सौरभ सिंह शुजा और ईवीएम (बुद्धि हैकिंग की प्राचीन कथा )

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तब हम छठवीं के छात्र थे..यानी कक्षाकार्य और गृहकार्य में पिस रहा….खेलने और टीवी देखने को तरस रहा…हिसाब से पढ़ने के लिए बेहिसाब लात,जूता,चप्पल खा रहा,एक मासूम बच्चा।

लेकिन एक दिन सितम की इंतेहा तब हो गई जब स्कूल पहुँचते ही पता चला कि अपने बागी जिला बलिया के छात्र सौरभ सिंह ने नासा की परीक्षा में पूरी दुनिया में प्रथम स्थान प्राप्त किया है।

यहाँ तक कि इसके पहले इस दुनिया की सबसे कठिनतम परीक्षा को राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम ने ही पास किया है..बाकी भारत में जो भी परीक्षा दिया है,सब फेल हैं।

लीजिये सर..हुआ हल्ला,मोहल्ले से लेकर गाँव तक,चाय की दुकान से लेकर थरिया-चम्मच की दुकान तक राग सौरभ गाया जाने लगा।

सुबह-सुबह क्लास में पहुंचते ही आचार्य जी ने सौरभ का उदाहरण देते हुए मेहनत,लगन और समर्पण की वो घुट्टी पिलाई कि पहली ही घँटी में नींद आने लगी.

और हम जैसे साधारण छात्र सोचने लगे कि “यार जिस उम्र में हम अभी शक्तिमान देखकर तमराज किल्बिश को मारने में व्यस्त हैं.. साला उसी उम्र में सौरभवा ने वर्ल्ड को टॉप कर दिया रे अनूपवा”.

उसी में से कोई कहता कि..”अरे! आदित चुप ससुर…हमारे फुआ के गाँव का है सौरभ..फूफा की दोकानी पर रोज लेमनचूस खरीदने आता था। कोई कहता है कि अरे! वही हमारे नानी का गाँव है। हम गर्मी की छुट्टी में सौरभ भिया के साथ गुणपियंता खेलते थे।

फिर तो पूरे स्कूल से बाहर आते ही वही चर्चा….क्या बड़े,क्या बूढ़े जिसको देखो,जहाँ देखो… सौरभ सिंहवा क्या कमाल कर दिया रे…बलिया जिला का लाल…नासा को उखाड़ के रख दिया।

साला जिल्ला में एक चन्द्रशेखर जीऊवा था कि संसद हिला दिया कि एक सौरभे सिंगवा है कि नासा हिला दिया..और एक हमारे घर में हैं ससुर लोग कि इनको टीवी का एंटीना हिलाने से फुर्सत नहीं है।

अब तो साहब अगले दिन जिले के सारे अखबार सौरभ सिंह की प्रशस्ति गान से भर गए..

किसी ने उसे जन्मजात प्रतिभाशाली बताया तो किसी ने बताया कि वो कितने घण्टे पढ़ाई करता है। किसी ने बताया कि इतना आज्ञाकारी लगनशील बालक इस सदी में पहली बार पैदा हुआ है।

और अगले दिन से तो सौरभ सिंह के ममी-पापा,फुआ-फूफा सबका इंटरव्यू छपने लगा। और एक हफ्ते ऐसी बयार चली कि हमारे जैसे तमाम लड़के-लड़कियाँ अपनी किस्मत पर रोने लगे।

दुःख तो तब गहरा गया जब हाईस्कूल में तीन बार फेल भी हमें इस कदर डाँटने लगे कि हम लालटेन लेकर सुबह चार बजे उठ नासा की तैयारी करने लगे।

साहेब वो दिन…हमारे जैसे हजारों छात्रों के जीवन के बड़े ही कष्टकारी दिन थे।

कारण ये कि सुबह अखबार आते ही मुख्य पृष्ठ पर सौरभ सिंह…जिधर जावो सौरभ सिंह..जहाँ सुनों सौरभ सिंह…

कुछ अखबार तो एक हफ्ते दो पेज का सौरभ सिंह विशेषांक ही निकालने लगे.. मानों जनपद में इस तरह की हस्ती न कोई थी,न होगी।

साहब दिन बीतता गया..यही जाड़े के दिन थे…सरस्वती पूजा की तैयारी में एक रत्ती मन नहीं लग रहा था। हम जैसे तमाम छात्रों की धड़कनें तेजी से धुकधुका रही थीं..तब मोबाइल और सोशल मीडिया था नहीं..लोग ट्रेक्टर ट्राली और जीप से सौरभ सिंह के घर जाकर दर्शन करने लगे..और अपने-अपने बच्चों को भभूत लगाने लगे।

देखते ही देखते हर गाँव में,टोले में मोहल्ले में,कोई न कोई सौरभ सिंह का रिश्तेदार निकल आया। कोई उनकी आर्थिक दशा बता रहा है। कोई ज्योतिषी ये बता रहा है कि सौरभ सिंह की कुंडली में शुक्र और शनिचर के ऊपर बृहस्पति कुर्सी लगाकर बैठ गया है..इस कारण से ये सुखद घटना घटी है।

कोई कहता कि राष्ट्रपति सौरभ को चाय पर बुलाए हैं। कोई कहता है पहले राज्यपाल के साथ चाह पिएगा तब न..कोई कहता कि नहीं रे कलाम साहब के बाद देश को इतना बड़ा वैज्ञानिक मिल रहा है..तो पहले कलाम साहब ही न साथ में चाय पिएंगे।

लेकिन रही सही कसर तब हो गई जब तत्कालीन मुख्यमंत्री माननीय मुलायम सिंह यादव जी ने सौरभ सिंह को पांच लाख रुपये के पुरस्कार की घोषणा कर दी..और राज्यपाल से लेकर राष्ट्रपति तक ने उनको लंच और डीनर पर बुला दिया

और साहब इसके बाद तो अखबारों में जनपदीय पेज पर छपने वाले सौरभ सिंह ने मुख्य पृष्ठ पर जगह बना ली..और एक हफ्ते में राष्ट्रीय प्रतिभा से अंतराष्ट्रीय प्रतिभा का दर्जा पा लिया।

जिले के तमाम स्वयंसेवी संगठनों ने उसे पुरस्कार से लाद दिया… हम सब का और जीना मुहाल हो गया। पाँच घण्टा मेहनत करो तो दो रुपया छोला खाने को मिलते हैं..और साला ई पाँच लाख ले गया..बाप रे..

लेकिन इसी बीच हुआ एक एक्सीडेंट।

राष्ट्रपति कार्यालय से लिखित सूचना आ गई कि नासा न इस प्रकार की कोई परीक्षा आयोजित करती है और न ही राष्ट्रपति कलाम ने कभी इस प्रकार की परीक्षा में भाग लिया है।

लीजिये हुआ बवाल..ई आफत..ई का हुआ रे..

फिर गाँव-गाँव हल्ला हो गया कि ई तो सरवा देश भर को मूर्ख बना दिया रे पिंटूआ..अरे परमोद तोर फुआ का लइका तो फ्राड निकल गया रे।

फिर तो जो मीडिया बिना तहक़ीक़ात के सौरभ सिंह की प्रशस्ति गान में बिछ गई थी उसने ही अगले दिन से तमाम फ्राडगिरी उजागर करने लगी…जो लोग सौरभ की सफलता के बाद उनके नाजायज रिश्तेदार बन गए थे,वो गमछा से मुँह छिपाकर भागने लगे।

और उसके बाद शुरू हुआ हम जैसे हज़ारों छात्रों का टाइम। जो बेचारे पन्द्रह दिन से न ठीक से सो रहे थे,न जग रहे थे। वो सब गार्जियन के सामने सीना तानकर चलने लगे।

और फिर देखते ही देखते धीरे-धीरे सौरभ सिंह का ख़ुमार उतर गया।

आज इस घटना को सालों बीत गए हैं..जिसको याद करते हुऐ दिल-दिमाग़ एकदम नास्टेल्जिया मोड में चला गया है।

लेकिन ठंडी सी बारिश में चाय पीते हुए ट्वीटर, फेसबुक और अखबार चेक करते हुए जबसे हमने उस ईवीएम हैकर सैयद सूजा का नाम सुना और उस नाम पर देश के राजनेताओं और बुद्धिजीवीयों का नागिन डांस देखा है,तबसे न जाने क्यों हमारे बागी बलिया का वो वीर सौरभ सिंह याद आ रहा है।

कहना न होगा कि आज जब समूची दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की तरफ बढ़ रही है। चीन ने मंगल पर कपास उगाकर लहसुन धनिया बोने की तैयारी शुरू कर दी है। टेस्ला के एलन मस्क पहले लोगों को मंगल पर हनीमून मनाने का प्रबंध कर रहा है।

उस दौर में में सैयद सूजा की घटना पर विलाप करने वाले लोगों को देखकर लगता है कि हम अभी भी सौरभ सिंह बनाने में जुटे हैं।

हम न किसी किसी के दावे का नीर-क्षीर विवेचन करना चाहतें हैं न ही हम सत्य के लिए अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को ताक पर रखने की हिम्मत करना चाहतें हैं।

कांग्रेस और उसके सहयोगी नेताओं का तो समझ में आता है कि तीन राज्यों में बीजेपी को हराने के बाद भी उनका हाल..रेलवे में यात्रा कर रहे उस पहलवान का हाल है.. जो दीवारों पर गुप्त रोग विशेषज्ञ का विज्ञापन पढ़कर खुद को नाकाम महसूस करने लगता है..

लेकिन.. खुद को बुद्धिजीवी,समझदार और तर्कशील कहने वाले लोग जब इस ईवीएम का रोदन करने लगते हैं तब निराशा घेर लेती है। और लगता नहीं कि इस ईवीएम रूपी गुप्त रोग का इलाज किसी हकीम लुकमान के पास होगा।

केवल और केवल हँसी आती है और दुःख होता है कि जिस देश और समाज में तमाम नायक लगन,समर्पण के बावजूद एक लोकल अखबार में भी नाम नहीं दर्ज करा पाते वहाँ एक संदिग्ध व्यक्ति एक शिगूफा छोड़कर समूचा देश को बहस करने पर मजबूर कर देता है…तो इस देश में इससे ज्यादा हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण कुछ और नहीं हो सकता है।

atulkumarrai.com

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