कवि चिंगारी की कविता और पेट्रोल !

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आज बड़े दिनों बाद चाँदपुर के परिचित कवि डॉक्टर अलगू आतिश चिंगारी उर्फ़ लुकारी जी दिख गए। कंधे उनके वैक्सीन लगवाने से नहीं बल्कि कविता के बिम्बो के बोझ से दबे हूए थे। चाल में पहलें वाली वो छंदबद्ध नज़ाकत न थी। चेहरे पर हमेशा मौजूद रहने वाला वो रीतिकालीन नूर पसीने-पसीने होकर वीरगाथा काल में परिवर्तित हो रहा था।

दूर से देखने पर मालूम पड़ता था कि वो किसी काव्य पाठ से पैदल ही चले आ रहें हैं। या फिर अपने आलू के खेत से आलू कोड़कर अभी-अभी लौटे हैं। नजदीक आते ही मेरा शक यकीन में तब्दील हो गया। आते ही “जै राम जी” की हुआ। चिंगारी जी आलू के भाव की तरह धड़ाम से टेबल पर गिर गए और बड़े ही नाख़ुश मिज़ाज में बोले,”जानते हो कल रात क्या हुआ ?”

“जी,क्या हुआ ?”

“कल रात कवि सम्मेलन के आयोजको नें पेट्रोल का पैसा न दिया।”

इतना कहते ही उनके चेहरा गैस सिलेंडर की तरह लाल हो गया..वो झट से बोले..

“अब तुम बताओ,क्या इस देश का एक युवा कवि खून जलाकर मंचों पर काव्य पाठ करने जाएगा ? किसी कवि को लाखों रुपये दिए जा रहें हैं। हवाई जहाज-हेलीकॉप्टर भेजा जा रहा है। पाँच सितारा होटल में लग्ज़री सुइट दी जा रही है। उसी मंच पर एक दूसरे कवि को दहेज में मिली मोटरसाइकिल में तेल भरवाने के पैसे नहीं हैं इनके पास ? यही लोग बात करते हैं,सामाजिक न्याय और समानता की ? एसे लोग जिनकी प्रवृत्ति ही बेईमान है..!”

मैं तो चिंगारी जी के इस गुस्से पर आश्चर्यचकित था। मुझे क्या पता कैसा कवि सम्मेलन..चाँदपुर में तो आजकल जूनियर लौंडे यूपी बोर्ड के एग्जाम की तैयारी कर रहें हैं और सीनियर लौंडे ग्राम परधानी की। बाकी बचे होली में भइया के साली के आने का इंतज़ार कर रहें हैं…लेकिन अपने चिंगारी जी थे कि झाँझा मेल की तरह बोले ही जा रहे थे।

“तुम तो सुने हो न ,क्या मेरी कविता की धार किसी साहित्य भूषण की कविता से कम पतली है ? क्या नही लिखा है मैनें। क्या उनकी तरह मैंने हुस्न,तिज़ारत,अदा,मासूका और इश्क पर सस्ती कविताएँ की हैं ? देखा न तुमने पिछले साल ? कैसे टाउन हॉल की कविता में एक साहित्य भूषण को मैनें सबके सामने पानी-पानी कर दिया था।!”

इतना सुनते ही मैं हिंदी की क्लास में बैठे किसी लास्टबेंचर जैसा सर खुजाने लगा। फिर भी सांत्वना देने के लिए कह दिया, ” बात तो आपकी सही है। पेट्रोल का पैसा तो देना ही चाहिए था। कविता पेट्रोल से भले न लिखी जाती हो लेकिन कवि सम्मेलन तक कविता को पहुंचाने के लिए पेट्रोल ज़रूरी है।”

लेकिन चिंगारी जी को मेरी ये सांत्वना रास न आई। इस बार इन्होंने अपना सर दिल्ली की तरफ़ घुमा दिया और बड़े ही तेज़ अंदाज में बोला।

“जानते हो हम जैसे कवियो की छंदबद्ध कविताओं को हिंदी की मुख्यधारा के खाए पीए अघाए कवि-आलोचक कविता नहीं मानते हैं। दूसरे अब ये बेईमान आयोजक। किसी को काजू नमकीन और स्कॉच पीने के पैसे और किसी ग़रीब कवि को पेट्रोल के पैसे भी नहीं ?

चिंगारी जी का गुस्से को देखकर आस-पास के दो-चार और साहित्य प्रेमी लोग इकठ्ठा हो गए। सबनें उनके दुःख से सहानुभूति प्रगट की। ऐसा लगा कि चाँदपुर चट्टी पर आज मजमा ही जम जाएगा। लेकिन किसानों की समस्या की तरह किसी के पास इस पेट्रोल वाली समस्या का समाधान नज़र नही आया।

देखते ही देखते चिंगारी जी अपनी कविता की फ़सल के कौड़ी के मोल बिक जाने से आहत हो गए।

आहत होना स्वभाविक था। जिस समय में एक कवि की कविता पेट्रोल से ज्यादा सस्ती हो जाए..उस समय पर आहत न हुआ जाए तो क्या हुआ जाए ? अचानक मोहल्ले के निवासी और हिंदी के राष्ट्रीय आलोचक श्री जगतनारायण “ज़ख्मी” जी नें मोर्चा संभाल लिया।

“देखो चिंगारी,गुस्सा थूक दो। और अपना सॉफ्टवेयर अपडेट करवा लो। अब वो जमाना गया जब कवि बस कविता कहकर चमक जाता था। आजकल कविता से पहले अपना फेस चमकाना पड़ता है। और फेस आजकल क्रीम-पाऊडर लगाकर नहीं चमकता। फेस को चमकाने के लिए फेसबुक पर चमकना ज़रूरी है।

तुम ठहरे आकाशवाणी के कवि। आज के कवि को देखो वो इंस्टाग्राम पर लाइव कविता पढ़ता है,ट्विटर पर अपनी कविता को किसी ब्लू टिक धारी हैंडल से रिट्वीट करवाता है। अपनी बेहतरीन पंक्तियों का टिकटाक वीडियो बनवाता है। तब जाकर सम्मलेन में मजमा जमा पाता है।”

ज़ख्मी जी के पास ही बैठे मोहल्ले के एक बरिष्ठ युवा प्रेमी श्री प्रेम कुमार “घायल” नें इस बात से मूड़ी हिलाकर सहमति जताई।

“मैं तो न जाने कबसे कह रहा हूँ। कहीं से किसी कविता पर हजार पाँच सौ लाइक्स का जुगाड़ कर लीजिये। फिर देखिए पेट्रोल की झंझट ही न रहेगी। एक हफ्ते में हवाई जहाज से काव्य पाठ करने नही गए तो कहना। “

चिंगारी जी भड़के,”ज़ख्मी जी आप अपनी आलोचना को अपनी पीछे वाली जेब मे रखें। किसी महंगे काव्य संग्रह की सस्ती आलोचना के काम आएगी। कवि अपने समय का विद्रोही होता है। पेट्रोल का पैसा न मिला तो क्या हुआ मेरी कविता की आग कभी न कम हुई,न होगी…हम आलू कोड़कर चीना बो लेंगे लेकिन अपनी कविताओं की सोशल मीडिया पर मजलिस नहीं लगाएंगे। “

इतना कहकर चिंगारी जी उठे और बड़े ही भारी मन से घर की तरफ़ प्रस्थान किये।

आज एक हफ्ते बाद मैं मोबाइल खोलते ही देख रहा फेसबुक नोटिफिकेशन दिखा रहा है।

“अलगू आतिश चिंगारी सेंट् यू फ्रेंड रिक्वेस्ट।”

मैं मित्रता निवेदन स्वीकार करता हूँ..

चिंगारी जी नें मैसेज में सवाल पूछा है…

“हे बालक मित्रता निवेदन स्वीकार करने के लिए आभार किंतु मुझे प्रमोट करो… “

मैनें इधर से कहा है, “सर आपकी कविता समझ न आ रही,अपने वाल पर आपकी तारीफ़ में कैसे क्या लिखूं..कैसे कहूँ कि आप हमारे समय के सबसे ज़रूरी कवि हैं…सबसे कालजयी…!

चिंगारी जी नें हास्य वाला दो सिम्बल बनाकर तत्काल भेजा है। और बोला है…,”बेवकूफ हो क्या एकदम ? जो समझ में आ जाए वो कविता कैसी बुड़बक ?”

मैं निरुत्तर हूँ.।।

“चिंगारी जी की बात मेरी समझ में आ गई है और उनकी कविता भी। “

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