रतिया कहाँ बितवला ना…..

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सम्पूर्णआनंद विश्वविद्यालय वार्षिक परीक्षा
कक्षा- तेरह
बिषय- समाज शास्त्र
पूर्णाक- 420

परीक्षार्थी… कूदन  शास्त्री
रोल नम्बर…रोज रोज लिखीं मरदे काल्ह लिखले रहनी न (प्रवेश पत्र पर एगोड़ी के आई लव यू लिख के दे देले बानी)

प्रश्न…..कहाँ बीतवला ना रतिया कहाँ बितवला ना?
बताद शीलवा रहे की फूलमतीया रतिया कहाँ बीतवला ना।।?
इस परम लोकप्रिय गीत पर प्रकाश डालें…और इस गीत की समाजशास्त्रीय विवेचना करें..(टार्च जलाकर प्रकाश डालने पर पर दस नम्बर अतिरिक्त दिए जाएंगे।)

उत्तर….
भावार्थ…… प्रस्तुत गीत को ‘कहाँ बितवला ना’ एल्बम से लिहल गया है’ गीत के कुकवि फलाना जी हैं…जिसे आवाज देकर अत्यंत अश्लील और सुमधुर  शैली में गाया है… सीरी फलनवा दिलदार जी ने…इस गीत ने लोकप्रियता के सारे खम्बे उखाड़ पखाड़ दिये हैं… करुआ तेल और गन्ना के रस जैसे गायकों ने गायकी छोड़कर भर  जून भूजा और बरफ बेचने का प्लान बना लिया है।। सदमें में कुछ अश्लील गायिकावों के पैर भारी होने कि खबर भी है।
प्रस्तुत गीत में कवि विरह में तड़प रही नायिका का चित्रण करता है….चित्रण और चलचित्रण इतना गहिराह है क़ि उसे देखकर आज जायसी पद्मावत पार्ट टू इन भोजपुरी लिखने पर विचार करते।
रीतिकाल के तमाम कवि भक्तिकालीन कवितावों का अध्ययन करते और किसी राजपत्रित अधिकारी से अपना चरित्र प्रमाण पत्र बनवाते।
कवि गीत में चित्रण करते हुए स्पष्ट करता है कि…रात को बाहर रहने वाले हर भोजपुरिया लौंडे को अपने चरित्र प्रमाण पत्र कि छाया प्रति अपनी बीबी से सत्यापित करवाना जरूरी है।।
उसका चरित्र संदिग्ध पाया गया है..
शादी से पहले ऊख गन्ना और रहर में  मेहनत करने  वाले लौंडे की  आदत अभी भी सुधरी नहीं है । बिरहन कहती है….
“बता द शीलवा रहे की फूलमतिया?

यहां स्पष्ट होता है कि विरहन को अपने सौतनों का नाम तक पता है..जो लौंडे के लूज करेक्टर की पुष्टि करता है।

“रात भर पीयले बानी पानी फिरिज के

विरहन विरह कि गर्मी से इस कदर झुलस रही है कि रात भर उसने फ्रिज का पानी पीया है….यहां स्पष्ट होता है कि शादी बाद फ्रिज लौंडे को दहेज में मिला है…हमें दहेज पर कानून बनाना चाहिए।

“अपने से ठंडा कइले बानी अपना चीज के

विरहन कहती है कि हे प्राण नाथ उर्फ़ मटिलगनू पीया.. आपको देखने मात्र से ही मैं भोर की पूरुवा बयार हो जाती हूँ।
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लेकिन आपकी अनुपस्थिति ने आज फ्रिज के पानी की विभिन्न  उपयोगिता पर मुहर लगा दिया है…

‘रुसल बा  बाली बिंदिया नीद नइखे आइल
काल्ह के जुदाई हमसे नईखे सहाइल”

यहां कवि कलम तोड़कर  स्याही पी जाता है…भोजपुरी में साहित्य का ऐसा उच्चस्तर यदा कदा ही देखने को मिलता है..विरहन कहती है…हे उफरपरनू पीया.आपकी जुदाई के दर्द को बर्दास्त करने के लिए मुझे टिका लगवाना पड़ेगा क्या ? आज बाली और बिंदिया  तक रूठ गयी हैं….अरे तहार जवानी में माचिस बारो…

“रात भर अंचरा प लिखले बानी आई लव यू
हम नाही जननी की बाड़ा बेदर्दी तू

यहां विरहन का कमिटमेंट स्पष्ट दिखता है..उसके प्रेम की पराकाष्ठा है….कवि यहां स्पष्ट करना चाहता है कि लौंडा कितना भी करेक्टर का लूज हो…गाँव की स्त्री उसे भोले शंकर ही समझती है..वो इतने करेक्टर लेस सइयां का नाम बार बार अपने आँचर पर लिखते हुए जवानी में  अँचार डालने के बारे में सोचती है।

सुधारा अबो से आपन अदतिया…..

यहां विरहन हिदायत देती है..अभी से अपनी आदत सुधार लो वरना…..
प्रस्तुत गीत से स्पष्ट है कि नशाखोरी और शिक्षा का अभाव, दहेज और जागरुकता के अभाव  ने हमारे समाज की जड़ में चरस बो दिया है।
ऐसे सामाजिक गीत कि जितनी  तारीफ़ की जाय कमें है…गीत को bifaa मारीशस में सीरी रवि किसन सीरी खेसारी लाल और सीरी निरहू लाल जी के हाथों सम्मनित किया जाना चाहिए।

             ख़तम

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