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जुलाई 15.यानी एडमिशन,हॉस्टल एलाटमेंन्ट और फिर इस कमरे से उस फ्लैट,उस फ़्लैट से इस हॉस्टल की मारामारी..फलाना माइग्रेशन तो चिलाना आय से लेकर ढिमकाना निवास की दौड़-भाग.दिन भर की उमस के बाद उस दिन महामना की बगिया के पेड़-पौधे बादल के बरसने का बेसब्री से  इंतजार कर रहे थे.उधर मैत्री में रसगुल्ले बन रहे थे,वीटी में छोला भटूरा तो मधुबन में  काफी के लिए इंतजार हो रहा था.

हर फैकल्टी में काउंसलिंग की लम्बी-लम्बी लाइनों में स्टूडेंट और उनके गार्जियन बेहिसाव परेशान होने के बाद करीने से सजे आम और जामुन  की छाँव तले सुस्ता रहे थे.लंका पर हमेशा की तरह जाम था.हॉस्पिटल में हमेशा की तरह बिड़ला वालों ने डाक्टरों को पीट दिया था.डाक्टरों ने हमेशा की तरह उस दिन हड़ताल करके ओपीडी बन्द कर दिया था।

लड़की भी हमेशा की तरह उस दिन एक घण्टा लेट थी.उसने घड़ी में देखा पौने बारह.अचानक से चौंक गयी..फटाफट उसने रिक्शे वाले को आवाज दिया…”चलो..सेंट्रल आफिस.” रिक्शे वाले ने कहा “बीस रुपया लेंगे”।..”अरे चलिये चचा! तीस रुपया देंगे.”
लड़की ने झल्लाहट भरे लहजे में कहा..रिक्शे वाले ने रिक्शा आगे बढ़ाया..लड़की ने हाथ को अपने बालों पर घूमाया…और मुंह से सहसा धीमी आवाज में बुदबुदाई.

उफ़! ये छोटी बाल भी ठीक से नहीं झाड़ सकती..फिर तो मन में विचारों का महासंग्राम शुरू हो गया,.”कुछ नहीं आता इस छोटी नाम की बच्ची को.पता न खुद क्या समझती है..दिन भर हॉस्टल की छत पर बैठकर सेल्फियां लेगी.और अपने न जाने किस भइया से रात भर चैटिंग करेगी..एक काम ठीक से नही कर सकती.
माँ ठीक ही कहती थी.”उहाँ जाओ तब न समझ में आयेगा…इहां न बड़ी-बड़ी बातें याद आ रहीं बबुनी को..हाय माँ तुम कितनी अच्छी हो…बिना कहे बाल झाड़ देती थी..उफ़्फ़!आज मेस की वो सड़ेली सी सब्जी.मेरे यहां गाय-भैंस भी न ऐसी सब्जी खाएं..लेकिन मैं ही कौन सी ठीक हूँ…आज तक अच्छे से  खुदका  बाल नहीं झाड़ सकती..दो चोटियाँ नहीं निकाल सकती…हे भगवान…!

इस सोच विचार के बाद…अचानक से उसकी सामने नज़र गयी..लड़की की चेतना वापस लौटी.तो सामने वही चीर परिचित आवाज.लड़की ने रिक्शा रुकवा दिया.रिक्शे वाले ने ब्रेक मारा..लड़की उस आवाज की तरफ देख मुस्कराई तो मुंह से सहसा निकल पड़ा।.

-“क्यों अब पीछा भी करने लगे क्या ?” ए मोटी चुप.!.पीछा नहीं करते हम किसी का आया न समझ?. दया आई तुम्हारे मासूम चेहरे को देखकर.इतनी गर्मी में यहाँ से वहां दौड़ रही हो..और जानता हूँ चार घण्टा लाइन में खड़ी होने के बाद भी तुमसे  कुछ नहीं होगा
सोचें कुछ मदद कर दें..ऐसा-वैसा न समझना ” लड़के ने झल्लाहट भरे लहजे में कहा.लड़की की मुस्कान तुरन्त हंसी में बदल गयी.

-“अच्छा चलो…तुम कितना तेज सीरियस हो जाते हो जी…उल्लू..! लड़की ने माफ़ी मांगने के अंदाज में कहा.
“चलो अब घूर क्या रहे हो..लड़की ने रिक्शे वाले को पैसे दिए…और बाइक पर बैठते हुये कहा..”हाँ लेकिन इसमें शक नही की तुम बहुत खड़ूस हो..फेसबुक पर मैसेज नही कर सकते थे की मैं आ रहां हूँ नेहा..तुम यहाँ वेट करना..”

“चुप कर मोटी…अपना नम्बर तो दे नहीं सकती..पता न खुद को तुम मोनालिसा की मौसी समझती हो या मर्लिन मुनरो की मामी..अरे क्या जरूरी है कि एक लड़का एक लड़की का नम्बर उसे प्रपोज करने और परेशान करने के लिए ही मांगेगा..क्या दुनिया के सारे लड़के इतने बुरे और नीच हो चूके हैं..

यार इन फेसबुक के सो काल्ड फेमिनीस्टों ने एकदम कबाड़ा कर दिया है.पहले ही कहा कि सबको अन्फ्रेंड करो फेसबुक से..तुम मानती नहीं…तुम बताओ क्या तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारे पीछे ही पड़ गया हूँ..”?

लड़के के बातों कि स्पीड गाड़ी की स्पीड के साथ बढ़ती ही जा रही थी..लड़की ने उस पर ब्रेक लगाते हुये बड़े आराम  से कहा..”अरे!नही प्रभु..आप क्यों पीछे पड़ेंगे मेरे..मेरा इतना सौभाग्य कहाँ…अब शांत हो जाइये कृपया.लड़की ये कहकर खूब हंसी.लड़का भी मुस्कराकर चुप हो गया.और मुंह से वही पारम्परिक तकिया कलाम निकला..”चुप मोटी…”

-ए पापड़..गाड़ी सम्भालो.लगता ही नहीं की गाड़ी तुम चला रहे हो या गाड़ी तुमको चला रही है..इसके बाद एक हंसी का झोंका आया..लड़के ने चिढ़ते हुये तीन-चार वेवजह ब्रेक मारा.लड़की ने मुंह बनाकर लड़के के पीठ पर  हल्का सा एक मुक्का जमाया..और दोनों हंस पड़े..उस हंसी की उजास और सौंदर्य में समूचे सावन का सौंदर्य फीका था…कुछ देर तक गाड़ी चलती रही…और कुछ देर तक दोनों चुप रहे…मानों दोनों में कोई परिचय न हों..मानों सदियों से दोनों एक दूसरे को जानतें न हों.

कहतें हैं एक साल पहले यही लड़की बीए फाइनल में थी..और यही लड़का एम ए फाइनल में था.. दोनों एक दिन सयाजीराव गायकवाड़ लाइब्रेरी में एक ही मेज पर बैठने को लेकर झगड़ बैठे थे..बाद में लड़के ने प्रॉक्टर के सामने बहन  कहकर माफ़ी माँग लिया..फिर लड़की को चार दिन फेसबुक पर खोजने के बाद इनबॉक्स में खुद को शरीफ साबित करने के लिए रोना-धोना शुरु किया..लड़की भोली थी..तितली सी, दो-चार दिन बाद सब भूल गयी.फिर FACEBOOK पर धीरे-धीरे बातों का सिलसिला इस कदर चला कि दोनों का झगङा एक अनजाने से रिश्ते में बदलने लगा, जिसे love Story कहना अभी जल्दबाजी और दोस्ती कहना मूर्खता साबित हो सकता है.

फिर एक साल तक दोनों इसी तरह किसी न किसी बहाने एक दूजे से कहीं न कहीं कैम्पस में टकरा बैठते थे.
कभी स्वतंत्रता भवन के लेक्चर में तो कभी राधाकृष्णन हाल के सेमिनारों में.कभी हेल्थ सेंटर की लम्बी लाइनों में तो कभी विश्वनाथ मन्दिर के गलियारों में.

लड़के के दोस्त उसे चिढ़ातें थे…”अरे यार चालू टाइप लड़की है..तुम्हें एक साल से घूमा रही है पीछे-पीछे.कन्धा बना रही है..आजकल तो 1 महीने में सब कुछ हो जाता है..”लड़की की सहेलियाँ भी उस पर तंज कसतीं थीं….
“यही मिला था न तुमको….”?

लड़के और लड़की पर इन बातों से कोई प्रभाव नहीं पड़ता.दोनों जी भरके दुश्मन की तरह लड़तें थे.

हाँ ..लड़के को डार्क कलर के कपड़े अच्छे लगते थे.लड़की को लाइट.लड़का क्लास के बाद लड़की के साथ मधुबन में कॉफी पीना चाहता था..लड़की क्लास के बाद ये कहकर सीधे हॉस्टल जाना चाहती थी.”कि मैं तुम्हारी गर्लफ्रेंड थोड़े हूँ…”

लड़की को कविताएँ,कहानीयाँ,ग़ज़लें बेहद पसंद थीं..लड़के को हनी सिंह के रैप और पीट बुल और जस्टिन बीबर के गानों में  उलझे रहना अच्छा लगता था..लड़की लंका पर कहीं  छिपकर गोलगप्पे खाना चाहती थी…लड़का उसका हाथ पकड़ कर लंका पर मोमोज खिलाना चाहता था.

लेकिन ठीक एक साल चौदह महीने  बाद सितम्बर 2016 आया है..हॉस्टल,शिफ्ट,फीस,सेंट्रल आफिस,लाइब्रेरी जैसे शब्दों से फुर्सत मिली तो एक नयी आफत खड़ी हो गयी.. कल पता चला दस दिन  पहले लड़के के बाप ने उसे सिविल की तैयारी करने के लिए दिल्ली भेज दिया है….फेसबुक,wahts app, बन्द करके उसके हाथ में एक सिम्पल सा मोबाइल दे दिया गया है..पता चला दोनों में कई महीने से बात चीत बन्द है…

लेकिन लड़का अब राजीव चौक,जीटीबी नगर मेट्रो स्टेशन पर बैठे-बैठे कभी-कभार मेंहदी हसन को सुनकर रात को कविताएं और ग़ज़लें लिख लेता है… लड़की भी  आजकल डार्क कलर का सूट पहने कभी-कभार मधुबन में  अकेले बैठकर  काफी पीते हुये  पिट बुल और जस्टिन बीबर को सुनते हुये न जाने कहाँ खो जाती है.

 

3 COMMENTS

  1. अनछुए….अनकहे प्रेम की अनोखी गाथा! कुछ-कुछ ऐसा ही होता है लगभग सबके पहले प्यार का एहसास! समझ तभी आता है जब दूर चला जाता है!
    और हाँ, शुरुआत में बीएचयू में घुमाकर मन मोह लिया आपने मेरा! संवाद का लहज़ा भी ठेठ बनारसी!
    साधारण प्रेम की असाधारण प्रस्तुति पे साधुवाद!

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