Kids Story
स्कूल के उन 6 घण्टों में एक-एक कर टनटनाती घँटीयाँ ..अभी पांचवीं लगी…बाप रे! अभी चार घँटी और पढ़ना है..दिल धक्क से भारी हो जाता था..लो अब छठवीं में तो पांडे सर आ गये..आज गुलाब की छड़ी लेकर..जिसने होमवर्क नहीं किया वो अपनी पीठ और तशरीफ़ को याद करके भगवान का सुमिरन करने लगता था..”हे! भगवान इ पंडवा मर क्यों नहीं जाता”
भगवान पर इस सुमिरन का कोई असर नहीं पड़ता.पांडे सर आराम से सूर्ती खाकर आते,और सबसे पहले अपने पारंपरिक स्टाइल में सबके चेहरे पर इस अंदाज में दृष्टीपात करते मानों सभी ने उनकी i बकरी चुरा ली हो. फिर क्या…वही होमवर्क..वही पारम्परिक सवाल…’कल क्यों नहीं आए तुम”?. “सर जी उ का है न की…हाँ हाँ बोलो..सर जी उ
बोलो बोलो.उ हमारी भैंस गरम हो गयी थी…और खूंटा उखाड़ के न जाने कहाँ भाग गयी थी..सब लोग उसे ही खोजने निकल गये.
लिजिये साहेब…..इस भयंकर बहानेबाजी के बाद क्लास में हंसी मिश्रित ऐसी शांति उतपन्न होती की पांडे सर की खल्वाट खोपड़ी गरम हो जाती..”तो जाके भैंस ही क्यों नहीं चराते हो..क्या करने पढ़ने आ गये…एप्लीकेशन दिखाओ.”
“नहीं सर जी..लो.तब.सट-सट…..एक,.”दो,तीन,चार…बेचारे के पीठ का मुंह लाल हो जाता था…कई लोग तो उसके पीटा जाने से बड़े खुश भी हो जाते और पांडे सर को मन ही मन शाबाशी भी दे देते..’ठीक किये हैं सर कल हमें इ भोजन की घँटी में मार रहा था..क्यों बे आया न मजा अब.
हर घँटी का यही किस्सा था.वही होमवर्क, वही छड़ी..वही मैथ के सूत्र याद करने का बोझ, इंग्लिश वाले सर तो लगता की पार्ट आफ स्पीच लेकर ही पैदा हुये हैं…भले एक ही पेंट शर्ट पहनकर एक हफ्ता आएं पर उनको देखकर लगता था कि इनसे बड़ा अंग्रेजी का विद्वान इस धरा-धाम पर अब बचा ही नही है.
उनकी फटकार और डस्टर से मार भी सह ली जाती…तो छुट्टी के समय प्रिंसिपल के बेहिसाब प्रवचन से त्रस्त होना पड़ता था. फिर छुट्टी की उस मनमोहक,सुमधुर,घँटी की आवाज कानों में पड़ते ही लगता पैरों में हवाई जहाज के पंख लग गये हैं…आहा! इस घँटी की आवाज सुनने के लिए कान तरस गये थे.
तब लगता कैसे दौड़कर जल्दी घर पहुंच जाते.चलते कम दौड़ते हुये घर जाते…बस्ता फेंकते..माँ चिल्लाती अरे एक रोटी और तो खा रे आवारा…टिफिन भी ठीक से खतम नहीं किया.लेकिन कौन खाने जाए..क्योंकि दरवाजे पर पड़ोस का सनुआ आकर मंडराने लगता.उसके पीछे रनुआ भी है..अभी बबलुआ और कुलदीपवा इंतजार कर रहे हैं…पिंटूआ पुल पर खड़ा है.इस सनुआ और रनुआ के मंडराने से आशय यही था कि “अब खेलने की घँटी लग गयी भाय अब खाना-पीना छोड़के जल्दी चलो”
फिर गुल्ली डण्डा लिया जाता…और ऐसा महसूस होता मानों तिहाड़ जेल से रिहाई हुई हो.फिर तो आज कौन-कौन किस ओर से खेलेगा इसको तय किया जाता गुल्ली और डण्डा बनाने का स्पेशलिस्ट पिंटूआ था..किस लकड़ी की कैसे, कितने इंच,सेंटीमीटर की गुल्ली बनानी है ये पिंटूआ इस अंदाज में तय करता मानों फिरोज शाह कोटला का पिच क्यूरेटर वही हो…फिर किसी बरमेसर राय के बगीचे में ऐसा मैच जमता कि उस आनंद को बयाँ करने के लिए दुनिया की किसी डिक्शनरी में शब्द नहीं हैं.
वोआनंद आजकल पैदा होते ही एंग्री बर्ड और टेम्पल रन खेलने वाले नहीं जान पाएंगे.अफ़सोस..आज गाँव के इन पारम्परिक खेलों को क्रिकेट ने छीन लिया है…रही-सही कसर कार्टून टीवी ने ले ली है..अब बच्चे ढोलकपुर के छोटा भीम को गुल्ली डण्डा खेलते हुए देखकर ही खुश हो जाते हैं.माँ बाप भी इतना ज्यादा प्यार करने लगे हैं की …”अले ले ले मेले बेटा जी..आपको चोट लग जाएगी न..बाहर मत जाओ..वीडियो गेम खेलो..कभी-कभी तो हंसी आती है..आज चोट से इतना डर है.अरे! हमारे समय तो हम हाथ-पैर छिलवाने के बाद भी दो चार थप्पड़ पा जाते.
लेकिन आज माँ-बाप नहीं समझ पा रहे की बच्चे का सर्वांगीड़ विकास सिर्फ इंग्लिश मीडियम और महंगे स्कूल में परहे…पढ़ाकर और इंटरेनेट का मास्टर बनाकर नहीं होगा..आज उसे ज्यादा से ज्यादा आउटडोर एक्टिविटी में बीजी रखना होगा..ताकि यही बच्चा अचानक से पढ़ाई और कोटा-मुखर्जी नगर जाकर असफलता की चोट से कभी आत्महत्या न करे..घर से बाहर खेले जाने वाले खेलों में बार-बार हारकर जीतने से उसे जिंदगी भर प्रेरणा मिले.
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