एक परिचय की मौत

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साल दो हजार नौ-दस का समय। खेत में बैठकर मेरी आँखें बीएचयू में पढ़ने का ख़्वाब बुन रहीं थीं।

तब ज़िंदगी इतनी ऑनलाइन न थी। यहाँ तक कि परीक्षा के फॉर्म भी हम हाथ से भरके बलिया के नेशनल बुक डिपो में जमा करते थे और प्रवेश पत्र से लेकर काउंसलिंग लेटर तक डाक से प्राप्त होते थे।

मुझे याद है कि ठीक मंगलवार की एक साँझ को पोस्टमैन साहब नें मुझे प्रवेश पत्र सौंपा। अपनी प्यारी पिंकिया का ख़त खोलने में जितनी उमंग मंटुआ को हुई होगी, ठीक उसी उमंग से मैनें प्रवेश पत्र खोल दिया। खोलते ही पता चला कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संगीत एवं मंच कला संकाय में मुझे बीम्यूज की प्रवेश परीक्षा देनी है।

लेकिन ये क्या ? प्रवेश पत्र को देखते ही मन उदास हो गया। माथे पर चिंता की रेखाएँ कत्थक करनें लगीं।आख़िर साइकिल से हाँफता हुआ अपने तबला के उस्ताद कुमार गुरु जी के पास पहुँचा।

गुरु जी नें मेरी हुलिया का भली-भाँति निरीक्षण किया और बहुत उदास होकर कहा कि अतुल बाबू,भोजपुरी गायकों के साथ बजा-बजाकर तुम्हारा हाथ तो पहले से ख़राब हो चुका है। तुम इस ईएचयू, बीएचयू के चक्कर में मत पड़ो। वहाँ बलिया के लड़के बीए-एमए करके तब बीम्यूज करने जातें हैं।

तुमने तो इस साल इंटर पास किया है। ऊपर से तुम्हारा शास्त्र पक्ष बहुत कमज़ोर है और रिजर्वेशन भी नहीं मिलने वाला है। इसलिए बीएचयू का ख़्वाब छोड़ो और तैयारी करो।”

इतना सुनकर मैं टूट सा गया। दो दिन नींद न आई। जीवन उस पेण्डुलम की तरह हो गया जो चौबीस घण्टा डोलता था लेकिन कहीं पहुँचता न था। इधर गॉंव में दौर था जब हर लौंडा बीटेक करके इंजीनियर बनना चाहता था। इधर हम संगीत पढ़ने का फ़ैसला कर चुके थे।

एक तरफ़ पिताश्री से रिश्तेदार कहते थे कि भूमिहार के इकलौता लइका,उहो अपना क्लास के टॉपर। ई नचनिया-बजनिया की पढ़ाई पढ़ेगा ? कुछ नहीं है तो उसके हिस्से चार बीघा खेत है। बेचकर पढ़ा क्यों नहीं देते राई साहेब?

इधर हमारे राई साहेब यानी हमारे बाप कहते कि बीटेक से अच्छा एयरफोर्स नेवी है,तू एयरफोर्स की तैयारी कर बबुआ। देख रामपलटा के आठ लाख दहेज मिल रहा है। एक्के साल में सब ग़रीबी दूर हो जाएगा।

इस माहौल में संगीत की परीक्षा कैसे दी जाए ? इस पर विचार करना ही एक परीक्षा से गुजरना था।

साँप-छछूंदर वाले हालात करीब आ गए। आख़िरकार जब परीक्षा में चार दिन बचे तो मैनें तय कर लिया कि फेल होंगे या पास होंगे,परीक्षा तो देंगे, और मन से देंगे।

फिर तो हारे को हरिनाम!

बलिया विजय सिनेमा के आगे हनुमान जी का एक मंदिर है। वहीं जाकर उनको प्रणाम किया। और सीधे एक किताब की दुकान पर पहुँचा।

किताब वाला माथे पर गमछा रखकर पूछा, “का चाहीं हो ?”

हममें पूछा, “भइया,गाना-बजाना का कोई किताब है? हमको बेचू का परीक्षा देना है ?”

दुकानदार नें कहा, “हं भाई,बेचू तो हम भी गए थे अपनी साली का ऑपरेशन करवाने.. ई लो।”

एक झटके में उस साली भक्त किताब वाले नें तीस दिन में हारमोनियम सीखे और पन्द्रह दिन में गायकी के उस्ताद बनें टाइप किताबें सामनें रख दीं।

मेरा दिल टूटकर दुक्कड़ हो गया। मैनें उसको फिर समझाया कि हे अपनी साली के जीजा! थियरी के किताब चाहीं हमरा के मरदे…उस्ताद बने वाला ना।”

दुकानदार था कलाकार। एक झटके में समझ गया। उसनें झट से एक छोटी सी किताब रख दी।

“लो बयालिस रूपया…”

मैनें देखा,पॉकेट में ले-देकर पैंतीस रुपये ही बचे हैं। सात रुपये कम हैं। कल से क्या होगा भगवान ही मालिक हैं। लेकिन परीक्षा देनीं ही है। कम से कम उस माँ के लिए जिसने पाँच सौ रुपये उधार लेकर ज़बरदस्ती बीएचयू का फॉर्म भरवाया है।

मैनें कहा, “भैया मेरे पास पैंतीस रुपये हैं। कल आकर ये किताब ले लूँगा।

दुकानदार को मेरी दारुण अवस्था देखकर दया आई। उसने कहा, “दस मिनट मेरा बर्बाद किये जावो। सात रुपये बाद में दे देना और कभी बेएचयू में साली का इलाज़ करवाने आया तो मेरी पर्ची लगा देना।”

मैनें कहा, “ठीक है भइया।”

किताब मेरे हाथ में आ गई।

मैं किताब लेकर खिल गया। बहुत ही साधारण से पन्नो में सजी उस किताब को छूते ही ऐसा लगा जैसे कोई जादू का एक पिटारा खुल गया हो। एक झटके में मेरी उदास आँखों में चमक बिखर गई।

और उसी दुकान पर खड़े-खड़े मैनें जीवन में पहली बार ताली,खाली, पेशकार, उठान,टुकड़ा,गत,फर्द, चक्करदार,
आड़-कुआड़ और बिआड़ के साथ दिल्ली,लखनऊ,पंजाब,
अजराड़ा,बनारस घराना औऱ फरुखाबाद घराना जैसे शब्द पढ़े।

मैनें देखा किताब के पीछे लेखक की तस्वीर है। उस तस्वीर को प्रणाम किया और मन ही मन कहा कि हे गुरु जी, अब परीक्षा में आप ही पार-घाट आप लगाएंगे। आज से दिन-रात पढूंगा।

आख़िरकार दिन-रात की लगातार मेहनत के बाद परीक्षा हो गई। दो महीने बाद रिज़ल्ट आया तो मैं पास हो गया। घर पर किसी को विश्वास नहीं हुआ। तीन महीने बाद जैसे-तैसे एडमिशन भी हो गया। और सारी दुनिया बलिया से उजड़कर बनारस के अस्सी घाट पर बस गई। फिर तो आगे की कहानी फिर कभी…

लेकिन आज आपको बताऊँ कि उस साधारण सी किताब के पीछे जिस एक शख्स की तस्वीर थी। वो भारतीय संगीत जगत की सर्वाधिक लोकप्रिय तस्वीर थी। वो किताब हिन्दुस्तानी संगीत की सबसे लोकप्रिय किताब थी।

वो किताब थी, जो हमें राग और ताल के शास्त्र पक्ष से प्रारंभिक परिचय कराती थी। उसके लेखक थे, जिनका नाम गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव था।

जिनका संगीत में आज भी उतना ही महत्व है जितना कि फिजिक्स में एचसी वर्मा का है।

लेकिन क्या दुःखद हालात हैं कि इसी कोरोना काल में सोलह अगस्त के आस-पास गिरीश जी चल बसे और प्रयागराज को छोड़ दिया जाए तो लगभग समूचा संगीत जगत खामोश रहा। कहीं दूसरे शहरों में एक अदद समाचार न आया। किसी ब्लॉग और न्यूज़ पोर्टल नें खबर न लिखी गई। कहीं कोई वेबिनार औऱ गोष्ठी न हो सकी।

आखिर क्यों ?

ऐसा तो नहीं था कि श्रीवास्तव जी बस इलाहाबाद या कुमाऊं विश्वविद्यालय के आचार्य थे। या उन्होंने जर्मनी,जापान, अमरीका में बतौर विजिटिंग प्रोफेसर पढ़ाया था ?

हमें तो उनको याद करना था। क्योंकि वो हमारे जैसे हज़ारों छात्रों के पहले गुरु थे,जिनके पॉकेट में पैतीस रुपये होते थे लेकिन उनकी आँखें संगीत पढ़ने का ख़्वाब देख सकतीं थीं।

आचार्य गिरीश चाहते तो उसी बयालिस रुपये की किताब को तीन सौ की भी बेच सकते थे। लेकिन आज जब ख़ुद मेरी किताब प्रकाशित होने जा रही है,तब मुझे लग रहा है कि उनको किताब लिखते समय मेरे जैसे तमाम विद्यार्थियों का ख़्याल ज़रूर आया होगा। वरना हम जैसे न जाने कितने लोग बलिया ही रह जाते बनारस न देख पाते।

आज मुझे पता नहीं कि इन दस-बीस सालों में संगीत के शास्त्र पक्ष में नया क्या हुआ । लेकिन मुझे ये पता है कि हमनें अपनी विरासतों का ह्रास ही किया है।

आज भी हम पलुस्कर जी औऱ भातखण्डे जी के भरोसे हैं
आज भी प्रोफ़ेसर प्रेमलता शर्मा,ठाकुर जयदेव सिंह और पंडित ओंकारनाथ ठाकुर हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं।और हम न आचार्य गिरीश पैदा कर रहे हैं,न ही उन्हें उचित सम्मान दे रहें हैं।

सवाल है कि क्या सांगीतिक समस्याएँ ख़तम हो गई हैं ?

आज तो संगीत के विद्यार्थियों के सामनें सबसे बड़ी समस्या यही है कि संगीत की ज़्यादातर किताबें तथ्यों में कन्फ्यूजन पैदा करतीं है।

उदाहरण देखिये..

दुनिया जानती है कि तबला के आविष्कारक अमीर खुसरो हैं। लेकिन संगीत की चार किताबे उठाइए तो कोई दावा नहीं करता कि अमीर ख़ुसरो ही तबला के आविष्कारक हैं। खुद श्रीवास्तव जी भी दावा नही करते बल्कि सम्भावना प्रगट करतें है।

इसके अलावा “तबला वादन परम्परा घराने और शैलियाँ” लिखनें वाली प्रख्यात अभिनेता सौरभ शुक्ला की माँ विदुषी योगमाया शुक्ल हों या लक्ष्मी नारायण गर्ग। कोई दावा नहीं करता। यहाँ तक कि पंडित छोटे लाल मिश्र नें अपनी किताब “ताल प्रबंध” में खुसरो के आविष्कारक होने की मान्यता पर बात ही नही की है।

वो सीधे नाट्यशास्त्र में चले गए हैं। और एकदा स्वाति मुनि….वाले श्लोक का हवाला देकर उन्होंने स्वाति मुनि को वाद्यों का जनक बता दिया है।”

इस भ्रमात्मक और त्रुटिपूर्ण विषय पर एक रिसर्च होना था या नहीं ?

लेकिन कैसे होगा जब पीएचडी करने वाले ज़्यादातर शोधार्थी गाइड की सब्जियाँ ढोने में और उनके बच्चों को स्कूल छोड़ने से लेकर उनके मामा को स्टेशन छोड़ने में व्यस्त रहेंगे।

आज इस पोस्ट के बहाने मैं अपने संगीत के छात्र मित्रों से भी कहना चाहूँगा कि ये पोस्ट मैंने आपके लिए ही लिखी है। आप ख़ूब रियाज़ करिये लेकिन संगीत के शास्त्र पक्ष को भी पढ़िए।

आपको आगे जाना है और एक प्रबुद्ध कलाकार के रूप में स्थापित होना है,तो एक शौक ये भी पाल लीजिये।

मैंने बीए, एमए और नेट कर लिया लेकिन कुछ सालों तक बहुत गलतियाँ की है। उन्हीं गलतियों में एक ग़लती ये है कि पढ़ाई के दौरान रटने की प्रवृत्ति का बढ़ना और सांगीतिक चिंतन-मनन का अभाव रहना।

बस आपसे ये गलतियाँ न हो। मुझे लगता है कि गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव की सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी।

संगीत रत्नाकर में आचार्य शारंगदेव नें लय की परिभाषा देते हुए कहा है, क्रियानान्तर विश्रांति लयः

“क्रिया के बाद जो विश्रांति होती है वो लय है।”

कलाकार मित्रों, अब परिभाषा अपडेट करनें का समय है।

आज क्रियात्मक पक्ष के अध्ययन के बाद जो विश्रांति होती है उस अंतराल में शास्त्र पक्ष की तरफ़ ध्यान देना ही लय में होना है।

सादर

( उन कलाकार मित्रों के नाम,जो कहते थे कि संगीत पर क्यों नहीं लिखते… )

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