भोजपुरी में एक फ़िल्म आई..”निरहुआ रिक्शा वाला” कहते हैं जिस दिन बनारस में रिलीज हुई उस दिन बनारस में रिक्शा वालों के भाव जेट एयरवेज के भाव को टक्कर दे रहे थे…होता क्या था कि एक दो सवारी ढोने के बाद सभी रिक्शा वालों की एक ही मंजिल होती थी..आनंद मन्दिर सनीमा हाल…सभी रिक्शा वाले हाथ में लैला और झूम की बोतल लेकर..”मिसिर जी तू त बाड़ा बड़ी ठण्डा” पर जमकर नाचते थे..निरहुआ की फाइटिंग और एक्टिंग देखकर खूब झूमते थे..और फ़िल्म के बाद मस्ती में गाते हुये निरहुआ की जय-जयकार कर बाहर निकलते थे.
देखते ही देखते ये सिलसिला इतना लगातार चला कि यूपी-बिहार के रिक्शे वालों ने इस फ़िल्म को भोजपुरी की ब्लॉक बस्टर फ़िल्म बना दिया..और कुछ ही साल पहले कुछ हजार लेकर घूम-घूम बिरहा गाने वाले दिनेश लाल यादव को सुपरस्टार का तगमा दे दिया..
फ़िल्म में क्या है इस पर चर्चा नही करूँगा.बस इतना समझिये कि आप थोड़ा बहुत संगीत,साहित्य और थियेटर की समझ रखते होंगे तो ये फ़िल्म आपको दो कौड़ी की फ़िल्म लगेगी..जिसे सीधे शब्दों में बकवास कहा जा सकता है…लेकिन यह बात आप किसी रिक्शे वाले से कह देंगे तो वो आपको महा मूर्ख समझ लेगा.
आपको पता है क्यों ? क्योंकि उस रिक्शे वाले के लिए इस फ़िल्म से अच्छी दुनिया में कोई फ़िल्म अभी नही बनी है…..क्योंकि फ़िल्म का हीरो रिक्शा चलाता है..खूबसूरत और पैसे वाली लड़की के साथ रोमांस करता है.एक-एक साथ, दस-दस गुंडों को मार देता है.क्या वास्तविक जीवन में एक रिक्शावाला इसकी कल्पना कर सकता है…क्या सामान्य जन-जीवन में एक रिक्शे वाले से कोई खूबसूरत लड़की प्रणय निवेदन कर सकती है..क्या किराया न देने पर एक रिक्शा वाला दस-दस गुंडों को मार सकता है.? साधरणतया ये बड़ी असम्भव बात है..आज रिक्शे और ठेले वाले समाज के सबसे दबे-कुचले व्यक्ति हैं..लेकिन सवाल पैदा होता है कि उनके रिक्शे पर जब कोई खूबसूरत लड़की बैठती होगी..तो उनका भी मन जरूर रोमांस करने को करता होगा न ? किसी पुलिस वाले को पिटने और किसी गुंडे को गोली मारने का भी मन करता होगा न ?लेकिन वो बेचारा नही मार पाता होगा..चाहकर भी रोमांस नहीं कर पाता होगा.
बस यहीं बाजारवाद का चमत्कार है…रिक्शे वालों की इसी अतृप्त कामना को उसने भुनाकर एक बकवास फ़िल्म को भोजपुरी की ब्लाक बस्टर फ़िल्म बना दिया..की जब-जब यूपी-बिहार के रिक्शे वाले पर्दे पर एक रिक्शे वाले को रोमांस करते,फाइटिंग करते, देखते हैं तो उनके भीतर के अहंकार को तृप्ति मिलती है…निरहुआ में उनको अपना अक्स नज़र आता है.बस….हिन्दुस्तान में भीड़ बटोरने और कम समय में हीरो बनने का सबसे आसान सा फंडा यही है,आदमी की अतृप्त और दमित कामना को भूनाना.
कल मुझे खबर मिली कि शहाबुद्दीन के काफिले में 1300 गाड़ियां थीं..तो मुझे आश्चर्य नही हुआ..बस इसी निरहुआ और इन्हीं रिक्शा वालों की याद आई….क्योंकि मैं जानता हूँ…शहाबुद्दीन ने 500 गाड़ियों की व्यवस्था की होगी..तो 800 वो खलिहर लोग जो किसी कारण से शहाबुद्दीन नहीं बन पाए वो अपना पेट्रोल-डीजल लगाकर उसके स्वागत में अपना कीमती समय और धन बर्बाद किये होंगे.. जेल से शहाबुद्दीन को निकलता देखकर उनके भीतर छुपे अपराधी के अहंकार को तृप्ति मिली होगी.
इसलिए किसी के जनाजे में या स्वागत में भीड़ देखकर प्रभावित होना मूर्खता है.हमारा हिन्दुस्तान वो भेंड़ चाल वाला देश है जिसमे सबसे अधिक कुंठित लोग रहतें हैं.आज इसी कुंठा को बाजारवाद और मीडिया ने भूनाकर शर्म के विषय को गौरव के विषय में बदल दिया है.तभी तो यहाँ किसी कलाम के नहीं याकूब मेंमन के जनाजे में लाखों उमड़तें हैं.दो कौड़ी की वाहियात फिल्में ब्लाक बस्टर हो जाती हैं.भोजपुरी के आदर्श भिखारी ठाकुर महेंदर मिसिर की जगह खेसारी लाल यादव और गुड्डू रंगीला बन जातें हैं.सिवान के गौरव डा. राजेन्द्र प्रसाद नही शहाबुद्दीन हो जातें हैं.
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