हमारी रचनात्मक दुनिया में बच्चे कहाँ हैं ?

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वाराणसी का नगवाँ मोहल्ला यानी अस्सी मोहल्ले का     सहोदर भाई…!

इसी मोहल्ले के सबसे अंतिम छोर पर मेरे एक मित्र रहते थे। वो उत्तर प्रदेश परिवहन निगम में संविदा कर्मचारी थे। वेतन तो बहुत कम था लेकिन सपने  ज़्यादा थे। उन्हीं सपनों में से एक सपना ये था कि उनके बच्चे किसी अच्छे कान्वेंट स्कूल में पढ़ सकें।

संयोग से एक साँझ अस्सी पर मिल गए। मैंनें देखा,
चेहरे पर वही हँसी है,जो दस साल पहले थी। लेकिन आज उनकी बातों में जवानी की पीड़ा नहीं बल्कि गृहस्थी का बीड़ा है।

उनके हाथों में टँगा दाल,नमक,चीनी,तेल,क्रीम,
पाउडर का झोला चिल्ला-चिल्लाकर बता रहा है कि मित्र के बच्चे तेजी से बड़े हो रहें हैं।

हमको देखते ही हँसनें लगे,”अरे! अतुल भाई आप ? गोदौलिया से इधर कब आए ?”

हमनें कहा,” एमए में एडमिशन हो गया सर! बगल में ही तो हॉस्टल है। “

ये सब सुनकर उनके चेहरे पर एक लालिमा छा गई।उस प्रसन्नता में उत्तेजनाओं की एक ध्वनि थी। उन्होंने तपाक से कहा…”आवा गुरु आज भौजाई के हाथ क चाय पिया..”

हमनें कहा ठीक ही है..चाहें ददवा की चाय पियें या भौजाई की ! चाय तो पीनी ही है..!

हम दोनों साथ-साथ चलने लगे। बात होने लगी,कुछ नई… कुछ पुरानी ! हमनें पूछा,”आपकी स्पलेंडर प्लस क्या हुई जो पैदल चल रहे हैं ?”

उन्होंने कहा,”बीएचयू अस्पताल से चोरी हो गई।”

हमनें दुःख जताया। ये बताकर सांत्वना दिया कि मेरे दोस्त की बाइक तो संकटमोचन से ग़ायब हो गई थी..आपकी तो दहेज़ वाली थी!

मित्र हंसे…थोड़ी देर में उनका घर आ गया।

दो कमरे का छोटा सा सीलन भरा वही मकान..! जिसकी सुध मकान मालिक को केवल किराया लेने के समय ही आती है।

दरवाज़ा खुला! “पापा आ गए.. पापा आ गए”, बच्चे चिल्लानें लगे।

बच्चों नें पापा के हाथ से सामान छीन लिया। भाभी जी भी हँसते हुए प्रगट हो गईं…”नमस्ते-नमस्ते” हो गया।

थोड़ी देर में चाय आ गई। चाय पीना शुरू हुआ कि अचानक भीतर से बच्चा पार्टी बहुत तेज़-तेज़ रोनें लगी… मार-पीट,फेको-तोड़ो की आवाज़ें आनें लगीं।

भाभी ने बैठे-बैठे चिल्लाया, “काहें रो रही है शालू ?”

भाभी के प्रश्न पर कोई सुनवाई नहीं हुई। बच्चे रोते रहे…लड़ते रहे।

एक अतिथि के सामने बच्चों की ये मज़ाल ? एक औसत गार्जियन की तरह मित्र का धैर्य टूट गया। वो झट से उठे और जाकर दोनों दो-दो थप्पड़ लगा बैठे।

बच्चे चुप हो गए। भाभी झेंप गईं..इस बार वो हमसे मुख़ातिब थीं, ” अरे आप जानते नहीं..ये सब इतने दुष्ट हो गए हैं कि जो टीवी में एड आ रहा इनको वही वाला चाहिए…!”

मैं क्या कहता ? मेरे पास टीवी नही है। हमको क्या पता कौन सा विज्ञापन चल रहा है,लेकिन भाभी की बातों से सहमति प्रगट करनीं पड़ी।

मेरे चेहरे पर एक औपचारिक मुस्कान आ गई। मैनें देखा मेरे मित्र लाचार पिताओं की तरह दाँत निकाल रहें हैं,

“अरे अतुल भाई..बड़ी आफ़त है..इन ससुरों को क्या पता कि दो महीने से बाबूजी का तनख़्वाह नही मिला है,बाइक चोरी हो गई है। इनको तो बस अभी का अभी चाहिए।”

भाबी जी हँसने लगीं.. “बहुत जिद्दी होते जा रहें हैं सब”

हम चाय पीते हुए ख़ामोश थे। बच्चे अभी भी रो रहे थे..लेकिन लय थोड़ा विलम्बित हो गई थी। पति-पत्नी अभी भी मुस्करा रहे थे।

ये एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार की रोज़ वाली हँसी थी,जिसमें उदासी,बेबसी,मजबूरी की कई ध्वनियाँ गूँज रहीं थीं।

मैं लौट आया ! ख़ुद से पूछते हुए कि इसमें दोष किसका है ? क्या उन बच्चों का है,जिनको विज्ञापन वाला सामान चाहिए ? या उस पिता का है,जिसको दो महीने से तनख़्वाह नहीं मिला है और बाइक चोरी हो गई है?”

बड़ी देर तक सोचने के बाद समझ आया कि दोष तो इसमें किसी का नहीं है। ये तो हर परिवार की व्यथा-कथा है।

दोष तो सिनेमा,टीवी के माध्यम से निकल रहे उसे रचनात्मक संसार का है जो बाज़ारवाद की विषबेल से पैदा होकर हमारे मीडिल क्लास घरों में घुस आया है।

आज बच्चे को छोड़िए…हमें भी तो वही क्रीम चाहिए जिसको छूते ही लड़कीयों पर लड़के मरनें लगतें हैं। वही चॉकलेट,जिसको खाने से लड़की पट जाती है। वही साबुन,जो सबसे ज़्यादा कीटाणु मारता है। वही पेन,जिससे लिखते ही आदमी टॉपर बन जाता है।

और देखते ही देखते इसका असर इतना ख़राब हुआ है कि हमें पता नहीं चल पाया है कि इस चक्कर मे हमारे अवचेतन में क्या-क्या चला आया है।

उपर से हमारा सभ्य रचनात्मक संसार इस साजिश के आगे असहाय खड़ा है। वो इतना कमजोर और नकली हो गया कि वो इसके विरुद्ध कोई रचनात्मक प्रतिरोध न रच सका है।

कोई ऐसी फ़िल्म,कोई धारावाहिक,कोई कविता, कहानी, उपन्यास या कोई विज्ञापन न रच सका जिसको देखकर आपके बच्चे जान सकें कि अगर बाप को दो महीने का तनख़्वाह न मिले तो क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए!

सवाल तो है न कि आख़िर ये विवेक कैसे आएगा ?

कैसे आएगा जब इस परदे की दुनिया से बच्चे गायब रहेंगे… एक मिडिल क्लास बच्चों का पिता गायब रहेगा ?

कुछ तो उनके हिस्से का होना चहिये था न.. किसी रचनात्मक संसार में उनका कोना रखना चाहिए था न ?

लेकिन नहीं हो पाया…हमनें उनकी दुनिया ही अलग कर दी है..बाल फ़िल्म,बाल साहित्य नाम दे दिया।जिनकी सार्थकता बच्चों के मनोरंजन तक सीमित हो गई।

आज बॉलीवुड हर साल आठ सौ से ज़्यादा फ़िल्में बनाता है..लेकिन आठ फ़िल्में भी ऐसी नहीं आ पातीं जिसको देखकर कोई बाप ये कहे कि चलो आज तुमको फ़िल्म दिखाता हूँ।

दर्जनों सीरियल आतें हैं..लेकिन उसमें मोहब्ब्त है,इश्क है,सास, ननद,भौजाई का झगड़ा है..लेकिन बच्चे नहीं है।

और कमाल की बात ये है कि ऐसे सीरियल सबसे ज़्यादा मिडिल क्लास घरों में देखें जातें हैं,लेकिन उन सीरियलों में मिडिल क्लास ही गायब है।

वरना आप बताइए भला… इतना ज़्यादा मेकअप करके कौन खाना खाता है,अपने घर में ? फ़िल्म की तो रचनात्मक मजबूरी है कि तीन घण्टे में सब समेटना है लेकिन टीवी सीरियलों की..?

जबकि इनका मुख्य दर्शक ही मीडिल क्लास है.. लेकिन भव्यता और शानो-शौकत! लाइफ स्टाइल उस ख़ास वर्ग की रहती है जो देश के कुछ ही प्रतिशत लोगों को नसीब है।

ऊपर से हमारी वेबसीरिज…हर हफ़्ते आ रहीं हैं…
इनमें गालियाँ हैं.. सेक्स हैं…बलात्कार है,क्राइम,
सस्पेंस,थ्रिलर है..यानी वही दुहराव है.. जिसे हम बार-बार नाम बदलकर देख रहें हैं..

किसी कॉलेज कैम्पस की स्टोरी है तो उसमें भी गाली उसमें भी सेक्स है…समझ नही आता कि ऐसा कॉलेज देश किस कोने में है…ऐसे लोग कहाँ रहतें हैं जिनसे आज तक हमारा सामना नही हुआ।

और एक सभ्य समाज इसका महिमामंडन करता नहीं अघाता ?

उनसे पूछने का मन करता है कि हिंसा मनोरंजन कैसे हो सकता है ? बताइये जरा…क्या इस समाज में केवल हत्याएं हो रहीं हैं..? इस दुनिया में केवल चोर-पूलिस,माफ़िया और गैंगेस्टर ही अब बचें हैं।

लेकिन कोई नहीं पूछता…!

देश का एक बौद्धिक तबका ऐसे डायरेक्टरों के साथ खड़ा है..उनके बौद्धिक अहंकार को तृप्त करता हुआ। उनके दुहराव से भरी हर कृति को कालजयी बताता हुआ।

इन सवालों पर चुप्पी साधता हुआ कि ये सिनेमा की कौन सी कृत्रिम दुनिया है,जिसमें केवल एक ही किस्म के लोग हैं..? ये कौन सी दुनिया है जिसमें बच्चे नहीं हैं उनके मिडिल क्लास पिता नहीं हैं ?

आपको शायद पता हो..कभी यूरोप में हिटलर और
मुसोलिनी नें ऐसा ही किया था… यानी अपनी पसंद का सिनेमा बनवाया और जनता को दिखाया।

जनता उसे देखकर मस्त रहती थी..क्योंकि उस सिनेमा में जनता न ख़ुद को देख पाती थी न अपने ख़िलाफ़ हो रही साज़िश को देखती थी।

आज का टीवी-फ़िल्म जगत उसी राह पर है।

देश का इंटरटेनमेंट वर्ल्ड हिटलर और मुसोलिनी की राह पर है जो मुनाफ़े के चक्कर में अपनी पसंद को हमारे ऊपर थोप रहा है..और इनकी हिटलरशाही की शराब पीकर देश की जनता ख़ुद को भूल रही है..

आपका बच्चा जब “चार बोतल वोदका,काम मेरा रोज़का” सुनकर बड़ा होगा तो उसे कैसे पता चलेगा कि पिताजी की दो महीने की तनख़्वाह न मिले तो क्या करना चाहिए…क्या नहीं करना चाहिए।

संयोग से यूरोप में तो क्रांति हुई। इटली के निर्देशक विक्टरियो डी. सिका नें 1948 में कल्ट क्लासिक फ़िल्म “बाइसिकल थीव्ज़” बनाई।

ये फ़िल्म आज सत्तर साल बाद भी उतनी ही प्रासंगिक है। जितनी उस समय थी।

जो सिनेमा के शौकीन होंगे..उन्हें याद होगा द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद रोम की सड़कों पर उतरी बेरोजगारों की फ़ौज का वो मंजर !

उसी भीड़ में एक पत्नी है,एक बेटा है और एक बेरोज़गार पिता है।

एक दिन उसे पता चलता है कि उसके पास अगर साइकिल रहे तो उसे दीवारों पर पोस्टर चिपकाने की नौकरी मिल सकती है।

वो कहीं से पैसे का जुगाड़ करता है,साइकिल ख़रीदता है। नौकरी मिल जाती है..लेकिन एक दिन पोस्टर चिपकाते समय ही साइकिल चोरी हो जाती है।

फिर पिता-बेटे के साथ मिलकर चोर की तलाश में गली-गली छान मारता है।कभी भाग्य बताने वाले के पास,कभी यूनियन की मीटिंग में तो कभी साइकिल खोजते-खोजतें वेश्यालय में चला जाता है लेकिन साइकिल नहीं मिलती है।

पिता बेटे के साथ सड़क पर बैठ जाता है। खड़ी हो जाती है बेटे की होशियारी और जागरूकता..वो चोर को खोजने के लिए बाप से भी ज़्यादा तत्तपर हो जाता है।

कई बार लगता है,वो बेटा नहीं,बाप है ! साइकिल उसके बाप नें नहीं,उसी नें ख़रीदी होगी।

बाइसिकल थीव्ज़ का एक दृश्य !

आख़िर बाप-बेटे को साइकिल नहीं मिलती और एक सभ्य बाप अपने बेटे के सामने ही साइकिल चोरी करने का फैसला करता है और पकड़ा जाता है।

आज भी लग रहा है कि तमाम पिताओं की साइकिलें  चोरी हो रहीं हैं..आज भी माज़िद मजीदी की चिल्ड्रेन्स ऑफ़ हैवन में ‘अली’ का जूता चोरी हो रहा..आज भी तमाम भाई बहन बिना माँ-बाप को बताए एक ही जूते से काम चला रहे हैं,लेकिन हमारा बॉलीवुड संसार “लैला तेरी ले लेगी तू लिख के लेले” बजा रहा है।

फिर हम कैसे हम कल्पना करें कि आपके हमारे बच्चे आपकी मजबूरियों के प्रति संवेदनशील हो पाएंगे ?

कहतें हैं.. “बाइसिकल थीव्ज़” के बाद विश्व सिनेमा में “नियो रियलिज़्म” जैसे शब्द की उतपत्ति हुई..एक बड़ी क्रांति हुई..बंगाल का कोई साधारण सा पेंटर इस फ़िल्म को देखकर वो “सत्यजीत रे” बन गया।

जिसनें “पथेर पांचाली” जैसी फ़िल्म बनाकर हिंदुस्तान के सिनेमा को वैश्विक प्रतिष्ठा दिलाई। लेकिन हमनें “पथेर पांचाली” को ऑस्कर में इसलिए न भेजा कि इसमें भारत की ग़रीबी और बेबसी दिखाई दे रही थी।

पाथेर पांचाली का एक दृश्य!

आज भी वही परिपाटी चल रही है। सिनेमा में भारत की ग़रीबी और यथार्थ नहीं दिखना चाहिये…न दिख रहा है।

हमारे सामने..एक स्वप्निल संसार..एक मिथ्या जगत खड़ा है..जिससे इस देश का बड़ा वर्ग कोसों दूर है।

हं रियलिज़्म की बातें होती हैं..लेकिन रियलिज़्म के नाम पर क्राइम,सेक्स और सस्पेंस और गालियों और गोलियों की दुनिया है।

इसलिए आज यही कहूँगा कि अब सावधान रहने की ज़रूरत है।

कभी फिल्में समाज की आईना थी। लेकिन आज की फिल्में ख़ुद को आइना में देखें तो पता चलेगा कि उसमें भारत का समाज ही गायब है।

उसी गायब समाज का सिनेमा अब थियेटर और टीवी से निकलकर मोबाइल में घुस आया है…जिसमें कोई सेंसर बोर्ड नहीं है।

यहाँ सब कुछ सर्वसुलभ है। जो वेबसीरिज नई आती है अगले दिन टेलीग्राम पर उपलब्ध हो जाती है। चौकन्ना आपको रहना है !

इसके पहले कि आपके बच्चे  ‘सेक्रेड गेम्स’ में गणेश गायतोंडे को अपनी माँ की हत्या करते देखें ।। या मिर्ज़ापुर” में मुन्ना बाबू की माँ को बेटे के लिए सेक्स का जुगाड़ करता देखें।

उनको “बाइसाइकिल थिव्स” और “चिल्ड्रेन्स ऑफ हैवन” जैसी सैकड़ों बेहतरिन फ़िल्में दिखा देनी  चाहिये..ताकि उनमें थोड़ी सी जागरूकता बनीं रहे।

चिल्ड्रेन्स ऑफ हैवन

ऐसा हो सकता है…

ऐसा नहीं है कि हमारे पास अच्छे अभिनेता,निर्देशक,
लेखक नही हैं। एक से बढ़कर एक लोग अभी भी पड़े हैं..बच्चों की तमाम अच्छी फ़िल्में यहाँ भी बनीं हैं, बन भी रहीं हैं..लेकिन उनका अनुपात कम है। उनकी पहुँच,उनकी चर्चा आपके टीवी और मोबाइल स्क्रीन तक नहीं है।

आज ज़रूरत है,इसको बढ़ावा देने की.. सिनेमा में बच्चे और परिवार दोनों को शामिल करने की।

ये जानने की कि इस ऑनलाइन दौर में शिक्षित करने के माध्यम अब तेजी से बदलेंगे। अब साहित्य और नाटक,संगीत की सार्थकता और तेजी से बढ़ेगी।

सिनेमा इन सबका खूबसूरत समुच्चय था और आगे भी रहेगा।

ज़रूरत है तो बस आज देश की भावी शिक्षा नीति में एक सलेबस बनाने की..ताकि क्लास टू से लेकर 10+2 तक कुछ ख़ास वेबसीरिज,फ़िल्म और डाक्यूमेंट्री को क्लास वाइज दिखाया जाए।

ताकि आपके बच्चे के बड़े होते-होते इतनें जानकार हो जाएँ कि वो इस मनोरंजन के कचरे में बेहतर की तलाश कर सकें।

अगर ये आज का रचनात्मक संसार थोड़ा सा भी भावी पीढ़ी का ख़याल करते हुए संवेदनशील बनता है…तब शायद हम पहले से ज़्यादा बेहतर समाज बना सकतें हैं!

वरना हिंसा और क्रूरता को देखकर मनोरंजन तो हम कर ही रहें हैं,आगे भी करेंगे…इंतज़ार करिये अगले हफ़्ते फ़िर कुछ रिलीज़ होगा और मेरे मित्र के बच्चे नगवा मोहल्ले में उसे देख रहे होंगे !

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