एक “खत”…पिंटूआ के पापा के नाम

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love letter

सेवा में

पिंटूआ के पापा

सांझा माई के दीया बारत इहे मनावsतानीं की रउरा लोधियाना में कंचन चरत होखsब…हमार इयाद त रउरा शुके-सोमार के आवत होइ..बाकी ए जी…हम उठत-बइठत इहे मनावे नी की “हे काली माई,हे डीह बाबा..हे दसो दिशा के देवता-पीतर लो हमरा पिंटुआ के पापा के नीके से राखब सभे.

ए रों..देखीं ना… जेठ कपार पर लूत्ती लेखा जरताs..गेंहू फटक के रख देले बानीं…मंसूरी बाकी बा..कूछ जौ भी रही गइल बा..मटर त फगुए के घरी बेच देले रहनी..बाकी का कहीं..रउरा का जानब ई कुल्ह दुःख..रउरा त लोधियाना में ड्यूटी करतानी न.. हेने मए हमार ब्यूटी गेंहू आ मंसूरी फटकला में जियान हो गइल बा..तबो रउरा माई के मुंह सोझ ना रहेला…पता न कवन स्वर्ग के अप्सरा खोजत रहली रउरा खातिर..अरे! नरकंडा के कलम से भगवान हमार किस्मत लिखले रहले..ना नइहरे के सुख जननी ना ससुरे के.

बाकिर जाएं दी..नया समाचार ई बा कि..पिंटुआ के नाव सहतवार लिखा गइल.. चार हजार नाव लिखाई लागल ह आ डरेस, कॉपी,किताब,बस्ता स्कूले से..ई स्कूल ह…बुझाता की लूट लिहन स मटीलगना.

लेकिन का कइल जाई.लइका ना पढ़ी-लिखी त उहो रउरा लेखा कबो नवेडा जाई..त कबो लोधियाना..आ हम त सूखे-दुखे रह गइनी. ओकर मेहरारू ना रही..एह घरी इंग्लिश मीडियम आवतारी स….बुझनी न ?..ई कवनो पन्ना पर लिख के अपना लिलार पर साट लेब.

आ सुनीं..काल्ह फेर दुआर पर पनरोहा खातिर लउर-लाठी निकलल रहे..हम बुढ़ऊ से कहनी की जाए दी रउरा चुपे रही..इहनी के आज दू पईसा हो गइल बा त बुझा ता की अब केहू के जिए ना दिहन स..तले फनफना के नगीना पांड़े बो ऑइली हमरा से लड़े.. हमू सात पुश्त सोझा देखा देहनी..कही दिहनि की “हरजाई कहीं की बड़का सती-सवित्री बनत बाड़ू….जहिया पिंटुआ के पापा लोधियाना से अइले ओहि दिन तोर दाना दवाई ना कइनी त हमू पदारथ पांड़े के बेटी ना..”

लेकिन जाए दी..रउरा ई कुल्ह के चिंता मत करब..निमन से खाइब पियब.आ देह के धेयान रखब..सावन में आइ त मंसूरी बेच के एगो गाय खरीद लिहल जाब.कहिया ले पानी वाला दूध उठवना पियल जाई..आजीयो के तबियत अब खराबे रहता..बुझाता की जिहन ना अब.

एही में जान जाईं की परसो सीमंगल पांड़े के बेटी के बरात आई…नइहर के बक्सा खोलतानी त हमरा बरमा में आग लाग जाता…अब बताई रउरा..ओईजा मोहन बो आ बबलू बो झमका के आई लो.आ हम उहे गवना वाला पहीनब न ? आज ले रउरा कुछ जननी हमरा के..पता ना कवन कमाई करतानी..की कमाई के थाहे नईखे चलत..अरे एगो टेढ़ो-सोझ झूमका बनवा देले रहती त ई दिन ना न देखे के परित..ना कायदे के एगो लुगा बा..ना टिकुली..ना चूड़ी..अब कहम त रउरा कहब की “तहरा त चूड़ी आ साड़ी से सँतोषे ना होला..”

बाकी हम ठीके बानी..चिंता मत करब..आपन खियाल रखब.बड़ी लुक बहता..हेह घाम देख के रउरा बारे में सोचतानी त करेजा कोंहड़ा लेखा फाट के फइल जाला…कि “आही ए सती माई.. कइसे हमार पिंटुआ के पापा हेह घामा में डबल ड्यूटी क के आवत होइहें.. आ थाकल-हारल फेर खाना बनावत होइहें..केहू एक गिलास पानीयो त नइखे देबे वाला.

ए जी जब राउर इयाद आवे लान त मन करे ला की इहे दस बजीयवा पकड़ के चलीं आईं…बाकी मन मसोस के रही जानीं.

अरे कवन काम रहल ह लोधियाना गइला के..इहाँ रउरा खरहर से दुआर बहरतीं त हमरा बुझाइत की रुपए बहारsतानी.चिट्ठी के जबाब जल्दिए देब…एगो गाना लिखतानी रउरा खातिर.

काहें किरिया धरावे ल तू आन के तरे
तहके पुतरी में राखी ला परान के तरे

कवनों बतिया जो प्यार से कही ला कबो
हमके डाँट देलs थाना के दीवान के तरे

कबो बदरा नियर ना बरीसला इहाँ
हम त जरतानी जेठ के सिवान के तरे

‘राही’ रद्दी अखबार लेखा जानेलs हमें
तोहके जानीं हम गीता अउर कुरान के तरे

राउर
पिन्टूआ के माई

ग्राम मठिया पोस्ट छितौनी
जिला बलिया

 

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