आज का आदर्श रिसर्च स्कॉलर कल का आदर्श पति है।

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साँझ होने को है। बारिश रूकने का नाम नहीं ले रही है। इसी साँझ की बारिश में एक प्रेमी युगल बस स्टॉप पर खड़ा है।
अंधेरा अभी हुआ नहीं है लेकिन लड़के की आंखों के नीचे का कालापन साफ-साफ देखा जा सकता है।

लड़का विश्वविद्यालय में शोध छात्र है और लड़की विश्वविद्यालय में शोध छात्रा होने की तैयारी कर रही है।

बीते एक-डेढ़ साल से अपने सारे अरमानो को क्वारन्टीन रखने के बाद आज लड़की नें एक वेबसीरिज देखकर ठान लिया है कि वो लड़के को किसी सीसीडी-स्टारबक्स में ले जाएगी। कॉफी पीएगी और हाथों में हाथ डालकर बाबू-सोना करते हुए देर तक रिसर्च करेगी कि आने वाले कुछ सालों में ये रिसर्च कैसे होगा ?

लेकिन लड़के के हॉस्टल में वाईफ़ाई की स्पीड इतनी तेज नही आती कि वो इस तरह की रोमांटिक वेबसीरीज देखकर डेटिंग टाइप ख़ालिस शहराती ख्यालों में खो सके।

उसके मोबाइल तो ले-देकर यू ट्यूब है और उस यू ट्यूब के सर्च बॉर में भी “हाउ टू प्लान फार ए रोमांटिक डेट” की जगह “बालों को सफेद होने से कैसे बचाएँ” खोजा गया है।

फलस्वरूप लड़का डेटिंग के इस आधुनिक चोंचलों से दूर अपने मोबाइल में आ रहे बेहिसाब नोटिफिकेशंस को देख रहा है।

अचानक बस आती है। दोनों बस में बैठ जाते हैं। दोनों की नज़रें खिड़की के बाहर न जानें क्या खोजने लगतीं हैं। बहुत देर के बाद लड़की की चेतना वापस लौटती है,

“सुनों,

“हां”

“अगले महीने लड़के वाले मुझे देखने आ रहें हैं।”

“क्या ?” लड़का चौंकता है।

“हाँ,पापा कह रहे थे,लड़का कहीं असिस्टेंट प्रोफेसर है।”

“बढ़िया है तब तो,कर लो..!”

“इस साल तुम थीसिस जमा कर पावोगे ?

“नहीं कर पाऊँगा और जमा करते ही असिस्टेंट प्रोफेसर तो बन नहीं जाऊँगा,फेलोशिप भी अब बन्द होने जा रही…!”

ये जबाब सुनकर लड़की चुप हो गई है। उसे तो ऐसे Ptsd की अपेक्षा नही थी। वो तो सुनना चाहती थी कि बेबी यू कांट गो अवे फ्रॉम मी ! लेकिन लड़के नें ठान लिया है कि आज सख़्त बने रहना है।

इधर बस में भीड़ बढ़ रही है। एक बाबा लड़के की तरफ़ चले आ रहें हैं। लड़का किसी प्रदेश के सीएम जैसा अपनी सीट छोड़कर सामने खड़े इस अनजान शख्स को सीट दे देता है। लड़की नाराज होती है,” सीट क्यों छोड़ दिये ?”

लड़का मामला सम्भालता है,”इनको दूर तक जाना है न हमारा क्या है,हम तो आगे ही उतर जाएंगे ?”

लड़की को इस जबाब से संतुष्टि नहीं मिलती है। आँखों ही आंखों में उसे डाँटती है कि तभी लड़के के मोबाइल पर एक वायस मैसेज सुनाई देता है।

“एक किलो आलू,एक किलो प्याज और आधा किलो टमाटर,धनिया और लहसुन लेकर अभी घर जावो…!”

“ये मैडम कौन है ?” लड़की चौंककर पूछती है।

“सर की वाइफ हैं…!” लड़का बताता है।

“तो तुम प्रोफेसर के अंडर में पीएचडी कर रहे हो या इनके वाइफ के अंडर में ?

” सर कहीं व्यस्त हैं, कोई आ गया होगा”

“यार अब ये क्या बात हुई ? सर लाखों की सैलरी पाते हैं,एक अदद नौकर नही रख सकते या तुमने सिनॉप्सिस में लिखकर दिया था कि सर हम पाँच साल में पीएचडी करें या न करें,आपके घर का सारा काम करेंगे ? “

प्रेयसी के मुँह से ऐसी बातें सुनकर लड़के का चेहरा बाढ़ के पानी की तरह उतर रहा है। वो खामोश हो जाता है। बड़ी देर बाद फिर बोलता है।”

“प्रिया ये पीएचडी है,एमए नहीं। किसी दूसरे दिन कॉफी पीते है न ? आज मिल लिए क्या इतना काफी नहीं है ?

लड़की नें गुस्से में सर पकड़ लिया है। उसे गुस्सा आ रहा। मन कर रहा चिल्लाए। इधर लड़का बेचारा पारंपरिक प्रेमियों की शाश्वत चिरंतन मुद्रा में लड़की को मनानें लगा है।

” सब ठीक है प्रिया, लेकिन ये न भूलो की मेरे शोध का विषय “भक्तिकालीन साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियां” हैं..इतनी सेवा तो करनी ही पड़ेगी..!

ये सुनने के बाद लड़की का गुस्सा अब सातवें आसमान से एक-डेढ़ फीट ऊपर जा रहा है। भक्तिकाल में पीएचडी करने की चुनौतियाँ समझाते-समझाते लड़के की आंखों में काव्यगत सौंदर्य उभर आया है।

वो जल्दी-जल्दी अपनी बात खत्म करता है,”तुम भी तो प्रगतिशील साहित्य के ऊपर सिनॉप्सिस लिख रही हो न? जल्दी पता चल जाएगा कि भक्तिकाल का प्रगतिशील काल में क्या महत्व है !”

ये सुनकर लड़की निरुत्तर है। उसे अपना भविष्य अंधकारमय दिख रहा है। बारिश फिर से आने वाली है।

कुछ देर पैदल चलने के बाद अब दोनों सब्जी मार्केट आ चुके है। बारिश शुरू हो गई है। लड़का भीगते हुए बड़ी तन्मयता से आलू,प्याज और टमाटर को उलट-पलटकर चेक कर रहा है।

इधर बड़ी देर तक उदास रहने वाली लड़की लड़के को देखकर अचानक मुस्कराने लगी है।

लड़के को आश्चर्य होता है..”अब क्या हुआ, तुम हंस क्यों रही हो ?”

लड़की चुप है।

“बोलो,क्या हुआ ?”

लड़की आंखों की भाषा बोलना चाहती है। लेकिन आलू-प्याज की तेज महक में उसकी आवाज़ कहीं खो सी जा रही है।

लड़का पूछ रहा है.. “क्या हुआ हँसने क्यों लगी?”

लड़की नें लड़के का हाथ थाम लिया है !

” आज मेरा शोध पूरा हुआ आदर्श”

“क्या?”

लड़का चौंकता है।

“मैं तुम्हारे,धैर्य,श्रम,समर्पण, संवेदना और सहिष्णुता पर मुग्ध हूँ आदर्श..!

क्या बात कर रही हो..?

“हां, आदर्श मैं जान गई कि आज का आदर्श शोध छात्र कल का आदर्श पति है। “

ये सुनकर लड़का चुप है।

देखते ही देखते बारिश तेज हो गई है। लड़की की आँख में खुशी के आंसू आ गए हैं और लड़के के हाथ में आलू,टमाटर,प्याज और थीसिस के कुछ अधूरे पन्ने…..!

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