पियवा से पहिले हमार रहलू ( सन्दर्भ सहित व्याख्या )

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प्रश्न – भोजपुरी के लोकप्रिय गीत ‘पियवा से पहिले हमार रहलू’ की सन्दर्भ सहित व्याख्या करें।

अथवा

“रात दिया बुता के पिया क्या-क्या किया” की सारगर्भित विवेचना करें।

उत्तर – प्रस्तुत करेजा फॉर गीत “पियवा से पहिले हमार रहलू” नामक एलबम से लिहल गया है,इस गीत को अब तक पौने तीन हजार कवियों ने लिखा और मात्र साढ़े चार हजार गायकों ने गाया है.

भारतीय मौसम विभाग ने गायकों की संख्या बढ़ने की आशंका जताई है..वहीं नासा का मानना है कि भोजपुरी गायकों की संख्या अगर इसी तरह बढ़ती रही तो आने वाले दो-चार सालों में उनके लिए एक अलग से ग्रह की व्यवस्था करनी पड़ेगी.

वहीं देश का एनजीटी,प्रेम प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए इसको शादी-ब्याह में न बजाने की अपील कर चुका है।

कवि सीरी मनोज “मनचला” गायक उपेंद्र “उत्पाती” व्यास डब्बू “डेंजर”, सिंगर सलिल कुमार “सहकल” और भोजपुरी के गरिष्ठ गज्जल गयकार सीरी धर्मेंद्र “धड़कन” ने इसे अपनी अश्लील आवाज से विभूषित किया है।

इस गीत ने सिर्फ बियाह किये हूए दिलों को नहीं,वरन यूपी-बिहार के समस्त टेंट,सामियाना और तम्बू को हिला-हिला कर तोड़ा है..गीत की एक हिली हुई व्याख्या प्रस्तुत है.

“अब बात ना हमसे होइ,सुन ल ए मोर करेजा
तू देले बड़ा जवन,मोबाइल आके लेजा”

प्रस्तुत पंक्ति से स्पष्ट है कि नायिका बड़ी सुकुमारी है, वो कान्वेंटगामिनी नहीं,वरन सिरपत जादो डिग्री कालेज से गृह विज्ञान में दो बार फेल होने वाली ग्राम्यप्रिया विहारिणी है…

उसके पास जियो के चार-चार सिम कार्ड तो हैं..बैलेंस भी है,टाइम भी है लेकिन उसके सगे फूफा ने उसके अरमानों का अंचार डालकर उसकी शादी किसी बीटेक्स डिग्री धारी से तय कर दी है..और वो सुहाग रात की पूर्व संध्या पर अपने पूर्व प्रेमी सुगन कुमार ‘सुरीला’ से कहना चाहती है कि –

“हे मेरे मजनू- तुमने जो चालीस किलो गेंहू बेचकर मेरे प्यार के आधार कार्ड पर जियो का फोन खरीदा था,उस दिल के कवर में विराजमान फोन को ले जाओ.

तुम्हारे अल्ताफ राजा के परनाना की कसम, इसका दर्दीला रिंगटोन,जब-जब बजता है, मेरा दिल टूटकर दूसरे की दुल्हन हो जाता है..

हे भूतपूर्व प्राणप्रिय- तुम्हारे गोभी जैसे गालों की कसम,इस मोबाइल के स्क्रीन पर छपी तुम्हारी मिथुना जैसी फ़ोटो अब मेरे माधुरी जैसे दिल में हुक उठा रही है..

“याद करा जहिया कुँवार रहलू
पियवा से पहिले हमार रहलू”

प्रस्तुत कालजयी पँक्ति में- नायक का दिल इस हुक को सुनते ही कुहुक उठता है.वो अपने दिल पर चार किलो का पत्थर रखकर और उस पत्थर पर बैठकर कहता है कि “हे प्राण प्यारी,हमार करेजा के फ़फकत लालटेन,दिल के बोरसी,रोग के दवाई-

“याद करो- मैनें तुम्हें सिर्फ मोबाइल ही गिफ्ट नहीं दिया था,उसके पहले कई बार सरसो का तेल बेचकर तुम्हारे लिए बोरो प्लस भी खरीदा था,ताकि सर्दियों में तुम्हारे चेहरे की लालिमा में किसी कुत्सित कालिमा का प्रभाव न पड़े.

तुम जबसे बोरो प्लस क्रीम की जगह ब्यूटी प्लस एप यूज करके इंस्टाग्राम पर पौने चार सौ लाइक पाने लगी,तबसे तुमने मुझे अपने दिल से ऑरकुट की तरह डिलीट कर दिया है।

याद करो..जब इंटर का इम्तेहान हो रहा था.तब मैं काका और विद्या की चार-चार गाइड लेकर,पुलिस का डंडा खाते हुए चिल्ला रहा था-

“ए संगीता पांचवा के ख सही बा”
ए संगीता तीसरा के तीसरा थोड़ी देर में देब”

याद करो- मैनें तुमको खिड़की पर नकल करवाने के लिए अकलेस भाई की कसम खाई थी,और उनके समाजवाद पर चढ़कर मैनें तुमको बस इसलिए पास कराया था-ताकि आगे चलकर तुम्हारे बियाह तय करने में तुम्हारे बाबूजी सीरी तिरलोकी प्रसाद पुत्र बेचन प्रसाद को दिक्कत न हो.

अरे ! वो बेवफा की सगी फुआ- आज भी जब-जब पुरुवा बहती है पीठ का दरद दिल के दर्द से तेज हो जाता है।

तुम तो भूल गयी लेकिन मुझे अभी भी याद है-दशहरा के मेले में मैनें एक बार भी जुआ नहीं खेला था,ताकि उस पैसे से तुम अपने अमरीशपुरी जैसे फेस पर करीना जैसा फेशियल करवाके अपनी मौसी की शादी में आलिया जैसी दिख सको-

लेकिन तुमने मेरा दिल मोदी की तरह ऐसे तोड़ा है कि आज मैं तुम्हारे प्यार में राहुल गाँधी हो चुका हूं।

“रही कुंवार तोहार राखत रहीं मन हो
हो गइल शादी भइनी दोसरा के धन हो”

नायिका यहां अपने बीते हुए दिनों को याद करके बताती है कि “हे मेरे दिल की चक्की में पीसे हुए आटे से बने प्यार के पराठे-

मैं जब कुंवारी थी तब मैनें ऊँच-नींच का ख्याल किये बिना तुमको पारो की सगी फुआ की तरह प्यार किया है..लेकिन ए मजनू के मौसा- तुमको सरस सलिल पढ़ने से फुर्सत कब थी कि मेरे को समझ पाते और कुछ रोजी-रोजगार करके मुझे अपना बनाने की सोच पाते।”

इस दर्द से स्पष्ट है की भारत की मोदी सरकार रोजगार उतपन्ना करने में फेल है.और राहुल गाँधी में बहुत सम्भावना है.राहुल जी को इश्क के क्षेत्र में प्रगति कर रहे दीवानों के रातों-रात दिवालिया होने जाने की चिंता करनी चाहिए,जो कि बहुत बड़ा राजनीतिक रुप से उपेक्षित वोट बैंक है।

“जा ए जान जात बाड़ू त हमके मत भूलईहा
पापाजी से दिन धरा के जल्दी से चल अइहा”

प्रस्तुत पंक्ति बताती है कि सन्तोष और आत्मविश्वास की कोई सीमा नहीं होती,न ही इसका कोई डिग्री,डिप्लोमा होता है,

आदमी को अच्छे दिन के दर्शन न हों तो कल्पना के सहारे भी जी सकता है,और अपने टूटे हुए दिल पर कपार रखकर ये सोच सकता है कि मेरी भूतपूर्व महबूबा अपने अभूतपूर्व पति को छोड़कर दौड़े-दौड़े मेरे पास चली आएगी।

प्रस्तुत पँक्ति बताती है कि नायक भले प्रेम में असफल हो लेकिन उसे यूपी के प्राइमरी स्कूलों में एक सफल शिक्षा मित्र बनने से कोई नहीं रोक सकता है।

“लूट गइल प्यार यार छीन लेहलु चैना’

इस पंक्ति में जो बात है उसे भरत से लेकर अभिनवगुप्त और अल्ताफ राजा से लेकर अगम कुमार निगम के कार्यकाल तक ‘विरह’ कहा गया है..

नायक दर्द के माउंट एवरेस्ट पर खड़े होकर कह रहा है कि “हे हमार करेजा के कबूतर- जिस दिन से तुम मेरे प्यार के पिजड़े से उड़ी हो,उसी दिन से मैं गाँव के बहरी पुल पर गोड़ लटकाकर अगली साल लेखपाल बनने की सोच रहा हूँ..ताकि एक दिन तुम्हारे प्यार भरे खेत की चकबन्दी करके तुमको अपना बना सकूँ।

“तोहरा से बेसी सितम सहतानी
का कहीं हमार राजा कइसे रहतानी”

नायिका का यहाँ दर्द फफाकर पसर रहा है..वो इस जाड़े में सुबह चार बजे नहाने के बाद जब यादों की बोरसी सुलगाकर विरह का अलाव तापती है,तो सभी कन्याओं की तरह यही सोचती है कि

“शादी के पहले वाला ही टाइम ठीक था.”

माटी में मिला दिहलु सोचल सारा सपना
शादी करके दोसर के बना लिहलु तू अपना ।
हमरा दिल के करार रहलू
पियवा से पहिले……

प्रस्तुत पंक्ति में नायक को सभी नायकों की तरह वही सनातन शिकायत है कि- “हे बेवफा तुमने मुझे अपने बच्चे का मामा बनाकर मेरे सोने जैसे प्यार को माटी मिला दिया,तुम तो अपने सैयां जी के साथ मंसूरी घूम रही हो..आज मैं नोएडा में जाकर होमगार्ड बनूँ की सूरत में जाकर ठीकेदार,समझ नही पा रहा हूँ।

इन चंद पँक्तियों से स्पष्ट है कि हमारा भारत एक दिल तोड़ू प्रधान देश है और हम एक बेवफा प्रधान समय में जी रहें हैं.,यहां दिल तोड़ने की मशीनें सज-धजकर इफरात में घूम रहीं हैं.

हमारे वैज्ञानिकों ने सूक्ष्म अध्ययन से बताया है कि जहां-जहां आग होती है वहाँ-वहाँ धुआं होता है..।शुकुल बाबा की कसम अब उस लाइन के नीचे ये भी लिख देना चाहिए कि जहां-जहां प्यार होता है वहाँ-वहाँ बेवफाई होती है।

खतम

परीक्षार्थी – फोंकन सिंह ‘बलमुआ’
कक्षा – तेरह
सेमेस्टर – 3
रोल नम्बर – 9211420
विषय- समाज शास्त्र
स्कूल- चिचोहन सिंह आदर्श इंटरडिग्री कालेज
बलिया

(डिस्क्लेमर- परीक्षार्थी की कॉपी आज ही लीक हुई है )

©- atulkumarrai.com

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