बनारस के लोगों को कोई चिंता नहीं कि मीडिया बनारस के बारे में क्या-क्या कहती है.वो उसी मस्ती में पान घुलाये चले जा रहे..बेखबर. बेफिक्र..बेपरवाह.उनको इसका भी गम नहीं कि स्वच्छ शहरों की रैंकिंग में हमारे बनारस का 381वाँ स्थान क्यों है.वो आज भी सड़क पर ही पान थूकेंगे और गलियों में कूड़ा-कूड़ा खेलेंगे.उन्हें इसका भी लोड नहीं है कि मोदी जी बनारस को क्योटो कब बनाएंगे.वो तो इतने से खुश हैं कि हमारा लोकप्रिय पीएम हमारा सांसद है.
उन्हें ये भी आशा नहीं कि प्रदेश की सरकार मेट्रो कब दौड़ायेगी.वो तो परपम्परा का रूप ले चुके जाम के झाम में आज भी सामने वाले को भोसड़ी के.कहकर तसल्ली कर रहे हैं.
देश दुनिया में डिजिटल इंडिया की बातें हो रहीं हैं.और यहाँ लोग बिना माइक तार के ढाई सौ साल से हो रहे रामनगर की रामलीला देखने चले जा रहें हैं।बाबा भांग वाले की भोग आरती हो.श्रृंगार आरती,गंगा मइया की आरती सब समय से जारी है।
लेकिन साहेब टीवी देखकर आप बहुत कुछ नहीं समझ सकते ,न ही कोई किताब या फ़िल्म देखकर. न ही एक दिन बनारस आकर घाट पर फ़ोटो खिंचवाकर आप बनारस को जान सकतें हैं.
यहाँ के लोग पान में दुनिया के सारे रंजो गम को घुलाकर एक विशेष प्रकार का मुंह बनातें हैं और पिचकारी चलाकर धीरे से कहते हैं.”लोड न ला गुरु” सो आप भी टेंसन न लें।
क्या है कि अस्सी से गोदोवलिया आये मुझे ढाई साल हुए..इन थोड़े दिनों में बहुत करीब से महसूस किया कि बनारस के डीएनए में ही मस्ती है.अल्हड़पन और फक्कड़पन है.संस्कृति भी है और संस्कार भी.संगीत आकर यहाँ मूर्त रूप लेता है तो साहित्य नई फलक पर पहुंचता है.
जहां मिठाई से ज्यादा मीठी गालीयां हैं.जहाँ गंगा जमीन से ज्यादा लोगों के दिलों में बहती हैं.जहाँ की फिजावों में आज भी गुदई महराज का “कत धिकीट कत गदिगन” बज रहा है.जहाँ गिरिजा देवी “बिन पीया निंदिया न आये” गा रहीं..तो कहीं उस्ताद बिस्मिल्लाह खान बालाजी मन्दिर के नौबतखाने में इबादत कर रहे है।
तो कहीं प्रेमचन्द का हामिद मदनपुरा में मुस्करा रहा वहीं जयशंकर प्रसाद का ‘गुंडा’ नन्हकू सिंग चेत सिंह घाट पर आज भी महारानी काशी के प्रेम में खड़ा है.जहाँ गंगा जमुनी तहजीब के महान शायर नज़ीर बनारसी अपनी गंगा माई को अपना कालजयी शेर सुना रहें हैं.
“हमने नमाजें भी पढ़ी हैं अक्सर
गंगा तेरे पानी से वजू करके”.
इसी काशी ने हजारों रत्न पैदा किये हैं.जिनकी चमक आभा आज भी फिजावों में घुली है.जिन्होंने धर्म सम्प्रदाय से ऊपर उठकर मनुष्यता को जोड़ने का काम किया है.भले लाख तोड़ने वाले आ जाएँ वो तुलसी के “प्रेम से प्रगट भयऊँ मैं जाना” को जीवन सूत्र बनाएं हैं।बहुत से नाम है..कौन सा गिनाऊँ और छोड़ दूँ..
लेकिन आपको बता दूँ एक नाम है इधर भी जिनके बारे में सभी वर्ग के लोगों के दिलों में विशेष सम्मान है.वो हैं नाजनीन अंसारी जी.
कभी लल्लापुरा की तंग गलियों में रहने वाली नाजनीन अंसारी को अपने गरीबी अभाव से उतना दुःख नहीं था जितना इस्लाम में औरतों के जाहिलियत और दाकियानूसी भरे तंग नजरिये से था.उन्हें ये सब आहत करता था.फिर क्या सोचा कि कुछ करना चाहिए.सबसे पहला खुद को बदला.शिक्षा को हथियार बनाया.
नाम मात्र की शिक्षा पाने वाली नाजनीन जी नें स्वाध्याय शुरू किया.खूब पढ़ा.दूरस्थ शिक्षा से पीजी की डिग्री ली.फिर घरों में कैद होकर मर रही गरीब मुस्लिम महिलावो को शिक्षित करने और जागरूक करने का बीड़ा उठाया.मसलन की वो बैंक जाये तो कैसे फार्म भरें. बिल कैसे जमा करें..तमाम सरकारी सुविधावों का लाभ कैसे लें.जैसी छोटी छोटी बातों के साथ इस पर जोर दिया की ये स्त्रियां आत्मनिर्भर कैसे हों.
जागरूकता की ये लौ जली ही थी तब तक फरवरी 2006 में बनारस सीरियल बम ब्लास्ट से दहल उठा अचानक से बनारस की आबो हवा को झटका लगा.हर बनारसी सदमें में.हिन्दू कम मुसलमान ज्यादा.वहीं नाजनीन अंसारी 51 मुस्लिम महिलावों के साथ बाबा संकट मोचन के दरबार में पहुंची.और सस्वर सुंदर काण्ड का पाठ करके बनारस के अमन शान्ति भाईचारा की कामना की.
ओवैसी ने एक बार कहा था कि “मेरी गर्दन पर कोई छूरी रख दे तो भी मैं भारत माता की जय नहीं बोलूंगा”
बड़ी बवाल मचा था.तुरन्त बोलने और बोलवाने के बीच जंग शुरू हो गयी.
विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा मिला.बुद्धिजीवियों को वैचारिक लाठी भांजने का एक हथियार.मीडिया को टीआरपी मसाला.लेकिन इन सब शोर के बीच एक आवाज दब गयी.जो बनारस की इसी नाजनीन अंसारी की आवाज थी जिसने ललकार कर कहा था.
“मेरी गर्दन पर कोई तोप रख दे तो भी मैं लाखो बार भारत माता की जय बोलूंगी”
अफसोस की ये समाचार मुद्दा न बना.न ही बनेगा.
जानते हैं क्यों ?..क्योंकि मीडिया नफरत बेचने की आदी हो गयी है.धीरे-धीरे हम नफरत देखने सुनने के आदि होते जा रहे हैं.वरना देश की बर्बादी का नारा लगाने वाले आज हीरो न बन जाते.
हमें कहीं थोड़ा बहुत प्रेम भी दिखता है तो उस पर सन्देह होने लगता है..दोष हमारा नहीं..हम आज विकट समय में जी रहें हैं.
नफरतों का बाजार सजा है.अगर इसी महिला ने चिल्लाकर कहा होता “मेरी गर्दन पर कोई तोप रख दे तो भी मैं भारत माता की जय नहीं बोलूंगी..”तब आप देखते..कैसे लोग दौड़े चले जा रहें हैं इनका साक्षात्कार करने के लिये..बरखा राजदीप जैसे लोग इनको कन्धे पर झूला रहें हैं.लाइव इंटरव्यू दिखाया जा रहा है..बड़े बड़े सम्पादकीय लिखे जा रहे हैं”
लेकिन नहीं इस महिला को इस चीज का कभी गम न रहा..न ही फेमस होने और हीरो बनने की कामना जगी.
इन पर तमाम फतवे भी जारी किये गये..मुल्ला जी लोग इनको धमकी भी दे चुके हैं..अभी भी जब तब देतें ही रहतें हैं.

इसके बावजूद भी वो लगीं हैं.समाज को जोड़ने में.उस गंगा जमुनी तहजीब को कायम रखने में जो अब सिर्फ सुनने में ही अच्छी लगती है.
इन्होंने हनुमान चालीसा,मानस समेत कई हिन्दू धार्मिक ग्रन्थों का उर्दू में अनुवाद किया है..हर साल रामनवमी बड़े धूम धाम से मनाती हैं..खुद राम जी के लिये कई भजन भी लिखा है.
नमाज भी जरूर पढ़ती हैं.रोजा रखकर ईद भी मनाती हैं.क्योंकि इनका मानना है कि इनका इस्लाम इतना कमजोर नहीं कि राम जी की आरती दिखाने.प्रसाद खाने मन्दिर,गुरुद्वारा और चर्च जाने से खतरे में पड़ जाएगा। आरएसएस के राष्ट्रीय मुस्लिम मंच से इनका प्रगाढ़ सम्बन्ध है.
इन्होंने इन्द्रेश जी के साथ मिलकर बनारस की तमाम गरीब मुस्लिम महिलावों के लिये जमीनी स्तर पर बड़ा ही अद्भुत काम किया है.रक्षाबंधन के समय इन्होंने प्रधानमंत्री मोदी जी और इन्द्रेश जी को अपने हाथ से बनाई राखी भी भेजा था.
अभी राष्ट्रपति ने जी ने देश की जिन सौ महिलावों को सम्मानित किया उनमें एक नाम इनका भी था।
ये आइना हैं उन सभी मुसलमानों के लिये. सेक्यूलरिज्म का ढोंग करने वाले तमाम मुस्लिम बुद्धिजिवीयों के लिये जो धीरे-धीरे मोदी और आरएसएस के अंध विरोध में आज हिंदू और हिन्दुस्तान के विरोधी होते जा रहे हैं.
हमारा दुर्भाग्य है कि हम अफज़ल-कसाब जैसों को तुरन्त जान जातें हैं लेकिन नाजनीन अंसारी को नहीं ।














Bhai yar dil chhu gayi tumhari bat .
Bhai kasam se mai bhi isi soch ka kayal hu.
Bhai mai to jabra fan hota ja raha hu.☺
आपका बहुत आभार