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“गोरिया के गोरे गोरे गाल, बिहार में बवाल कइले बा.”

बहुते छोटे थे हम, मने एकदम बबुआ टाइप….फोंफी और समपापड़ी के लिये भी रोने लगते थे…फुलौना और पिपीहिरी के लिए नधिया जाते थे.गुरदेल आ लट्टू आ कंचा के लिये तो लगता था की तीसरा विश्व युद्ध हमही लड़ेंगे…
तब लोग मुझे इतना प्यार करते थे कि दो चार थप्पड़ रोज बिना किसी दिक्कत परेशानी के मुझे मिल जता था।
भगवान की बड़ी कृपा थी। दिक्कत में कोई कमी नहीं थी।

उसी टैम भोजपुरी में एक गाना बड़ा हिट हुआ था…
उस समय भोजपुरी का एक हिट गाना साल भर बजता था..क्योंकि इतने गायक नहीं थे..
आज तो सात लाख गायक हैं..और तेरह लाख अभी रियाज मार रहें हैं….जब ये स्टेटस आप पढ़ रहे होंगे तब एक लाख रिकार्डिंग स्टूडियो गाना रिकार्ड करा के बाहर निकल रहे होंगे।
बेचारे इतने आगे हैं कि
अभी लहंगा रिमोट से उठाकर उसी में नमाज पढ़ने लगेंगे…..

लेकिन उस जमाने ऐसा न था…टेक्नोलॉजी का विकास इतनी जोर से नही हुआ था की लहंगा में नमाज पढ़ा जा सके।

ऊँगली पर बड़े गायक गिने जा सकते थे.
एक गाना बजता.
ए दर्जी सी द ना चोलिया हमार
नज़रिया बन्द कइके..”
तो एक साल बजता..

फिर एक गाना आता.
“खाई अपना भतरा के कमाई त लजाईं काहें..”
लो अब इहो चइत से लेके माघ तक सुनाई देता…

तब तक एक और आ जता..
..”बोकवा बोलत नइखे
कतनो देखाई हरी हरी…”

बोकवा डेढ़ दू साल बोलता तब तक एक गायक साहेब और आ जाते..

जब से सिपाही से भइके हवलदार हो
नथुनीये पर गोली मारे संइयां हमार हो

हाय! जा ए सिपाही संइयां दू चार साल लगातार गोली मारते..
तब तक एक गाना अउर आ जाता..

गोरिया के गोरे गोरे गाल
बिहार में बवाल कइले बा”

सिपाही जी गोली मारना छोड़..गोरिया के गाल के पीछे पड़ जाते…

जमाना बीत गया….आज के भोजपुरी गीत सुनने लायक हैं की नहीं इस पर फिर कभी..

लेकिन हाय रे नितीश कुमार जी के बहार.
आज इ जब हम फटउवा देखें हैं तो करेजा में नागिन डांस हो गया है..
किसी जमाने में जो सिपाही संइयां लगातार गोली चलाते थे…
आज उहे गाल छू के देख रहें हैं..की हई रमनथवा दारु पीया है की नहीं….पी लिया है तो कहीं तो बिहार में बवाल तो नहीं हो जायेगा।

सिपाही जी का करें अब..
नितीश चाचा ने अब मुंह सूंघने का ड्यूटी लगा दी है..
आदमी सोचा भी नहीं था की पुलिस है का हाल एक दिन बिहार में कुकुर का हाल हो जायेगा।.
अब त उहो दिन दूर नहीं जब पुलिस भेकेंसी में सबसे देर तक सुंघने वालों को पहले लिया जायेगा….
या चरवाहा प्राथमिक विद्यालय में सूंघना सिखाया जायेगा…
सूंघने में कैरियर साफ साफ़ दिख रहा है मुझे…
कुछ बुरा नहीं…बस डर इस बात का है की भोजपुरी कोई नालायक गायक इ न गा दे की.
रात भर संइयां हमार सूंघत रहेला….
खैर शराब बन्दी सफल हो।

इस कामना के साथ आदरणीय पियक्कड़ों से नम्र निवेदन है कि बिहार में जाएँ आप तो अपने गाल छूवाने और मुंह सुँघवाने की तैयारी से जाएँ।BIHAR SHARAB BANDI,

जनहित में जारी।।

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संगीत का छात्र,कलाकार ! लेकिन साहित्य,दर्शन में गहरी रूचि और सोशल मीडिया के साथ ने कब लेखक बना दिया पता न चला। लिखना मेरे लिए खुद से मिलने की कोशिश भर है। पहला उपन्यास चाँदपुर की चंदा बेस्टसेलर रहा है, जिसे साहित्य अकादमी ने युवा पुरस्कार दिया है। उपन्यास Amazon और flipkart पर उपलब्ध है. फ़िलहाल मुम्बई में फ़िल्मों के लिए लेखन।

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