सावन का इंतजार बेसब्री से है.का लइका का जवान.भइया से लेकर भौजी तक.अम्मा से लेकर बाउजी तक.मजदूर से लेकर किसान तक.
रामसुधी परसान हैं कि अब बरखा बरसेगा तो गाय कहाँ बांधेंगे.?.एक मड़ई छाना पड़ेगा न?..उस पर तिरपाल लगाना पड़ेगा.इसी में धान रोपना है.लेव लगाकर बियड़ लगाना है.बेटी को तीज भी तो भेजना है.काल्हे फोन आया उसका. “माई रे…तीज लेकर बाबूजी जी को जरूर भेजना.”
अरे! करेजा पर पत्थर रखकर अमीर खुसरो ने गाया होगा…..
‘अम्मा मेरे बाबा को भेजो री…की सावन आया.. ‘
लेकिन रामसुधि का करेंगे बड़ी दुःख है..अबकी पइसा रुपया का उहे हाल है.मुश्किल से खाने भर को गेंहूँ हुआ है.पता न इस साल भी बरखा बरसेगा की सूखा राहत का चेक भजाना पड़ेगा.पिछले साल तो अकलेस सरकार का राहत वाला पइसा परधान आ लेखपाल मिलकर खा गए.
गांव में जो ज़िंदा हैं उनको एक पइसा नहीं मिला.जवन स्वर्गवासी हैं उनके नाम से चेक भी भंज गया..
“बाह रे समाजवाद…..”
पूरुब टोला वाली खेदन बो भौजी ने खेदन से कह दिया है ……’सुनिए जरा उ हरियर रंग का फाल लेते आइये तो रेवती से…..माई जवन साड़ी दी है उसी में लगाना है….लाल-पियर नहीं पहनेंगे अब..सावन आ रहा है.हरियर-हरियर चूड़ी पेहनेंगे…आ मेहँदी लगाकर ,आपका नाव बीच हाथ पर लिखेंगे…तीज भी तो भूखना है…इसी में काली माई डीह,बाबा का पूजाई करना है….नइहर जाना है भाई को राखी बाँधने.आ भर सावन सांझी खा पेड़ पर झूला झूलते हुए कजरी भी तो गाना है…”
‘पीया मेहँदी लिया द मोतीझील से
जाइ के साइकिल से ना’…”
आ ए ही सबसे बरियार चिंता ये है कि तीन बीघा धान भी रोपना है…ना त चइत में चावल ख़तम हो जा रहा है…क्या खाया जाएगा।”?
अच्छा…इधर भी सावन की तैयारी है.. सोहन ,पिंकू,चनमनवा,मुनेसर आ बरमेसर भले आज तक अपने माई बाप को एक गिलास पानी न दिये हों..बाकी इस बार दू क्विंटल गेंहूँ बेचकर जल ढारने देवघर जरूर जाएंगे….ना त बाबा भांग वाले खिसिया गए…त तिलकहरु भी नहीँ आएँगे.
इधर दरभंगा घाट के शास्त्री जी से उनकी मरखाह प्रेमिका ने परम रोमांटिक मूड में कहा है.’खाली दिन भर निरहुआ के फिलिम देखेंगे’.?.अबकी सावन में “आशिकी टू” और “उड़ता पंजाब” नहीं देखे मेरे साथ तो कसम तुम्हारे पतरा क़ी… ऐसा जतरा बना देंगे कि पतरा देखने लायक नहीं रह जावोगे।”
धमकी को संज्ञान में लेते हुए कल शास्त्री जी दिन भर बनारस में उड़ते हुए आशिकी वन, टू के बाद थ्री तक मांग रहे थे…..दुकानदार ने कहा “पंडी जी आशिकी थ्री यदी आप पण्डिताइन के संगे मिलकर बनाएंगे तो हम प्रोड्यूस करने के लिए तैयार हैं ” शास्त्री जी लजा गए….उनकी आशिकी तो सिर्फ आशिकी है…वन-टू-थ्री तो फिलिम में होता है जी।
इधर सावन बरसने को बेकरार है..तपने के बाद भीगने का सुख कहने के लिए नई भाषा ईजाद करनी पड़ेगी..लेकिन इधर लगने लगा है कि जीवन में प्रेम बना रहे तो मानसून 15 जून की बजाय 15 अप्रैल को भी आ सकता है…न हो तो 15 जुलाई कि रात भी जून के दोपहर जैसी लगेगी..अरे जीवन में प्रेम हो तो जेठ भी सावन है.।
अब दिन भर फेसबुक पर रोमांटिक फील करने वाले लौंडे क्या जानें उन खण्डहर हो चुकें अरमानों का दर्द…जिनको आज तक किसी नाज़नीं ने प्यार से नहीं देखा….उनके लिए सावन को ‘सीजन आफ लव’ कहना सावन की बेइज्ज़ती करना है न ?
अरे प्यार का कोई सीजन नहीं होता…जब प्यार है तब सावन है…तभी नीरज ने लिखा.
“अबकी सावन में शरारत मेरे साथ हुई
इक मेरा घर छोड़ सारे शहर में बरसात हुई”
तीस पर कल बीएचयू के ब्रोचा हॉस्टल में रहने वाले डाक्टर साहेब ने गुला वीर बाबा मन्दिर के पीछे बने ‘पिया मिलन केंद्र’पर अपनी डक्टराइन का हाथ अपने हाथ में लेते हुए गाया.
“तुमको तुम्ही से मैं एक दिन चुरा लूंगा
सावन को आने दो तुझे गीतों में ढालूँगा”
डक्टराइन लजा गयीं…और आला रखकर कहा…
‘आइये न सावन महराज……. ‘
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