मुन्ना पांडे बेरोजगार….एक कहानी

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चार फिट आठ इंच के मुन्ना पांडे जब कक्षा आठ में पढ़ते थे तब अचानक एक दिन उनके गणित के मास्टर साहेब  ने उनके आगे हाथ जोड़कर कहा…..”ए पांड़े.. तुमको ब्रह्मा,विष्णु,महेश भी मिलकर गणित नहीं पढ़ा सकते..तो हम किस खेत के मुरई हैं रे ?.लेकिन ए पांड़े…एतना तो विश्वास है की तुम तीनों को सुरती खिलाना और सरस सलिल पढ़ना जरूर सीखा दोगे…”

क्लास में एक ठहाका गुंजायमान हुआ और मुन्ना बाबू ने बेशर्मी भरी चनवनिया मुस्की के साथ अपने इस हिडेन टैलेंट पर इतराते हुये बगल में बैठे मनोजवा से पूछा.

“ए मनोज रे..आज राजश्री सनीमा हाल में मिथुना का फिलिम देखने चलोगे” ?.चल न यार…साला मिथुना गज्जबे उड़-उड़ के एक साथ आठ गुंडों को मारता है.
मनोज ने ‘ना’ की मुद्रा में  इस तरह सिर को घुमाया,मानों फिलिम शब्द से उसे सख्त नफरत हो.तब तक पांडे जी बोले..”ए मरदे सुनो ना.पइसा का टेंशन न लो,अरे यार जगत राय का गेंहू अभी खरिहान में ही है. मने इ बूझो की आधा बोरिया भी बेचा गया तो फिलिम के बाद एक बरियार पार्टी हो जायेगी.”

इसी तरह मुन्ना बाबू जब कक्षा दस में आये तो विज्ञान के मास्टर पनधारी यादो ने भी उनके सामने एक बार हाथ जोड़ा और धीरे से कहा.”ए पांडे जी..आप इंजीनियर के बेटे हैं.लेकिन आज मैं बड़े दुःख से  कह रहा कि आपको न्यूटन,आइंस्टीन क्या साक्षात ब्रह्मा जी भी आ जाएँ तो  नहीं पढ़ा पाएंगे.मैं तो बस एक अदना सा आदमी भर हूँ.लेकिन हाँ आप उनको जुआ खेलना जरूर सीखा देंगे.इतना तो मेरा विश्वास है।

क्लास में फिर उस दिन टेबल तोड़ ठहाका गूंज रहा था.मुन्ना बाबू अपनी इस तारीफ़ से खुश होकर जुल्फी को लहराये.पीछे बैठी  बबीतवा की तरफ प्यार से देखा.मुंह को सिटीनुमा गोल घुमाया.और इतराते हुये बगल में बैठे पंकजवा से कहा..”ए पंकज आज साँझ को ताड़ी पीने का मन है रे…चलो न “

इस तरह मुन्ना बाबू आठवीं से बीए में आते-आते दसवीं में दो बार और इंटर में एक बार फेल हो चुके थे.साथ ही साथ दो बार पैर,तीन बार हाथ,और पांच बार सर के साथ सात बार उनका दिल टूट चुका था.आठवीं बार जब कालेज की मिंकी से दिल का कनेक्शन जोड़ने की कोशिस कर ही रहे थे तब तक पता चला कि बीए प्रथम वर्ष की पूरी परीक्षा में उन्होंने अपना रोल नम्बर ही गलत लिख दिया है.

यहां तक कि समाज शास्त्र में “साजन चले ससुराल” फ़िल्म का स्टोरी और हिंदी  में रीतिकाल के वर्णन में गुड्ड रंगीला का “राजा राजा करेजा में समाजा” वाला  गाना लिख दिया है.इन चन्द कारणों  से अब किसी प्रोफेसर क्या लार्ड मैकाले की भी औकात नही जो परम प्रतिभावान मुन्ना बाबू  को पास कर दे..वैसे भी मुन्ना बाबू ने सुन रखा था कि दुनिया के अधिकतर सफल लोग उनकी तरह ही कालेज के दिनों में प्रतिभावान हुआ करते थे.

सो मुन्ना बाबू अपनी इस प्रतिभा पर भी मुग्ध हुये.बाइक निकाला.कीक मारा और सीधे मिंकीया.के क्लास के सामने गाड़ी खड़ा करके हीरोगिरी का प्रदर्शन शुरू कर दिया.

सुबह जब मुन्ना बाबू के पिता श्री बंशीलाल पांडे जी  अपने इकलौते बेटे की उपलब्धि सुनीं तो सभी नालायक बेटे के लायक बापों की तरह वो भी आहत हुये,और मुन्ना बाबू को सुधरने के लिये अपनी बहन के  यहाँ कलकत्ता भेज दिया..

मुन्ना बाबू नाचते-गाते अपनी विमला फुआ के यहाँ कलकता गये.कलकत्ता में वहां-वहां सब जगह गये जहाँ-जहाँ उनके गांव के दोस्तों ने हथेली मलते हुये आहें भरते हुये जाने का सुझाव दे रखा था.और कुछ ही दिन बाद लगातार जाने के कारण  हुआ यों कि,

चार महीने  में ही मुन्ना बाबू आवारा,गुंडा,लड़की बाज,चोर,धूर्त,जुआड़ी सहित नाना प्रकार की डिग्री और डिप्लोमा देकर  विमला फुआ द्वारा गाँव भगा दिये गये…..”फिर कभी आना मत… बेहुद्दा कहीं का”

गाँव आने पर पिता श्री बंशी लाल जी ने जब अपने सुपुत्र की इन उपलब्धियों पर गौर से निरीक्षण किया तो हमेशा की तरह एक बार फिर आहत हुये..बस क्या था, तुरन्त ब्लड प्रेशर की दवा खाई और सीधे बैंक पहुंचे..
बैंक से  दो लाख रुपया निकाला.और अगले दिन गाँव की चट्टी पर पांडे जनरल स्टोर खोल दिया.लिजिये अब मुन्ना बाबू ..आवारा, गुंडा,चोर,लड़की बाज से उन्नति करके  दुकानदार हो गये…

अब सुबह घर से नहा धोकर आते.दुकान में पूजा पाठ करते.. दुकान में उनका मन भी लगने लगा..
टोला मोहल्ला में चर्चा का विषय हुआ..”लगता है मुन्नवा सुधर गया.”अरे ए महातम के माई.. पांड़े जी झूठे परेशान थे…सब लोग उनकी तरह पढ़-लिखकर इंजीनयर ही बनेगा तो बिजनेस कौन करेगा..अरे देखना..मुन्ना एक दिन बड़का बिजनीस मैन बनेगा..”

तरह-तरह की चर्चा होने लगी…और इस भावी बिजनेस मैन की दूकान पर कुछ ही दिन में भीड़ भी बढ़ने लगी…लड़कियों और महिलावों के सौंदर्य प्रसाधन के साजों-सामान की अधिकता और वैरायटी के साथ  अधिक से अधिक छूट ने उनको क्षेत्र भर में लोकप्रिय बनाकर दूकान को बदनाम कर दिया.

अचानक एक दिन पता चला की मुन्ना बाबू ने एक क्रिम पर एक पाउडर और एक फेश वास पर एक माइश्चराइजर फ्री देकर रेवती की संगीता,गाँव की पूजा और पड़ोस की रेखा से इश्क कर लिया है..
इस इश्क़बाजी के दो महीने बाद ही पांडे जनरल स्टोर दिवालिया और मुन्ना बाबू बड़े दिल वाले हो चुके हैं…
उनका दिल सिर्फ दिल नही बल्कि अग्रवाल धर्मशाला है और उनकी दूकान अब इश्क की पाठसाला में बदल गयी है।

पिता वंशी लाल  पांडे  एक बार फिर आहत हुये..इस बार वो  जरा जोर आहत से हुये थे. जिसका प्रभाव मुन्ना बाबू की माताजी पर भी पड़ा था…..जिन्होंने बंशी लाल जी के अनुसार मुन्ना बाबू को बड़े लाड़ प्यार देकर बिगाड़ा था.

आहत होने वालों की लिस्ट में विमला फुआ भी थीं ,उन्होंने  कलकता से बंशी लाल जी को फोन किया और समझाइश दिया….”ए भइया..अब मुन्ना का बियाह कर दो न.मेहरी आएगी और बबुआ सुधर जायेगा..देखना..
मेहरारू के भाग्य से भी मरद की किस्मत बदलती है।”
बंशी लाल जी को ये राय कुछ अच्छी लगी..
मुन्ना के माई ने भी ये कहते हुये इस फैसले पर मुहर लगाया की उनकी भी तबियत अब अक्सर खराब ही रहती है..

गाँव-जवार में मुन्ना बाबू के बियाह की चर्चा  चल पड़ी…मुन्ना बाबू के खरीदार  आने लगे.
आवारा,गुंडा के बावजूद शादी के मार्केट में  उनका भाव  बहुत टाइट था…कारण कि बीए फेल मुन्ना बाबू के पिता रिटायर्ड सिविल इंजीनीयर थे और अपने जमाने में खूब पैसा और नाम कमाया था…मुन्ना को छोड़कर जीवन  भर सड़क और पुल ही बनाया था.दो बार गबन के आरोप में निलम्बित भी रहे थे…
लेकिन आज भी उनकी पेंशन पुरे बाइस हजार है..
शहर में भी जमीन है..गाँव में उपजाऊ खेत और आम का बगीचा है..बेटियों की शादी नौकरी के दौरान ही हो गयी थी…

इसलिए  लड़की वालों से दहेज को लेकर जब बहस हुई तो एक लिस्ट बनकर आई जो इस प्रकार थी…
पांच लाख दहेज..एक बाइक,एसी,वाशिंग मशीन,फ्रिज और सोने का चेन..200 बरातियों की शानदार खातिरदारी और जिले की सबसे बड़ी नाँच के साथ बाजा भी बेटी की तरफ से होना चाहिये…
साथ ही लड़की सुंदर,सभ्य, गृह कार्य दक्ष के साथ-साथ पांच फिट पांच इंच हाइट और कम से कम बीएसी,बीएड होनी चाहिये…
अगर पीएचडी है तो दहेज में पचास हजार की छूट मिल सकती है…

मुन्ना बाबू के पिताजी,माताजी और बहनों के इस डिमांड पर दो महीने तक कोई भी खरा न उतर सका..
कुछ तो मुंह बनाकर चले गये…”अरे पांडे जी..हम अपनी बेटी का  विवाह आपसे नही आपके लड़के से करने आये हैं…
जरा लड़का भी तो देख लिजिये..कल आप मर जाएँ और आपके बबुआ आपका सब घर-दुआर बेच दें तो आप क्या करेंगे बताइये न.”.?

बंशी लाल जी इतना सुनकर भी टस से मस न हुये.
तीन महीना बीत जाने पर भी कोई शादी को न तैयार हुआ तो उन्होंने दहेज की रकम में एक लाख की कटौती करते हुये गाजीपुर जिले के  हरेराम तिवारी की बेटी से शादी तय कर दिया…

शादी तय होते ही मुन्ना बाबू में व्यापक परिवर्तन दिखाई देने लगा..सिर्फ चाल-चलन ही नहीं..पहनावा और मोबाइल का कालर ट्यून से लेकर उनका वालपेपर और रिंगटोन भी बदल गया…
होने वाली मेहरारू से नॉनस्टॉप  बातें भी होने लगीं…शादी में चार महीना बाकी था, सो कुछ ही दिन बाद बहस और फिर झगड़ा भी होने लगा.

जैसे-तैसे शादी का दिन आया…मुन्ना बाबू सज संवरकर बड़ी धूम-धाम गाजीपुर बरात ले गये..
दुआर पूजा में गाँव की लड़कियों ने एक स्वर में गाया…”आपन खोरिया बहारा ए हरेराम पापा..”
शादी सम्पन्न हुई.दहेज और सामान  को लेकर कीचकीच के बीच मुन्ना बाबू की बीएसी-बीएड मेहरारू आ गयी..
गाँव भर में उसके रूप,गुण और पढ़ाई-लिखाई की खूब चर्चा हुई

 

लेकिन मुन्ना की माई ने अपनी बहू का मुंह सात दिन नहीं देखा क्योंकि बक्से में साड़ी उनके मन मुताबिक़ नहीं थी.

इसके बावजूद मुन्ना बाबू बड़ी खुश थे. इतरा के कहते…”ए भाई हम  भले बीए फेल, लेकिन बाप हमारा बीटेक और मेहरारू हमारी बीएसी बीएड है..आज न तो कल मास्टरी तो उसको मिल ही जायेगी….का बुझे….?
सब हंसते, क्योंकि शादी बाद मुन्ना बाबू को इन सब डीलिंगबाजी के सिवाय कोई काम न था…
आराम ही आराम…अब शाम होते ही घर में सो जाते और सुबह दस बजे तब उठते,जब तक बंशी लाल जी चार गाली देकर ये न कह देते…”हरे बेहुद्दा,बेशर्म..खाली तुम्हारा ही शादी हुआ है की हमारा भी हुआ था..?

मुन्ना बाबू इन विशेषणों को नजरअंदाज कर इस सोने जगने की प्रक्रिया में अनवरत चार महीने तब तक लगे रहे जब तक की ये पता न चला की वो अब पापा बनने वाले हैं..

पापा,दादी और दादा बनने की ख़ुशी सर्वत्र व्याप्त थी..लेकिन मुन्ना बाबू की पत्नी प्रतिभा को जोर का झटका तब लगा जब उसे एक दिन पता चला उसका पति बीए फेल है…
वो रोने लगी..अपनी किस्मत और अपने बाप को कोसा..मुन्ना बाबू से झगड़ा हुआ. और रो-रोकर पूछा..”क्या अपने बेटे को भी अपने जैसा ही बनाना  चाहते हैं..?बड़ा होकर क्या कहेगा वो? कि माँ कमाती है और बाबूजी निकम्मा की तरह घूमते हैं।अरे कुछ काम धाम तो करिये…लाज-शरम सब घोलकर पी गये हैं…”कल मैं स्कूल  जाउंगी और आप घर सोयेंगे..सब क्या कहेंगे…मैं नही रहने वाली इस  घर में आप जैसे निकम्मे के पास…”

मुन्ना बाबू को बीबी की बात चुभ सी गई..बीबी के मुंह से  निकम्मा सुनकर  सदमा सा लग गया….

दो दिन बाद पता चला वो अपने पिता की तरह पढ़ाई लिखाई और जिम्मेदारी के तीरों से आहत थे.
कुछ ही दिन में हर घण्टे मिलने वाले पत्नी के तानों ने उनको और बेचैन कर दिया…
वो अफ़सोस के समन्दर में डूबने उतराने लगे..आने वाले बच्चे का मासूम चेहरा और बंशीलाल जी का खीझा  चेहरा उनकी आँखों के आगे हर पल नाँचने लगा…

अगले दिन मुन्ना पांडे ने जब बेचैन होकर अखबार खोला…तो  एक खबर ने उनको और बेचैन कर दिया..वो भूल गये की बाप इंजीनियर थे,बीबी मास्टर होगी…
अगले दिन मुन्ना बाबू
रोजगार कार्यालय बलिया में दसवीं-बारहवीं के सार्टिफिकेट के साथ खड़े  थे…
और कहीं दूर से आवाज आई…

मुन्ना पांडे… बेरोजगार क्रमांक 224 उपस्थित हों…”

Uo seva yojna,up seva mandal

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संगीत का छात्र, कलाकार, लेकिन साहित्य,दर्शन में गहरी रूचि और सोशल मीडिया के साथ ने कब लेखक बना दिया पता न चला..लिखना मेरे लिए खुद से मिलने की कोशिश भर है।पहली किताब जल्द ही आपके हाथ में होगी.