चिंतन,chintan,chintan ke phayde,

यूँ तो शंका किसिम किसिम की होती है..लेकिन अभी शंका के मुख्यतः दो प्रकार हैं..एक लघु शंका और दूसरा दीर्घ शंका..दीर्घ शंका ऐसी शंका है जिसका समाधान होते ही सम्पूर्ण लघु,मोट,पातर,छोट,चाकर,किस्म की  समस्या का अपने आप समाधान हो जाता है…इसलिए  दीर्घ शंका का अपना महात्म्य ,और दीर्घशंकालय की महिमा अपरम्पार है….अगर आप मेरी तरह आरएसएस के स्कूली उत्पाद नहीं हैं,तो दीर्घ शंकालय  को शौचालय  कहकर काम चला सकतें हैं..जिस पर आगे हम टार्च लेकर परकास डालने जा रहे हैं।

हाँ तो मितरों…कायदे से शौचालय का नाम सोचालय होना चाहिए..यदि आप आवश्यकता से अधिक बुद्धिजीवी हैं तो इस सोचालय को चिंतनालय का नाम देकर हिंदी  शब्दकोश के साथ आसानी से छेड़ छाड़ कर सकतें हैं…

आपको बता दें कि शौचालय का चिंतन से बहुत गहिरात्मक  नाता है..क्या कारण है कि शौचालय में जाते ही एक आम भारतीय की आत्मा में  अरस्तु,सुकरात के साथ रफ़ी ,किशोर हनी सिंग एक साथ प्रवेश कर नागिन डांस करने लगतें हैं.?.इस टॉपिक पर व्यापक शोध होना अभी बाकी  रह गया है।

शंका के साथ शंकालय के भी नाना प्रकार हैं..लेकिन इस नितांत निजी स्थान  पर   परकास डालना  उचित नहीं। हम कुछ सार्वजनिक स्थानों पर टार्च जलाते हैं।

जैसे कभी भारतीय  रेलवे में शौचालय रूपी शंकालय केवल  दिव्य  निपटान और चिंतन की जगह ही नहीं अपितु अपनी साहित्यिक और चित्रकला प्रतिभा को प्रदर्शित करने का एक उत्तम स्थान भी होता था…मने पिंकिया के पेयार में  पगला कर घर का चावल बेच शीशमहल सनीमा हाल में ‘बेवफा सनम’ को तिहत्तर बार देख चूका मंटुआ..

जब बलिया से रसड़ा की गाड़ी पकड़ता तो सबसे पहले मूसा का गुल खाने के लिए शौचालय  का रुख करता था…और दिव्य निपटान के परम आनंद से आनंदित होकर  जब उसे पिंकी की याद सताती,तो वो अपने ऊपर वाले पाकेट से लिखो फेखो वाली कलम निकालता ,और अल्ताफ राजा को गुनगुनाते हुए,अपनी जाने मन दिल रुबा की बेवफाई को शिद्दत से  याद करता…फिर एक आम के आकार का दिल बनाकर .उसे धनुष के  आकार के तीर  से,उस पिंकिया के बेदर्दी से दिल को बेध देता… फिर अपने दिल पर चार किलो पत्थर रखकर लिखता…”आई लव यू बेवफा पिंकी..तुम्हारा प्यार में हमेशा  से पागल.. “मन्टू.”

आह!..ये लिखकर उसे कितन सुख मिलता इसे बताने के लिए मेरा शब्दकोश शब्दहीन है…इतना समझिये कि वो सुख के मारे आँख बन्द कर लेता था..और पांच मिनट बाद जब आँख खोलता तो देखता की उसके पिंकिया के दिल के बगल में किसी महान चित्रकार ने एक कालजयी चित्र बनाकार बायोलॉजी के साइन्टिस्टों और वात्स्यायन से लेकर मस्तराम के  सामने गम्भीर चुनौती पैदा कर दिया है.

उस चुनौती के ठीक दाहिने साइड किसी करिमना ने पेयार में फ्रस्टेसियाकर किसी फरजाना खातून का फोन नम्बर लिखके ये एहसास करा दिया है कि भारत का सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय बहुत मजबूती से काम करता है। इन सभी शायरी,कविता, चित्र कला के ठीक ऊपर  हर प्रकार के नाकाम, स्वप्नदोष,शीघ्रपतन के रोग के महान वैद्य और वशीकरण इंद्रजाल के विशेषज्ञ   हकीम एम लुकमान का  विज्ञापन मुस्कराता.इन सब कविता पेंटिंग्स और हकीम एम लुकमान को एक साथ देखने के बाद ये यकीन हो जाता है कि अधिकतर भारतीय बुद्धिजीवी,लेखक कलाकार,कवि वैचारिक  शीघ्रपतन के  शिकार हैं..

मितरों…जमाना बदल गया है..आज इन सभी शंकालय की दीवारों की जगह फेसबुक,ट्विटर और what’s app की दीवालों  ने ले लिया है..जिस पर अभी भी कई  कई मंटुआ करिमना अपना फ्रस्ट्रेशन निकाल रहें हैं।
चिंतन ,chintan,chintan ke phayde

कई हकीम एम लुकमान और हकीम एम जुबैर अब सिर्फ सोमवार को नहीं हर रोज फेसबुक पर गुप्त रोग का इलाज कर रहें हैं। इसलिए ये कला अब खतरे में है…

लेकिन मितरों…इन सार्वजनिक शैचालय की दीवारो पर उकेरी गयीं ये कृतियाँ हमारी धरोहर हैं…यूनेस्को भले अपनी विश्व धरोहर की सूची स्थान न दे…लेकिन हमे अपनी इस महान शंकालीय कला परम्परा पर गर्व है…दुनिया देखकर पगला सकती है कि एक भारतीय निपटते समय भी कला ,साहित्य और दर्शन के चिंतन में मगन रहता है…वो भारत  विश्व गुरु ऐसे ही नहीं हो गया था..”कुछ बात है की हस्ती मिटती नही हमारी”…

हड़प्पा मोहनजोदड़ों की दीवारे गवाह हैं कि हमारा सदियों से कला और साहित्य पर एकाधिकार   रहा है….
हमारी रेलवे के  दरो-दीवाल पर हुई उत्तम पेंटिंग को यदी पिकासो देख  लेते  तो पेंटिंग करना छोड़ आठवी शादी रचाकर सन्यास ले लेते…उस सद्भावना एक्सप्रेस के एस 7 में यदि न्यूटन जाते तो  शंकालय की दीवार देखकऱ ‘ला आफ मोशन’ का चौथा नियम ये बताते की..”हर भारतीय का मोशन उसके इमोशन से जुड़ा हुआ होता है।”उस चार बजे वाली पसेंजर के चौथी बोगी के निपटान केंद्र में लिखी  कालजयी शेर को यदी ग़ालिब और फैज़ पढ़ लिए होते तो वो शायरी नहीं बल्कि किसी फारचून की दूकान पर अरहर की  दाल बेच रहे होते….

मितरों…शोध हो या न हो लेकिन इतना तो पता है कि हम भारतीय जन्मजात कवि,संगीतकार और चित्रकार पैदा होते हैं…वो तो कमबख्त मैकाले की शिक्षा पद्धति से निकली डिग्रीयों का दोष है जो किसी कवि फलाना को बीटेक्स के बाद इंजीनीयर  बना देती है…और चिलाना भगत को एमबीए के बाद लेखक बना देती है।

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