कोई पॉजिटिव समाचार है ?

0
1377

सांझ हो रही है। रक्तिम प्रकाश से भरे आसमान का सूरज डूब रहा है। पुरूवा बहती है। डैने पसारे पक्षी अपने-अपने घोसलें को लौटतें हैं। एक किलोमीटर दूर पर विराजमान बाबा छितेश्वरनाथ के मंदिर से घण्टी की आवाज़ आती है। देख रहा हूँ, माँ ने तुलसी जी का दीया जलाना शुरू कर दिया है।

दरवाज़े पर बंधी गाय बोलती है,प्रेम की न जानें कौन सी बोली!

इधर छत पर टँगा मेरा मन विचारों के वेग से जूझ रहा है। हाथ में किताबें हैं लेकिन पढ़ने का मन नहीं। लिखना बहुत कुछ चाहता हूं लेकिन शब्द पंख पसारकर न जानें किस आसमान में उड़ चुके हैं।

थक-हारकर खेतों की तरफ़ देखता हूँ। प्रकृति का हरीतिम नाद चित्त को आंदोलित करता है। इस शाश्वत अनुनाद से उदासी छंटती ही है कि कहीं दूर ट्रैक्टर से आवाज़ आ रही है,

“आए हो मेरी ज़िंदगी में तुम बहार बनके…..”

सोचता हूँ कि ये ट्रैक्टर और ऑटो-जीप वाले भी गज़ब हैं। जिन खेतो में चार महीने पहले “चार दिन से सैयां हमार बढ़े टम्पपरेचर,तू धरावेलs थरेसर” बज रहा था, वहाँ आज संग्रहालय में रखे जाने वाले इस गीत को उठा लाएं हैं ?

मेरा मन “राजा हिंदुस्तानी” हो रहा है। वो खुले हुए वीसीआर और वो गोल-गोल से चमकीले सीडी कैसेट और विडियो का जमाना और छोटे से हम….वो सब याद आ रहा है।

सोचता हूँ कि इस तथाकथित ‘बहार” को क्या पता कि ये “राजा हिंदुस्तानी” का सन उन्नीस सौ छानबे नहीं है,ये तो दो हज़ार बीस है।

पूछो अपने हीरो से कि क्या इस कोरोना काल में ज़माना “फॉरेस्ट गम्प” का रीमेक “लाल सिंह चड्ढा” नहीं हो गया है ? और क्या आम आदमी की ज़िंदगी अमरीका और वियतनाम का युद्ध लड़ रहे ‘फ़ारेस्ट गम्प’ जैसी नहीं हो गई है ?

शायद हाँ, हो गई है। लेकिन इस चिंता में गीत सुनना कैसे छोड़ा जाए ?

लाल सिंह चड्ढा कैसी होगी मुझे पता नहीं लेकिन मुझे फॉरेस्ट गम्प से प्रेम है।

मैं छत पर बैठा अभिनेता टॉम हैंक्स का वो चेहरा याद करता हूँ। जब वो कहता है कि मां कहती थी कि ज़िंदगी चॉकलेट के डिब्बे की तरह है..किसको क्या मिलेगा पता नहीं ?

सोचता हूं दुनिया भर की माएं कितना सच कहतीं हैं।

अब मोबाइल की स्क्रीन पर नया समाचार तैर रहा है। आज जनपद में इतने पॉजिटिव!

सच कहूँ तो इन तीन चार महीनों में इस पॉजिटिव शब्द नें इतनी निगेटिविटी फैलाई है, जिसका कोई हिसाब नहीं है। इस पॉजिटिविटी से भरी निगेटिविटी से मन काढ़े जैसा नीरस हो गया है।

लेकिन ये क्या मोबाइल पर सरस संगीत बज रहा है।

अभी-अभी मेरे एक अजीज़ मित्र आज चार महीने बाद मुझे याद कर रहें हैं। मेरा रिंगटोन बज उठा है,वही यमन की बंदिश, “सखी ए री याली पिया बिन”

अचानक मस्तिष्क में राग यमन के सुर कौंध रहें हैं…तो मेरा छोटा सा कलाकार मन सोचने पर विवश हो जाता है कि अरे यार ये “आए हो मेरी ज़िंदगी में तुम बहार बनके” कहीं राग यमन में तो नही कम्पोज हुआ है ?

मन गुनगुना रहा है दोनों को…प्रसन्न हो रहा है थोड़ा-थोड़ा। शायद हाँ!

एक बार ट्रैक्टर वाले को सलाम करने का मन करता है। सोचता हूँ पास होता तो पूछता कि तुम इस साँझ को लगभग राग यमन में बना हुआ गाना बजा रहे हो, कहीं बेरोजगार कलाकार तो नहीं हो ?

लेकिन मित्र का फोन घनघनाता जा रहा है। वो बनारस में रहतें हैं और हमनें साथ ही बीएचयू से स्नातकोत्तर की डिग्री ली है। गाने के सुर को राग के सुर से मिलानें के चक्कर में फोन न उठाना क्या एक मित्र के प्रति अपराध नहीं होगा ? बिल्कुल होगा।

क्या है कि आजकल मैं डरते हुए फ़ोन रिसीव करता हूँ। क्या पता कौन सा अशुभ समाचार आ जाए। सुन रहा,मित्र के आवाज़ में गहरी उदासी है।

“अतुल भाई सब चौपट हो गया। कोरोना के कारण सात-आठ लाख के घाटे में चल रहा हूँ। मन ज़िंदगी से ऊब रहा है। खाने-पीने तक के पैसे नहीं हैं। अब कहीं पाँच हज़ार की नौकरी भी मिल जाए तो भगवान की बड़ी कृपा हो।”

मैं भी क्या कहूँ ? सोच में पड़ जाता हूँ। तीन बार नेट क्वालिफ़ाई कर चुका एक अच्छा-ख़ासा अध्यापक लड़का आज पाँच हज़ार की नौकरी खोजने पर मजबूर हो गया है,तो बहुत साधारण लोगों का हाल क्या होगा ?

मन का द्वंद्व रुकने का नाम नहीं लेता। किसी को सलाह देना दुनिया का सबसे आसान काम है,वही काम करके मैनें फ़ोन रख दिया है।

“मेरे भाई धीरज रखो,सब ठीक हो जाएगा।”

मुझे ठीक-ठीक याद है कि आज विश्व फोटोग्राफ़ी दिवस है। फ़रवरी के महीने में खींचीं मेरी एक तस्वीर मेरे सामने है। सोचता हूँ कुछ लिखकर शेयर करूँ लेकिन मन फिर उदास हो गया है। मित्र से बात करनें ने बाद राग यमन की बहार एक झटके में मारवा बन जाएगी पता नहीं था।

सोचता हूँ मेरे तमाम प्रिय लोग ठीक रहें। तमाम लोगों के ज़िंदगी की गाड़ी का पहिया स्पीड से चले…

लेकिन सिर्फ सोचने से सब कुछ ठीक हो जाता तो क्या ही बात होती।

लीजिये..गाँव में हल्ला हो रहा है,

पुरुब टोला की फलाना बो कोरोना पॉजीटिव हो गईं। कोई उधर नहीं जाएगा रे। दिन भर फलाना बो की घर के आस-पास मूड़ी और गोड़ गाड़कर रहने वाले लोग इस सूचना को गाँव भर में प्रसारित कर रहें हैं।

सूचना पाकर गाँव के कुछ लोग सदमें में हैं। बाप रे,फलनिया बो तो उसके घरवा ही दिन भर घुसी रहती है। फलाने तो उसके बाबूजी से मांगकर दिन भर खैनी खाते हैं। अरे कल हमरे घर से न जाने का मांगकर ले गई।

लोग डरे हैं। लेकिन कब तक ?

सब जानतें हैं कि गाँव तो शहर नही है कि सारी दुनिया दो कमरे में सिमट जाएगी। जो होगा देखा जाएगा। हमें तो खेत भी देखना है और दरवाजे पर बंधे जानवर भी।

अचानक आलोक भाई कानपुर से फ़ोन करतें हैं,”का हो कवनो नया समाचार बा ? कवनो बढ़िया समाचार ! यानी कवनो पॉजिटिव समाचार ?”

मैं कैसे कहूँ कि गाँव में पहला पॉजिटिव केस निकला है,यही तो पॉजिटिव समाचार है।

लेकिन कहना पड़ता है…सब बढ़िया समाचार है।

उनका भी वही हाल है। उनके ज़िंदगी की अनिश्चितता डराती है। वही दिलासा,वही बातें..”सब एक दिन ठीक होगा भाई…”

और क्या करूँ…आजकल दिन भर अपना लिखा गया उपन्यास पढ़ता हूँ। कल रात देखा मैनें की मेरी नायिका चन्दा उर्फ़ पिंकी का घर बाढ़ में डूब गया है।

उसकी किताबें,उसके सपने उसके सारे प्रेम पत्र और उसकी कविताएं बाढ़ के पानी में बहे जा रहें हैं।

मुझे लगा मेरा ही सपना डूब रहा है।

सुबह उठकर देखता हूँ क्या ही अज़ीब संयोग है। आज दैनिक जागरण में बाढ़ पीड़ितों की व्यथा छपी है। ख़बर है कि “गंगापुर के चन्दा” की शादी नवम्बर में है…और चन्दा की मां नें बाँध पर अस्थायी घर बना लिया है।

मुझे मेरी नायिका “चांदपुर की चंदा” की याद आ रही है। अरे उसकी भी तो शादी नबम्बर में ही होनी थी न। क्या अद्भुत लेकिन दुःखद संयोग है। मुझे लगा बाढ़ में डूब रही हज़ारों चँदाओं की आवाज़ मैनें दे दिया है।

कल सोचा है जाऊंगा अपनी चन्दा के घर,अपनी पिंकीया के घर..देख लूं उसका घर..कहीं सच में तो नही डूब गया..।

घर में कोहबर बनाने लायक जगह है कि नहीं ?

पूछ लूं कैसा है चाँदपुर.. कैसी हो मेरी चन्दा..? तुम्हारा घर बाढ़ के पानी नें अशुद्ध तो नही कर दिया ?

बस इसी चिंता में नींद नही आती है।रात को बारह बज रहे हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का अशोक मेरे हाथों में खिल रहा है…वो चुपके से कह रहे हैं..

“सबकुछ अविशुद्ध है बबुआ सब कुछ। शुद्ध है केवल मनुष्‍य की दुर्दम जिजीविषा,वह गंगा की अबाधित अनाहत धारा के समान सब कुछ हजम करने के बाद भी पवित्र है।”

बस इतना ही पढ़ने के बाद नींद आ रही है।

मुझे आचार्य श्रेष्ठ की इस बात से जरा सी भी असमहति नही है।

आज उनका जन्मदिन है…पास होते तो भोजपुरी में कहता सही कहतानी बाबा एकदम सही कहतानी…

मुझे जीवन की तमाम झंझावतों और विपत्तियों से जूझते मनुष्य की दुर्दुम जिजीविषा पर भरोसा हो चला है।

मुझे लगता है कि किसी रोग से आदमी नहीं मरेगा। बस यही दुर्दुम यही जिजीविषा जिस दिन मरेगी..आदमी उसी दिन मरेगा।

Comments

comments