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 इशरत जिनकी बेटी है..अफज़ल जिनका भाई है..याकूब जिनका बाप है,और कसाब जिनका बेटा है.उनकी भारत माता नहीं हैं.इस पर वो बहस कर रहे हैं जिनकी “सत्ता  बन्दूक की नली से  निकलती है..”जिनके  इतिहास की काली किताबों में लोकतंत्र से व्याभिचार के अनेकों पाठ हैं.वही,जिनके एजेंडे में देश,माँ और राष्ट्र का कोई स्थान नही है. वो आज बहस कर रहे हैं… “ये   भारत माता कैसी है,क्यों है,कौन बोले, क्यों बोले.. और कहाँ बोले..”?

ये वही हैं  जिनको आयातित बाप का तो पता है लेकिन ये सच्चाई स्वीकार करने में हिचक है कि ये इसी धरती माता का अन्न,जल,वायु खा पीकर जी रहे हैं.और मरने के बाद  ये  पाकिस्तान और चीन में नहीं बल्कि
हिन्दुस्तान की इसी धरती माता पर दफनाये और जलाये जायेंगे…..ये वही हैं जिनका आजादी की लड़ाई और देश की रक्षा में कोई बड़ा योगदान नहीं..वो इसी ‘शस्य श्यामलम् मातरम्’ में   याकूब को कन्धा  देने से  से लेकर भारत माता की बर्बादी और टुकड़े टुकड़े करने का का नारा तो दे देतें हैं…
लेकिन भूल जातें हैं कि  जिस अशफाक,भगत और राजगुरु,आजाद  के कारण वो इतनी आजादी में जी रहें हैं. उन्होंने कभी  इसी आजादी के लिये हंसते हंसते  “जय हिन्द..भारत माता की जय….और वन्दे मातरम कहकर अपने प्राण त्याग दिया था.
उसी धरती में जहाँ भारत माता की  रक्षा के लिये हजारों अब्दुल हमीद और लेकर कलाम लेकर  कल तंजीम तक सो गये।
अरे जिनको अपनी सगी माँ से ज्यादा अपने आयातित बाप की फिक्र है उनको तो नहीं…लेकिन एक ख़ास गिरोह को जरूर  पूछना चाहिये..उस अशफाक से.उस अब्दुल हमीद से और उसकलाम से कि ‘मेरी माता कौन है?’
तुष्टिकरण के शिकार होकर महज वोट बैंक बन गये उस ख़ास गिरोह  ने तो सन 1957 में प्रदर्शित हुई महबूब खान द्वारा निर्देशित ‘मदर इंडिया’ भी नहीं देखी होगी..
और ये भी नहीं जानते होंगे की  ये देश की  सबसे लोकप्रिय फिल्मों में से एक है.ऑस्कर के लिये एक वोट से पिछड़ी।
वो फ़िल्म…जहाँ तमाम परेशानियों से संतप्त माता के रूप में राधा का चरित्र किसी नरगिस ने निभाया था.
वही  अद्भुत चरित्र जो  हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक बुनावट में मां का आदर्श स्वरूप है.
  मां की विराटता का द्योतक है, उसके व्यक्तित्व की व्यापकता का सूचक है…अरे अपने ही कौम के फिल्मकार महबूब खान की ये फ़िल्म देखना  तो कभी..और हाँ…वो.. नाम के आगे गांधी लगाने वालों के मानस पुत्रों….आज भारत माता की जय पर बेवजह चिल्ला रहे हो..तुमने  1936 में महात्मा गांधी से नहीं पूछा कि “हे महात्मा आप बनारस में भारत माता मन्दिर का उद्घाटन क्यों कर रहें हैं..’?             क्या जरूरत है इसकी..ये आरएसएस छाप मन्दिर बनवाने की…?हम आज 70-80 साल बाद अपने अस्तित्व की रक्षा में किसी घायल पक्षी की  तरह तड़फड़ा रहे हैं..
मोदी से नफरत ने हमे कहीं का नहीं छोड़ा है…आज हालात ये है की न हमारे पास कोई मुद्दा है न देश सुधार का कोई विजन है..जमीन खिसकती जा रही. हम पगलाये हुये हैं..हमारा सारा फोकस मोदी पर है..कब मोदी पश्चिम की तरफ मुंह करके पिशाब करें और हम उसे मुद्दा बनायें..
आज बारह साल से इसी तरह मुद्दा बनाते बनाते मोदी गुजरात से निकलकर दुनिया में छा गये…और हम जहाँ थे वहां से भी उखड़ते जा रहे।
क्या कारण है कि  इतने बड़े विरोध के बाद इस्लाम के जनक देश अरब का ” द आर्डर आफ अब्दुल्ला” नेहरू इंदिरा को न मिलकर किसी कथित हत्यारे मोदी को मिल रहा है..और वहां लगातार “भारत माता की जय  गूंज” रही है..बुरका पहने आईफोन धारी लड़कियां सेल्फ़ी लेने के लिये मारा मारी कर रही हैं…
और हम यहाँ ओवैसी के बयानों और बाबा रामदेव के जबाबों में उलझे हैं।                                             
आज हम यहाँ  तुष्टि करण में लिप्त कुछ छद्म सेक्युलरों,वामपंथियों..और अन्ना हजारे के मंच पर तिरंगा लहरा भारत माता की जय बोलकर मुख्यमंत्री बने उस एनजीओ बाज के साथ डिसकस कर रहे हैं की भारत माता क्या है..अरे भारत माता सिर्फ आरएसएस बीजेपी की नहीं हैं…
न ही आरएसएस बीजेपी ने ये बयान दिया  की नहीं बोलने वाले का  सर कलम कर दिया जायेगा…
मैं जानता हूँ की मोदी विरोध के लिये तुम्हारे पास मुद्दों का घोर अभाव  है….
जनता तुम्हारी कथित असहिष्णुता के बाद इस भारत माता की जय बोले की नहीं बोले इसमें नहीं उलझेगी..
अपने वाम भाइयों..तथाकथित सेक्युलरों..केजरीवालों और ओवैसियो से कहो की वो अंध विरोध छोड़कर अपने काम को अधिक से अधिक जमीनी स्तर पर रचनात्मक बनायें…
क्योंकि मोदी बारह तेरह साल में वो हाथी हो गये हैं..जहाँ कुत्ते भौंकते रहतें हैं और वो सतत अपने उदेशय की ओर चलता जाता है..
अब ये बौद्धिक विलाप बन्द करो..क्योंकि जितना तुम विलाप करोगे उतना ही लोग भारत माता की जय बोलेंगे…

एक बार गांधी के भारत माता मन्दिर बनारस आवो…उसमें अपने सद्बुद्धि की कामना करो..

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साथ ही अपने पितृ पुरुष नेहरू जी की ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’  पढ़ो और समझो की भारत माता क्या हैं और क्यों बोलना चाहिये…

“कभी कभी जब मैं किसी सभा में पहुंचता तो ‘भारत माता की जय’ के जोरदार नारे से मेरा स्वागत होता. मैं अचानक ही उनसे पूछ बैठता कि आखिरकार इस नारे का मतलब उनके लिए क्या है, वह भारत माता, जिसकी जय का वे नारा लगाते हैं, वह कौन है?                                                                                       
मेरे प्रश्न से वे कुछ विस्मय और कुछ आश्चर्य में पड़ जाते और वे एक-दूसरे का और फिर मेरा मुंह देखने लगते. मैं अपने सवाल को दुहराता रहा. आखिरकार  एक जुझारू दीखता जाट, जो न जाने कितनी पीढ़ियों से धरती से जुड़ा हुआ है, उठ खड़ा हुआ और उसने कहा, यह धरती है, भारत की प्यारी धरती. कौन सी धरती? उनके अपने गांव की धरती का टुकड़ा, या उनके जिले या प्रांत की धरती के सारे टुकड़े, या पूरे भारत की सारी धरती? और इस तरह सवाल-जवाब का सिलसिला तब तक चलता रहता, जब तक उनमें से कोई अधीर होकर मुझसे इसके बारे में बताने को न कहता. मैं उत्तर देने की कोशिश करता.                                               
 ‘भारत वह सब कुछ है जो उन्होंने सोचा है, लेकिन यह इन सबसे कहीं ज्यादा है. भारत के पर्वत और नदियां, जंगल और विस्तृत खेत, जो हमें भोजन देते हैं, सब हमें प्यारे हैं.”
                                                  ।।भारत माता की जय।।

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