कल ड्यूड सन्नू ने अपनी ड्यूडनी सोना से परम रोमांटिकासन कहा..”सोना डार्लिंग कल independence day है” सोना जी ने लालकिले की तरह मुंह बनाकर कहा.”तो मेको क्या…मैं क्या करूँ.?” अरे कल छुट्टी है.चलो आईपी में मूवी चलते हैं.मैकडोनाल्ड में बर्गर खाएंगे.आइसक्रीम भी.तेरे लिए जरूरी सा एक हरे रंग दुपट्टा भी खरीद दूंगा..सावन चल रहा न डार्लिंग.सीजन आफ लव.”हाय ! यहाँ बैकग्राउंड में अरिजीत सिंह रोतें हैं..”मुहब्बत बरसा देना तू सावन आया है”
और ड्यूडनी सोना अपना सोने की तरह भाव बढ़ाकर कहती हैं.”तो तुम पन्द्रह अगस्त कि कसम खावो की मूवी देखते वक्त सिर्फ मूवी ही देखोगे और कुछ इधर उधर नई.” ड्यूड सन्नू का मुंह शोक मना रहे तिरंगे झंडे की तरह झुक गया..”डार्लिंग तुमको याद है..हम 26 जनवरी को ही मूवी देखने गए थे…अब इतने दिन बाद.और.कुछ…?
यहां ड्यूडनी जी मुंह फेरकर अपनें पेंच-ओ-खम को संवारती हैं.”तुझ पर भरोसा नहीं.जाते हो फ़िल्म देखने और इमरान हाशमी को देखते ही मुझे फ़िल्म मेकिंग सिखाने लगते हो.”ड्यूड सन्नू रोंवा गिराकर गिड़गिड़ासन मुद्रा में आ गया….
“डार्लिंग ट्रस्ट मी…तुमको पता है मेरे पास चार-चार करेक्टर सार्टिफिकेट हैं.थोड़ा तो विश्वास करो.आते वक्त लौंगलता भी खिलाऊँगा..और गोलगप्पा भी.गोलगप्पा का नाम सुनकर…ड्यूडनी जी का मुंह कुछ द्रवित सा हुआ और हृदय भी.
“अच्छा ठीक है चलो…पहले तो अपने चार करेक्टर सार्टिफिकेट को किसी भूजा वाले को बेच दो..और मेरा 247 का रिचार्ज करवा दो.ड्यूड जी ने इस सहमति पत्र पर लाल कलम से हस्ताक्षर किया.
फेसबुक खोला तो देख रहा हूँ…ड्यूड और ड्यूडनी आज फ़िल्म देख आये….फ़िल्म मेकिंग में लव मेकिंग भी सिख आये..मैकडोनाल्ड में बर्गर भी खा लिए..ड्यूडनी जी ने मात्र सताइस गोलगप्पा खाया…और लम्बी डकार लेकर फेसबुक अपडेट किया..”हैपी इंडिपेंडेंस डे….”.
और यहाँ देख रहा की राजू,पंकज,भोला,सन्नू,मिंकू,पिंकू,चिंकू कमेंट चेप रहें हैं…..लाइक कर रहें हैं.”फ़िल्म कैसी लगी ड्यूड….”? थोड़ा नीचे आया तो देख रहा कुछ लोग तिरंगा झण्डा से प्रोफाइल रंगकर जश्न मना लिए..कुछ लोग तरह तरह के फिलिंग के साथ स्टेटस अपडेट कर चुके हैं..लालकिले की प्राचीर से आदरणीय पीएम बोल चुके हैं.अभी-अभी देख रहा कुछ सनातन रुदन में रत रहने वाले बुद्धिजीवीयो ने फुटपाथ पर भीख मांग रही बच्ची का फ़ोटो शेयर किया …और एसी का कूलिंग बढ़ाकर काफी पीते हुए स्टेट्स टाइप किया.
“सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नासाज है
दिल पर रखकर हाथ कहियेे देश क्या आजाद है.?“
अब रास्ते में कूड़ा फेंकने वाले..चलते-चलते सड़क पर थूकने वाले…ट्रैफिक रुल तोड़ने वाले…..बेवजह हार्न बजाने वाले.घूस लेने वाले और मुफ़्त के तनखाह पाते हुए किराया को लेकर किसी गरीब बुजुर्ग रिक्शे वाले से अठाइस मिनट जिरह कर उसे अर्थशास्त्र और क्रोनी कैपिटलिज्म समझाने वाले.रेलवे स्टेशन की खुली दीवाल पर मूतने वाले.और पन्द्रह अगस्त को मात्र छुट्टी मानने वालों ने हरहराकर लाइक बटन दबाया और कमेंट चेंपा.
“एकदम सही कहा आपने.अद्भुत पंक्ति..खाक देश आजाद है….बिलकुल नहीं…एक साल में कुछ नहीं किया मोदी ने…सब भाषण.सब…अभियान फेल इस देश का कुछ नहीं हो सकता..”खूब बहस हो रही है…..देश की आजादी का ये बहुरंगीय जश्न देखकर रुका ही था की देख रहा.एक परम बुद्धिजीवी ने अपनी “मास्टर आफ पेसिमिज्म” की डिग्री निकाली…और तमाम कमियों को गिनाने लगे…”ये नहीं हुआ, वो नहीं हुआ…यहाँ गड़बड़ है..”….वहां कुछ नहीं हो रहा..देश डूब रहा.
ओह! अब माथा दुःख रहा मेरा…रह-रह के बुद्धिजीवीयों पर तरस आता है….ड्यूड सन्नू और ड्यूडनी सोना की ख़ुशी भी समझ में आती है.लाइक कमेंट करने वालो के लिए बुद्धि-शुद्धि यज्ञ करने का भी मन कर रहा.सोच रहा दोष किसका है…..? उस गांधी भगत आजाद बिस्मिल का?…जो न होते तो आज हम न गीत गाते ,न झण्डा बनाते न ही फेसबुक अपडेट में देश को कोसते.
न ही आज ड्यूड सन्नू और ड्यूडनी सोना फ़िल्म देखकर लव मेकिंग सीखते। जब ड्यूड और ड्यूडनी को पता चलता कि आजादी की लड़ाई में उन्हीं के उम्र के कई किशोरों ने अपनी प्राणों की आहुति देकर माँ भारती के आन बान शान को झुकने न दिया था.
वो टिकट कि खिड़की से लौट आते जब पता चलता कि खुदीराम बोस देश के लिए 18 साल की उम्र में ही फांसी चढ़ गए…रेल पटरी से छेड़छाड़ करके अंग्रेजों के दांत खट्टे करने वाले हेमू कालाणी को 19 वर्ष की उम्र में सजा हुई..
ये जानते तो हाथ से काफी का कप न उठता.तब खामोश हो जाते दो मिनट जब पता चलता कि भगत सिंह के साथी बटुकेश्वर दत्त 8 अगस्त 1929 को असेम्बली में बम फेकने के कारण फांसी में मौत को गले लगा लिए था तब वो महज 18 साल के थे.
वो बर्गर और मन्चूरियन भी हाथ से छूट जाता.जब पता चलता कि देश के लिए मरते वक्त बंगाल के बोगरा जिले में कक्षा 9 में पढ़ने वाले प्रफुल्ल चाकी.

खुदीराम बोस के साथ मुजफ्फरपुर के मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड की हत्या की योजना में शामिल थे.उस क्रांतिकारी यतीन्द्र नाथ दास को याद करते ही सारा गुलगप्पा सारा आइसक्रीम धरा का धरा रह जाता जब पता चलता कि उनको मात्र

17 साल की उम्र में असहयोग आंदोलन में कूदकर लाहौर जेल में बन्द होना पड़ा..और 13 सितम्बर 1929 को उस लड़के ने भारतीय कैदियों से समान व्यवहार को लेकर भूख हड़ताल की और कुछ दिन बाद उनकी मौत हो गयी.भूख से मौत ड्यूड और ड्यूडनी जी को आज कुछ खाने न देती।
लेकिन आज 68 साल बाद ये स्वतंत्रता दिवस महज एक दिन बनकर रह गया है.कुछ लोग छुट्टी मना आतें हैं.कुछ देश गर्त में जा रहा इसकी चिंता में सो जातें हैं…कुछ मूवी देख आते हैं.और बचे खुचे सुबह अपने अपने काम में चले जातें हैं.
कितना अच्छा होता न हम आज फेसबुक में भीख माँग रही बच्ची को कुछ कपड़े मिठाई.कॉपी किताब दे आते. सरकार को न कोसकर ये संकल्प लेते की हम सार्वजनिक स्थलो पर कभी गन्दगी नहीं करेंगे.ट्रैफिक रूल फॉलो करेंगे..बेवजह हार्न नहि बजायेंगे.देश गर्त में जा रहा इसका रोना छोड़कर कहीं एक पेड़ लगा आयेंगे.
लेकिन हम नहीं सुधरेंगे और देश को सुधारने की चिंता में मरे जा रहे हैं.अरे रुदन करने से पहले ये भी तो सोचना चाहिए कि हमने देश के लिए क्या किया…क्या बोया हमने जो काटना चाहतें हैं.मन सोचकर बेचैन सा होता है.की हम भी “हैपी इंडिपेंडेंस डे” कहकर अपनी इति श्री कर लें.या ये संकल्प लें की कुछ भी करेंगे जो देश हित में होगा.
पता न क्यों इस बेचैनी में कुंवर बेचैन साहब याद आ रहें हैं…
“बोया न कुछ भी फ़सल ,मगर ढूँढते हैं लोग
कैसा मज़ाक चल रहा है क्यारियों के साथ
सेहत हमारी ठीक रहे भी तो किस तरह
आते हैं ख़ुद हक़ीम ही बीमारियों के साथ।











