बाज़ारवाद की गिरफ्त में हमारी संवेदना

0
647

एक दिन अखबार लेकर बैठा था कि एक खबर पर नज़र थम गई..देखा नोएडा में एक कार हादसा हुआ है। कार जलने लगी है…कार चला रहे व्यक्ति ने हाथ से इशारे करके आस-पास मदद मांगी है..कोई तो आए और जल रही कार से निकलने में उसकी मदद करे…लेकिन दुर्योग से ऐसा नहीं हुआ..और व्यक्ति तड़पते-तड़पते मर गया ।

अब आप अफसोस कर कर रहे होंगे और सोच रहे होंगे कि शायद आस-पास लोग नहीं थे….लेकिन नहीं,अफ़सोस इस बात का नहीं कि लोग नहीं थे अफ़सोस तो इस बात का है कि लोग तो थे लेकिन लोगों ने व्यक्ति की जान बचाने से ज्यादा व्यक्ति के एक्सीडेंट का वीडियो बनाना उचित समझा..

ठीक ऐसे ही बीते साल एक वीडियो सोशल मीडिया पर और तैर रहा था..वीडियो में नाव दुर्घटना हुई है।
देख रहा नाव डूब रही..लोग चिल्ला रहे..कूद रहे..और कुछ लोग ठीक उस नाव की सामने वाली नाव पर बैठकर बड़े ही मजे से उस डूब रही नाव का वीडियो बना रहे हैं…और कुछ हँस भी रहें..कुछ गाना भी बजा रहे।

वीडियो देखते-देखते मुझे डूबते टाइटैनिक पर बजते हुए वायलिन की याद आ गई….कि हम धीरे-धीरे असंवेदनशीलता के समुद्र में कैसे डूबते जा रहें हैं। समझ नहीं आ रहा है…जरा सी भी आह ! नहीं अफसोस नहीं..संकोच नहीं…सामने वाले मर रहे हैं और लोग हंसे जा रहें हैं।वीडियो बनाए जा रहे हैं.

अच्छा बहुत दिन नहीं हुए जब एक और वीडियो व्हाट्सएप और फेसबुक पर वायरल हुआ था…वीडियो में था कि किसी गांव में दो बच्चे एक लाश को कंधे पर लेकर जा रहें हैं…दोनों मासूम हैं..और शायद उनका बाप मर गया है..आपसी रंजिश के कारण पड़ोस के चार कंधे उसे नहीं मिल पा रहें हैं कि उनका अंतिम संस्कार किया जाए.

इस समाचार को मनुष्यता के ऊपर कलंक बताने वाले एक फेसबुक यूजर ने ये कैप्शन लगाया था कि “ध्यान से देखिए इस वीडियो को…एक लाश को कंधा देने लोग न आए..

मेरे मन में आया है कि उनसे पूछूँ की “जो आदमी इस हृदय विदारक घटना का वीडियो बना रहा है..वो आखिर कौन है..उसके हाथ में स्मार्ट फोन है तो क्या वो उनकी मदद करने के बजाय ये क्रूर मजाक करेगा.. और क्या मिल गया है उसे ये वीडियो बनाकर..?

और सिर्फ वही क्यों,ऐसे तमाम लोगों को क्या मिल जाता है.. ? क्या हमें खुद से ये नहीं पूछना चाहिए कि आँसूओं के सिम्बल के साथ सोशल मीडिया पर आँशु बहाकर हमें शर्म क्यों नहीं आती है ?

मनुष्य होने के कारण शर्म आनी चाहिए.. क्योंकि ध्यान से एक बार सोचें तो संवेदना और जागरूकता का ये विकृत चेहरा बहुत हैरान करने वाला है।

कई बार लगता है कि संवेदना बाजारवाद के गिरफ्त में हैं..दया,करुणा फेसबुक,व्हाट्सएप की इमोजी के मोहताज हो चूके हैं। हमारी भावुकता के लम्बाई-चौड़ाई को सोशल मीडिया पर आए लाइक,कमेंट और शेयर तय करने लगें हैं। लोग इंसान की अहमयित का अंदाजा उसके विचारों से नहीं उसकी वाल पर आए लाइक कमेंट औऱ शेयर से करने लगे हैं।

लेकिन इस छद्म आभासी सुख से हम क्या-क्या खो रहे हैं इसका अंदाजा है हमें ?

अरे! माना कि इमोशन को सोशल मीडिया पर आसानी से बेचा जा सकता है..लेकिन क्या इसका मतलब ये है कि हम अपनी जमीर बेच दें..माना कि संवेदना एक ऐसा प्रोडक्ट है जिससे लोग आसानी से जुड़ जाते हैं। लेकिन क्या हम ब्रेकिंग न्यूज चैनल हैं। कि कहीं से खोजकर सनसनी न्यूज न लाए तो हमारी सैलरी कट जाएगी..या हमें टारगेट दिया गया कि रोज फेसबुक अपडेट न करें तो प्रमोशन रुक जाएगा।

माना हमारे पास बन्दूक है तो इसका मतलब ये नहीं कि जब मन करे जहां मन करे हम फायर करते रहें…बिना इसकी परवाह किए की कौन उसकी जद में आ रहा है..किसे नुकशान हो रहा है।

मैं मानता हूं कि स्मार्ट फोन ने हमारे जीवन में एक बड़ी क्रांति की है..तमाम चीजें आज आसान हो गयीं हैं। कनेक्टविटी और कम्युनिकेशन बढ़ा है..एक क्लीक पर सब कुछ उपलब्ध है। लेकिन किसी दुर्घटना का वीडियो बनाने समय ये सोचना जरूरी है कि कहीं हम अपनी संवेदना का वीडियो तो नहीं बना रहे हैं..अपनी जमीर और जागरूकता का उपहास तो नहीं उड़ा रहे हैं।

कहीं हम आभासी लाइक,कमेंट,शेयर के चक्कर में कुछ खोते तो नहीं जा रहे..कहीं हम मशीनों के साथ रहते-रहते मशीन तो नहीं होते जा रहें हैं.

हमनें बचपन में उस प्राचीन ऋषि की वो कथा तो किताबों में पढ़ी ही है कि एक बार प्रातः काल में एक ऋषि नदी में स्नान कर रहे थे।नदी में धार तेज थी। तभी उन्होंने देखा कि एक साथ बिच्छू उनके सामने ही नदी में डूबता जा रहा। लेकिन उन्होंने अपने प्राणों की परवाह किये बिना..अपनी अंजुली में लेकर बिच्छू के प्राण को बचाया था.

ये जानते हुए कि बिच्छू डंक मारेगा..यहाँ तक कि इसे दूर न किया गया तो प्राण भी ले लेगा। लेकिन तभी उन्होंने सोचा कि इसका तो स्वभाव है डंक मारना लेकिन हम तो मनुष्य हैं।..करुणा तो हमारा स्थायी भाव है..हम अपनी मनुष्यता से विमुख कैसे हो सकतें हैं। हमें अपनी इस संवेदना को बचाए रखना है। और जब संवेदना बचेगी तभी खुद को मनुष्य कहना सार्थक हो पाएगा।

ये कथा पढ़े वर्षों हो गए हैं.नैतिकता सिर्फ टीवी के प्रवचन में सिमट कर रह गई।इंटरनेट के दौर में सभी चीज का ज्ञान सबको है। लेकिन अफसोस हम अभी तक बोध पैदा न कर सके हैं..विवेक जाग्रत न कर सके हैं।

इस मशीनी होते समय में हमें आज ज्ञान नहीं हमें इसका बोध होना आवश्यक है कि हमारे वीडियो बनाने से व्यक्ति,समाज देश का कोई मानसिक,शारीरिक और आर्थिक नुकसान तो नहीं हो रहा है।

हमें शेयर ही करना है तो क्यों न हम ऐसी चीजें शेयर करें जिससे फायदा हो समाज और राष्ट्र का.. फैलाना ही है तो क्यों न हम खुशियां फैला दें..कि किसी के गमगीन चेहरे पर मुस्कान तैर जाए. वायरल करना है तो क्यों न कुछ ऐसा कर दें कि कुछ लोगों के मन कटुता हमेशा के लिए खत्म हो जाए।

वीडियो ही बनाना है तो क्यों न कुछ ऐसा बनाएं.. जिससे देखने वाले के दिल मे एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो..आदमी बने रहने,संवेदनशील बनें रहने में मदद मिले..

याद रखना जरूरी है कि किसी समाज और राष्ट्र को सुंदर सिर्फ वहाँ की सरकार नहीं बना सकती है। न ही किसी सरकारी योजना से नागरिकों में संवेदना का भाव पैदा किया जा सकता है। न ही पीएम औऱ सीएम को ट्विट करके इसे सुलझाया जा सकता है । एक नागरिक के तौर पर इसकी पहल तो हमें ही करनी होगी…एक नागरिक के कर्तव्य का भान करना होगा।

याद रखना होगा कि सीमा पर जाकर दुश्मन से युद्ध हम सभी नहीं कर सकते हैं। लेकिन अपने भीतर थोड़ी सी जागरूकता पैदा करके..सड़क पर अपनी साइड से चलके,बेवजह हार्न न बजाके,ट्रैफिक रूल का पालन करके,कूड़ा को कूड़ेदान में डालके,सर्वजनिक जगह पर किसी को नुकशान न पहुँचाके भी हम देश की बहुत बड़ी सेवा कर सकतें हैं।

दैनिक जागरण आईनेक्स्ट में प्रकाशित

Comments

comments