गान (अहा ! ज़िंदगी के मार्च अंक में प्रकाशित )

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traditional village holi
image- elledecoration.co.za/ho

गांव के ताल-पोखरा हो या अमराई,महुवा के चिकनाते पत्ते हों या बंसवार में फूटते कोंपल.काली माई का दुआर हो या लाई-दाना भूजने वाली घोसार.गांव मन ही मन होली की तैयारी करने लगा है। सुबह का सूरज जब चने के पत्तों पर चमकता है तब ऐसा लगता है मानों मोतीयों का कोई कारीगर सुबह-सुबह नक्काशी करने बैठ गया है। अरहर के फूल हुलसतें हैं.धरती में लसराती मंसूर को जब पुरुआ छूती है,मन कत्थक की आमद पर थिरकने लगता है।

इधर सरसों के खेतों को देख कर लगता है आज किसी बांसुरी वादक ने छेड़ दिया है राग बसन्त..श्रोता बनकर बैठ गया है समूचा अस्तित्व..और पीली पड़ गयी है धरती,इस अनहद नाद से । उधर पश्चिम टोला का हाल बेहाल है.आंगन में लाई,चूड़ा,गुड़ बिखरा है.और दुआर पर बड़का बाबा की कारीगरी,पता चला खटिया बीन रहे हैं.भरे फगुनहट में उनके माथे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकतीं हैं.बात ये है कि होली में लोग आंएगे तो कहाँ बैठेंगे। सुना है एक चौकी था उहो काली पूजाई के दिन टूट गया।

दूसरी ओर परसुराम बाबा की गोल-गोल आंखें इंतजार में हैं की उनके डेढ़ बीघे खेत में उगे आलू का सही-सही रेट लग जाए तो उसे बेचकर होली का बाजार किया जाए.वहीं चनेसर को चिंता है कि चना जरा जल्दी पक जाए तो बात बन जाए.सुना है दिन भर भैंस चराने वाले पारस बाबा भी यही सोच रहें हैं कि इस बार रोज पछुआ बहे की गेंहू की दँवरी करने में कोई दिक्कत न हो.

आज बच्चे स्कूल जा रहें हैं,कामकाजी लोग शहर,कुछ लोग कचहरी,कुछ तहसील और कुछ लोग बाज़ार.सबकी चाल में एक चुहल है.और चुहल में फागुन का असर.गांव के बाहर निकलते ही एक पीपल का पेड़ है।

कहते हैं ये पीपल सिर्फ एक पेंड़ नहीं .बल्कि इस गाँव रूपी घर का सबसे बुजुर्ग आदमी है,जो लाठी लिए तनकर खड़ा है आज भी-न जाने भादो की अंधेरी रातों में कितने तूफान आए.जेठ के उठते बवंडर में कितनी बारिशें हुईं.माघ के जाड़ ने हाड़ हिला दिया..लेकिन ये पीपल आज भी किसी बुद्ध की भांति एकदम समाधिस्थ है।

आज उसी पीपल के नीचे हैण्डपम्प के बगल में बने एक गोल चबूतरे पर कई लोग बैठे हैं.सुना है कोई मीटिंग चल रही है.ध्यान से देखने पर समझ में आता है कि अरे ये तो पूरब टोला के मोती मिसिर,पश्चिम टोला के झगरू,उत्तर टोला के जोगिन्नर चाचा और दखिन टोला से गाँव के एकमात्र नेता विकास बाबू बैठे कुछ गहन पंचाईत कर रहें हैं।

लेकिन हे शिव जी- इन चारों के चेहरे पर इस मनमोहनी सुबह में ही बारह क्यों बज रहे हैं।कहीं गाँव पर कोई गम्भीर संकट तो नहीं आ गया ? तब तक झगरू ऊबकर जैसे ही खैनी की डिबिया निकालते हैं..विकास बाबू उर्फ नेता जी बोल पड़ते हैं.

“एक बात जानें कि नहीं
क्या बोलो ?“ढोलक फट गई है.”हाय! ये आफ़त !
कब
कैसे भला ?

चढ़त फागुन में ढोलक फट जाए..नाश हो जाए समूचे गांव का.जोगिन्नर चचा की भुजाएं फड़क उठतीं हैं-बताओ जरा क्या दिन आ गए..समझ नहीं आता कि इसी गांव में कभी जगराम जैसे फगुआ के नामी गवैया भी हूए हैं?.जो गाते थे तो चार कोस के खेत-सिवान का पुरइन-पात हिलने लगता था.जो जहां सुनता झूमने लगता था.याद है न इसी काली थान पर पर साल का फगुआ अइसा गाया था जगरमवा ने कि नामी ढोलकवाह भगेलू भगत पानी-पानी होकर पानी मांगने लगे थे।सोचो तिलेसर- आज उसी गाँव कि ये दशा की भरे फागुन में ढोलक फट जाए..जा ए डीह बाबा! उठा काहें न लिए हमको आज। सब ने सहमति से सर हिलाया..वाकई ये तो बड़ी शर्म की बात है – झगरू बोले…कल तुम सबने सुना..रेलवे लाइन के उस पर परसपुर गाँव से रात “शिव शंकर खेलत फाग”सुनाई दे रहा था.

लेकिन इहाँ जी- इहाँ तो भाय ठन-ठन गोपाल.जैसे गांव वैसे गवैया.न किसी को मतलब है न गांव की परंपरा का ख्याल.ऊपर से सब गांव के बड़कवा लोग पूछते हैं..”एह साल फगुआ कब गवाई हो” ई देखो जरा ईमान इनका,अरे! साज बाज का किसी को ख़याले नहीं आ सुनेंगे एकदम सस्त्रीये संगीत। ऊ कहावत हैं न- “लेनी ना देनी नाव तिरबेनी..”

तब तक रजिन्नर भी बोल पड़े- अरे इहाँ सब अपने लिये जी रहे हैं भइया..न यहां किसी को गाँव के इज्जत की चिंता हैं न प्रतिष्ठा की..हर साल फगुआ पहले हमारे गाँव से शुरू होता था..तब देखा-देखी लोग गाते थे.. लेकिन हो गयी न बेइज्जती..

नन्हकू चाचा ने कहा..”वो तो ठीक है पर इस साल फगुआ कैसे गवाएगा ई तो बताओ की खाली लेक्चर ही छाँटोगे तुम लोग..? का जी विकास ?

इतना सुनने भर की देर थी कि पीपल के पत्तों में एक हल्की सरसराहट हुई…पछुआ कुछ और तेज हो गयी थी..दूर खड़े कुछ चरवाहों ने अपनी-अपनी गायों को हांकना शुरु कर दिया था। उन्हीं गाय चराने वालों में एक वो व्यक्ति भी था..जिसे देखते ही झगरु की आंखें  चमक उठी-मानों किसी बड़ी समस्या का बहुप्रतीक्षित समाधान मिल गया..बिना देर किए बताने लगे- 
अरे !मुंह न बनाओ.ढोलकआ ज ही शहर भेजो.और ऊ चौधरी को देख रहे हो न उनके घर एक जनानी ढोलक है.आज उसी से फगुआ शूरु करो.गांव की इज्जत का सवाल है.बगल के गाँव वाले जोगीरा गाकर निहाल हो रहे हैं.हम इहाँ कुएं पर बैठकर निरगुन गा रहें हैं।लम्बी-चौड़ी मीटिंग के बाद सहमति बनी की ढोलक नहीं तो क्या आज चौधरी की जनानी ढोलक से फगुआ गाया जाएगा।
देखते ही देखते गाँव मे ये खबर बिजली के करंट जैसी दौड़ गई और ब्रेकिंग न्यूज ये बना कि आज साँझ को ही शिव जी के मंदिर पर फगुआ गायन शुरू हो रहा है।इतना सुनने भर की देर थी कि हर टोले से कुछ लोग खुरपी,फावड़ा लेकर शिव जी के मन्दिर पर हाजिर.कुछ देर में पता चला सुखवेलास दूब उखाड़ रहें हैं..तो वही रामसमुझ ने खरहर फावड़े से जमीन को बराबर करना शुरू किया है..किसी के हाथ मे खुरपी है..किसी के हाथ मे बाल्टी..कोई बाजार से अगरबत्ती,मिठाई लाने गया है..कोई लालटेन चटाई और दरी।बलिराम बाबा ने तो पसीना फेंक दिया है..बाप! रे केतना घास उग गया है जी..अरे गांव के एक्को आदमी को पूजा करने के अलावा किसी और चीज से मतलब रहता है तो का यही नौबत आती ? काहो रामसमुझ.. ? अरे! सिरफ रोली माला फूल अगरबत्ती से खुश थोड़े होतें हैं शिव जी..उ तो अड़भंगी हैं..हियरा में प्रेम नहीं उनके लिए तो सब बेकार है जी सब बेकार है। लीजिये स्वच्छ मन्दिर अभियान अपने जोरों पर चल ही रहा है कि किसी ने आकर खबर दी.

“हरमुनिया को चूहा काट दिया है,पिंटुआ ने सरसत्ती पूजा के बाद उसे भूसा वाले घर मे रख दिया था..और मूर्ति भसान के दिन से ही अपने टोले से दो जोड़ी झाल और एक मंजीरा भी गायब है.लीजिये हुआ बवाल..अपशकुन पर अपशकुन..समस्या पर समस्या। नन्हकू ने कमर पर गमछा लपेटकर दहाड़ा-

‘तो हम तो जिस दिन ढोलक खरीदकर लाए थे उसी दिन से कह रहे कि इसको मेहरारू लोगों को बजाने को मत दो.न ताल मात्रा का ज्ञान न ठेका और बोल का..हरमुनिया को परधान जी के ओसारा में रखो..झाल,मंजीरे की गिनती सही रखो.लेकिन गाँव के इन लौंडे-लफाड़ियों को कोई मतलब है अपने गांव की इज्जत से ? अब हो गया न.. गावो फगुआ और जगाओ शिव जी को.हम चल रहे सोने। बन्द करो रे सफाई..नही गवाएगा फगुआ।

ये क्या ? -एक मिनट में सबका मुंह बन गया.मानों होली नहीं आज मुहर्रम हो और रंग खेलने की जगह आज छाती पीटने का कार्यक्रम करना हो। सबके चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। इतना मेहनत करके इस साल तो नन्हकूआ ने इस साल रियाज मारा है की इस बार फगुआ गाकर गांव हिला देगा.अरे कितने सौभाग्य से तो उसकी इकलौती साली जी गाँव में इंटर का इम्तेहान देने आई है,वो भी सुनकर अपने घर बताएगी कि हाय! उसके जीजा जी केतना बढ़िया फगुआ गातें हैं।

लेकिन हे गणेश जी..कहां किस परबत पहाड़ पर सुतें हैं महराज..बिघन पर बिघन हो रहा है.और आपको खबर नहीं।कहाँ सोए हैं बाबा लाल लँगोट वाले संकट मोचन बीर हलुमान अब जागरित होइये देब। इज्जत का सवाल है। तब तक रजिन्नर ने कहा-अब तो मान लो मोती.हरमुनिया शहर जाएगा.दू-चार दिन मिस्त्री को तेल लगाया जाएगा.गोड़धरिया करना पड़ेगा तब न कहीं जाकर बाजा बनेगा।उधर ढोलक फाट कर रखा ही है।तब तक तो जवार भर फगुआ गाकर पुरान पड़ जाएगा..सब चइता की तैयारी करेंगे और हम लोग इहाँ घास छीलकर बोझा बाधेंगे।

इस समस्या के बाद मन्दिर सफाई पर विराम हो गया था.सब चिंतामग्न थे.कोई कहता परसपुर से मांग लेते हैं.तब कोई कहता कि.पगला गए क्या.ऐन टाइम पर दूसरे गांव में ढोलक,झाल,हरमुनिया मांगने जाइये तो लोग का समझेंगे कि एकदम भिखमंगे हैं का जी सब ? जिस गाँव के एक दर्जन लोग मलेटरी में.उसकी आँख में तनिक सा भी पानी बचा है कि नहीं कि दस दिन फगुआ है और आ गए ढोलक-झाल मांगने- ?

तब तक देखते ही देखते गाँव के नेता जी विकास बाबू में न जाने कौन सी सुसुप्त ऊर्जा का भीषण संचार हुआ और उन्होंने एक भाषण ठेला- “भाइयों-बहनों उदास होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है..हम बेवस्था करेंगे..अरे! आखिर हमको जब सब लोग नेता मानते हैं तो समस्या का समाधान करना तो हमारा फर्ज है..,.और कह दिया तो कह दिया.आज फगुआ गवाएगा तो गवाएगा.सब तैयार ? भीड़ से आवाज आई। तैयार नेता जी तैयार।

बस फिर क्या था..देखते ही देखते शाम को मंडली जुटने लगी..गाँव के बुजुर्ग जिनके मुंह मे दांत नहीं है.वो भी झाल मंजीरा लेकर बैठ गए। बीच में शंकर-पार्वती जी का फोटो,उस पर माला चढ़ा दिया गया..अगरबत्ती दिखाया भगेलू भगत ने..ढोलक वाले ने धींन्न मारकर ढोलक का साउंड चेक किया.और मन ही मन सीना तानकर कहा.

“वाह चौधरी जनानी ढोलक को भी मरदानी की तरह रखा है”.हरमुनिया मास्टर ने भी हवा देकर हरमुनिया की रीड को ठीक किया..सारे झलवाह तैयार हैं। इधर टेर देने वालों ने भी कमर कस लिया..इनको देखकर लगा कि सब लोग आज ही बज्रासन सीखकर आएं हैं.तब तक नथुनी बाबा ने चिलम में गाँजा चढ़ाया.और शिव जी के फ़ोटो को दीखाकर बोल पड़े.

बोलीं बोलीं शंकर भगवान की जय-बोलीं बोलीं काली मईया की जय.हरमुनिया मास्टर ने धुन बजा दिया- ढोलक वाले ने एक जोर से तिहाई मारा – तक धीं धा धा धा,तक धीं धा धा धा,तक धीं धा धा धा
बाबा के मुंह से निकल गया.

शिव शंकर खेले फॉग 
जोगिन संग लिए..
दुक्खी ढोलकवाह ने झट से दीपचंदी शुरू कर दिया..
धा धीं धा धा धीं s
कोरस गाने वाले तार सप्तक पर जाकर कोरस देने लगे..
संग लिए हो संग लिए
शिव शंकर खेले फाग.
गौरा संग लिए….

traditional village holi
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थोड़ी ही देर में गाँव की फिजाएं इस सामूहिक नाद से गूंज उठीं.एक बार लगा मानों गांव के कोने-कोने जो साल भर कटाई-दँवाई से थक गए हैं.वो आज तरोताजा हो रहें हैं। गांव के रगों-रगों में एक लहर सी दौड़ गई है.इस लहर में बस उत्तेजना नहीं एक स्थायित्व है.जो आज गीत से नहीं लोक की आत्मा के संगीत से पैदा हुआ है.जो काट रहा है अवचेतन में छिपे वर्षों पुराने नैराश्य को.साट रहा है बेचैनी की उगती दरारों को.छाँट रहा है उदासी के घने बादलों को..और बरस रहा वो बादल जिसका इंतजार वर्षों से था.लोग बाबा बार-बार दोहराते हैं.शिव शंकर खेले फॉग गौरा संग लिए।

फगुआ सुन रहे अस्सी साल के सुदामा बाबा पगड़ी सही करते हुए सोचतें हैं..अहा!  लोकगीतों में हमारे  शिव जी ने क्या आदर पाया है.जय हो औघड़दानी तोहार महिमा केहू न जानी.इधर शिव जी के स्थान से कुछ दूर एक घर में रोटी बेल रही भौजी का चेहरा देखते बनता है.अचानक उनका हाथ तेज हो जाता है.चूड़ियां और खनखनाने लगती हैं.मानों ये चूड़ियां भी दूर बज रहे ढोलक की संगति कर रहीं हों।

छन छन छन्न छन्न
धा धीं धा धा धी

लीजिये तब तक आवाज बदल गयी..ये आवाज कुछ जानी पहचानी सी लगती है…भौजी से उनकी जेठानी ने आकर कहा…।अरे रीमा लग रहा बबुआ जी गा रहें हैं..हो .सुनाई दे रहा- भौजी मन ही मन मुस्काती हैं..हाय ! सच में दीदी..उनके सैयां जी इतना बढ़िया गातें हैं..उन्हें तो पता ही नहीं था-तब तक आवाज गाढ़ी और स्पष्ट हो जाती है।

“नकभेसर कागा ले भागा
मोरा सैयां अभागा ना जागा”

ये लाइन सुनकर भौजी को याद आने लगता है सब कुछ..उनके भी सैयां जी आजकल रात भर गेंहू में पानी चलाकर आतें हैं तो उनको भी कहाँ होश रहता है जी.इस एक लाइन में समूचे फागुन का दुख कह दिया गया है। शायद समूची ग्राम्य प्रियाओं की किस्मत में यही लिखा है कि खेत से थके-मांदे आए उनके सैयां जी सो जाएंगे.और कम्बख्त ये कागा उनकी प्राण प्रिय के नाक से  नकभेसर लेकर कहीं दूर भग जाएगा.हाय! रे सैयां जी और हाय ! रे कागा की हिम्मत..तब तक अगली लाइन आती है.
“उड़ी-उड़ी कागा पलंग पर बैठे
सेजिया का रस ले भागा
मोरा सैयां अभागा ना जागा”

भौजी मारे शरम के लाल हो जातीं हैं..और याद आता है वो सब कुछ जो देवर और ननद के तानों में जब भी सुनाई देता है उनके कपोलों पर लाज की एक लालिमा सी उभर आती है.लीजिये तब तक ताल बदल गया है..अब विकास बाबू ने झाल सम्भालकर गा दिया है.”गोरिया पतरी जइसे लचके लवंगिया के डांढ़”ये सुनकर दूर बैठे गाँव के एक मात्र हिंदी के मास्टर साहब अपने एक छात्र को समझा रहें हैं.”देखा तो जरा.सिर्फ बड़की-बड़की कविताओं में नहीं.लोकगीतों में भी अद्भुत उपमा होती है.ध्यान से सुनो यहां कवि कहता है कि नायिका इतनी पतली है कि उसकी कमर लौंग के पेड़ की डाली जैसी हिलती है.उनके पास बैठे लोग सहमति में सर हिलाते ही हैं.तब तक अगली लाइन आती है।

“पनवा नियर गोरी पातरी
फूलवा नियर सुकुवार हो”

सबका हृदय पुलकित हो जाता है। अंत जोगीरा से होता है.जोगीरा यानी भोजपुरीया क्षेत्र की एक शैली जिसके रस में डूबे बिना फगुआ सुनना बेकार जान पड़ता है। बैजनाथ बाबा गांव के नामी जोगीरा गायक हैं..भर फागुन गांव की भौजाइयों के वो एक मात्र देवर बन जातें हैं क्योंकि उनके मुंह से जोगीरा सुनना राम के मुंह से रामकथा सुनने जैसा लगता है…बाबा ललकार दिये हैं।

सारा रा जोगीरा सा रा रा
वाह भाई वाह ,बाह खेलाड़ी वाह

होली खेले चारो भइया महान
चारों भइया महान
वाह जोगी जी वाह,वाह खेलाड़ी वाह

डंका बजावेले वीर हनुमान
सिया राम चन्द्र की जय। 

वाह-वाह वाह..जियो रे जवानों.. अद्भुत आनंद अद्भुत।इस तरह आज पहले दिन फगुआ के ताल ठोकाई की रस्म विश्राम लेती है। फिर तो बसन्त पँचमी के बाद शिव जी के मन्दिर पर हर सोमवार और शुक्रवार को फगुआ गाने का ये क्रम चलता है.खूब गाया जाता है.हर बार ऐसे ही भौजी मचलती हैं,हर बार हिंदी वाले मास्टर साहब खोज लातें हैं लोक साहित्य में छिपा अलंकार,रस और भाव,हर बार गाँव कुछ देर तक अपने दुख भूलकर खो जाता है कहीं आनंद की रसधार में।

लेकिन आज ये कहानी कहने का तातपर्य नास्टेल्जिक महसूस करना नहीं है.मेरे लिए इसे याद करना अपनी जड़ों को पानी देना है.अपने अंचल की सुगन्धित माटी में परम्परा की दिया-बाती जलाना है। इधर मैं बड़ी बेचैनी से देख रहा हूँ-आज गाँव में सन्नाटा है.इस सन्नाटे को रोजगार के लिए गाँव छोड़ चूके लोगों का दुर्भाग्य कहूँ या जल्दी-जल्दी आधुनिक बन जाने की छद्म मानसिकता का दुर्भाग्य.

कल ही पता चला है मोती मिसर जो खेती करते थे वो नवेडा में मजदूरी करने लगे हैं..जो रजिन्नर गाय और भैंस पालकर गुजारा कर लेते थे..वो लोधियाना में जाकर किसी मिल में मजदूर हो गए हैं….झगरू ने सूरत में पान की दुकान खोल ली है..दुःखी ढोलकवाह को मरे दो साल हो गए..जो विकास बाबू गाँव की चिंता में दुबले हुए रहते थे वो बड़का नेता बनकर कई फ्लैट के मालिक हो चूके हैं।

अब गांव के फगुआ को गाँव की इज्जत से जोड़ देने की परंपरा खत्म अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है.गाँव की ढोलक बारहों महीने फटी रहती है.हारमोनियम की भाथी तो सरजू बाबा के साथ ही चलती बनीं.मंजीरा का नन्हा घुंघरू टूटकर गांव की किस्मत पर रोता है.गाँव में जिसके पास पैसा है..वो शहरों में जमीन ले रहा है..और जिसके पास नही है वो जल्दी से जल्दी पैसा कमाने का बंदोबस्त कर रहा है.गाँव के लड़के शिव जी का मंदिर साफ नहीं कर रहे वो यू ट्यूब पर होली सुनकर ही खुश हो रहें हैं।

घूम-घूम कर घर-घर होली गाने और रंग लगाने की वो आत्मीयता पर धुंध छा गया है.लोक संगीत की जगह भोजपूरी के फूहड़ गीतों ने ले लिया है।खेत,सिवान,ताल-पोखर,बाग-बगइचा और घनी अमराई बस कविता बनकर रह गए हैं। अब होली के एक दिन पहले बम्बई,सूरत, अहमदाबाद,नोएडा, और फरीदाबाद से कमासुत लोग जैसे-तैसे ट्रेन में लदकर गाँव आतें हैं।और फगुआ बीतते ही वैसे लदकर चले जाते हैं.

खेती में पैसा नहीं..न ही शहर में रोजगार कोई कमाए न तो खाये क्या.यहाँ कलपती हैं उनकी ब्याहताएँ.. उनके सपने..और चौड़ी होती रहती है आर्थिक असमानता की खाई। कई बार लगता है कि आदमी शहर की तरफ भग रहा है.पर क्या उसे पता चल पा रहा कि वो अपने पीछे क्या-क्या छोड़ रहा है.?

उसे कब पता चलेगा की होली के रंग सिर्फ कागज़ों की पुड़िया में लिपटे महज कुछ केमिकल नहीं हैं..ये प्रतीक हैं हमारे अवचेतन में बसे प्रेम के।ये हमारे मनुष्य होने के प्रमाण हैं.जो आत्मकेंद्रित होते मनुष्य के संकुचित चित्त को उदात्त बनातें हैं। जो बताते हैं कि लाख आधुनिक हो जावो अपनी जड़ों से जुड़े रहने वाले ही छायादार वृक्ष बन पातें हैं।

हमें सोचना होगा कि हमारी परम्परा रूपी नकभेसर को आधुनिकता का कागा बड़ी तेजी से लेकर भग रहा है..और हम सैयां अभागा बनकर बारहों महीने सो रहें हैं.अगर समय रहते नहीं जगे तो त्यौहारों की खूबसूरती सिर्फ व्हाट्सएप के कॉपी-पेस्ट मैसेजों तक सिमट कर रह जाएगी।

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