छोटे शहरों की स्मृतियाँ ही हमारी संचित निधियां हैं।

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पंजाब में सिक्ख भाई सरदार कहे जाते होंगे लेकिन अपने रज़ा बनारस में जादो जी लोग सरदार कहे जातें हैं। क्यों कहे जाते हैं ? इस परम्परा के पीछे जाएंगे तो आपको मुगलकालीन काशी के इतिहास को खंगालना पड़ेगा। और तब पता चलेगा कि आज दूध,बाल्टी और गाय-भैंस नेतागिरि के बीच जीने वाले यादो जी लोगों नें उस ज़माने में बाबा विश्वनाथ की मुगलों से रक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी थी।

कालांतर में इस वीरता को काशी के लोकमानस नें अपने हृदय में बसा लिया और सभी यादो जी लोगों को “सरदार”कहकर संबोधित किया।

ये परम्परा आज तक चली आ रही है।

बस इसी पारम्परिक नियम के हिसाब से बनारस के अति प्राचीन मोहल्ले ‘पक्का महाल’ में मेरे एक मकान मालिक भी सरदार हुआ करते थे।

कहने को तो वो मकान मालिक थे लेकिन घर में किसी नौकर से ज़्यादा मेहनत करते थे। उम्र पैंतालीस होने वाली थी लेकिन सीने में अभी भी इक्कीस साल वाला जवां दिल धुकधुका रहा था।

अधिकारिक रूप से एक लव मैरिज कर चुके थे और आगे मैरिज तो नहीं लेकिन लव करनें में उन्हें कोई आपत्ति न थी।

बस कहानी शुरू होती है,जनवरी दो हजार तेरह से। कड़ाके की ठंडी पड़ रही थी और मैं यानी अतुल कुमार राय एक अदद कमरे की तलाश में घाट किनारे बसे पुराने मोहल्ले की गलियों की खाक छान रहा था।

कमरा लेने की कोई ख़ास वजह न थी। बस ये था कि बीए के बाद एमए में एडमिशन न हो पाया था और ऊपर से भोजपुरी के कुछ गायकों,कुछ नालायकों से मन ऊबकर आध्यात्मिक हो रहा था। और ये तय कर रहा था कि यार सब कुछ करना है लेकिन इनके साथ अब नहीं रहना है।

फिर क्या था।

मैदागिन स्थित एक प्राइवेट स्कूल में पार्ट टाइम टीचर बन गया और शाम को गंगा सेवा निधि द्वारा आयोजित गंगा आरती यानी दशाश्वमेध घाट वाली आरती में तबला संगति करनें लगा।

जीवन ठोक-बजाकर ठीक-ठाक कटनें लगा। मेरे पास पूरा समय होता। स्कूल में दो घण्टे के दो सौ रुपया मिलते और आरती में आधे घण्टे के लगभग पचहत्तर रुपये। कभी कोई विदेशी तबला देखकर “वाओ..अमेजिंग” कहकर सौ-दो सौ दे जाता। बाकी समय खाली था।

मैं जान गया था कि स्कूल आर्थिक हालात के लिए ज़रूरी है और आरती मानसिक हालात के लिए। आरती में पैसा महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण ये है कि शाम का समय जो बनारस में उच्चस्तरीय आवारागर्दी के लिए आदर्श माना जाता है,उस समय को मैं एक आध्यात्मिक आभामंडल में बिता सकता हूँ।

बस इन्हीं चंद अरमानो को अपने न जाने कितने इंच के सीने में समेटे कमरा खोजना शुरू किया।

लेकिन जो मकान मालिक मुझे देखता भड़क जाता। कहीं मेरी जेब को कमरा पसंद न आता तो कहीं कमरे वाले को मेरी शक्ल पसंद नही आती।

लेकिन बड़ी साधना और मनौती के बाद एक सरदार जी के यहाँ सस्ता कमरा पसन्द आ गया।

मैं पसंद आया कि नहीं इसके लिए उन्होंने पहली मुलाकात में ही मेरे हेल्थ का सूक्ष्म निरीक्षण किया और यूपीएससी के इंटरव्यू से ज़्यादा कठिन कुछ सवाल पूछे,जो इस प्रकार से थे ?

“इतने दुबले क्यों हो ? बूटी नहीं छानते हो न ?”

“नही अंकल जी,हम तो आज तक पान भी नहीं खाए।”

“आधी रात को उठकर पें-पां तो नहीं करोगे न ?”

चूंकि इस सवाल का प्रत्यक्ष सम्बंध मेरी तथाकथित संगीत साधना से था इसलिए मैंनें दिल पर मिर्जापुर वाला पत्थर रखकर बोलने की जगह सर हिलाना उचित समझा। जिसे उन्होंने समझ लिया औऱ आगे पूछा..

“गर्मी में कूलर नहीं रखोगे न?”

“नहीं अंकल जी,रात को छत पर चटाई बिछाकर सो जाएंगे”

“शाबाश! रूम पर लड़की नहीं लावोगे न ?”

“अंकल जी मेरी शकल देख रहें हैं न ? मुझ पर विश्वास नहीं तो इस शक्ल पर विश्वास करिये। क्या उम्मीद है आपको कि मुझसे कोई लड़की पट जाएगी ?”

वो हँसे और लगातार हँसे फिर इस सदी का सबसे महत्वपूर्ण सवाल पूछा,”कौन जात हो ?”

मैनें कहा, “जी मैं भूमिहार हूँ,वत्सगोत्रीय ।”

लीजिये भूमिहार सुनते ही सरदार जी के कान खड़े हो गए। “

“ना, ना,एक तो बलिया ऊपर से भूमिहार..ई न होगा.. ए मास्टर दूसरा किराएदार लावो जी। हम भूमिहारों को कमरा नहीं देते।”

मेरे बगल में खड़े दलाल नें पैरवी करते हुए सरदार जी को बताया, अरे! सरदार, ये उसमें का भूमिहार नहीं है,बड़ा शरीफ भूमिहार है। बात मानो।

मकान मालिक हँसे, “बुजरो के चूतिया बनावत हवा,भूमिहार कबो शरीफ़ होला ?”

बहरहाल,बड़ी माथाफोड़ाई के बाद उस कमरे में में मेरा प्रवेश हुआ।

कमरे में मेरा हाल वही था जो गाँव से आए औसत विद्यार्थियों का होता है। जहां विद्यार्थी दिन भर ये डिसाइड नहीं कर पाता कि दीवाल में खूँटी कहाँ ठोकनी है और बिस्तर कहाँ लगाना है। अगरबत्ती जलाते समय दुर्गा चालीसा पढ़ें या हनुमान चालीसा ?

कभी न फॉलो किए जानें वाला टाइम टेबल दरवाजे पर चिपकाना है या खिड़की पर!

लेकिन समय के साथ सब बदलता गया। दिन भर स्कूल। शाम को आरती। बचे समय में शास्त्रीय संगीत के कंसर्ट और घाटों पर सुबह-शाम की घुमक्कड़ी।

लेकिन आप तो जानते हैं कि हर कहानी में एक लंका काण्ड होता है। मेरे वाली कहानी में काण्ड शुरू हुआ और उस लंका काण्ड में डाइरेक्ट एक खूबसूरत सी पूतना जी की एंट्री हुई। पूतना जी गोदौलिया में एक ब्यूटीपार्लर चलाती थीं और पार्लर में अपना मेकअप करें या न करें मकान मालिक को देखते ही सारा मेकअप का सामान मुँह पर पोत लेतीं थीं।

धीरे-धीरे उस ब्यूटीपार्लर वाली पूतना जी नें अपने आँखों के मेकअप से उस दिलफेंक सरदार जी को दो दिन में पटा लिया और तीसरे दिन कहा कि ये जो छोटा वाला कमरा है न, इसे आप खाली कराकर मुझे दे देते,तो मैं आपको किसी दिन अपना दिल,विल, प्यार, व्यार सब दे देती।

मकान मालिक बड़े प्रसन्न हुए…ऑफ़र ही ऐसा था,जो किसी बूढ़े होते मर्द को खुश करने के लिए काफी था। लेकिन इधर जवान होता मैं ये ख़बर सुनते ही डर गया। लगा कि साला कितने मुश्किल से तो हजार रुपया महीने में ठीक-ठाक कमरा मिला। क्या अब इसे भी खाली करना पड़ेगा ? वो भी इसलिए कि एक जवां किरायेदारिन पर मकान मालिक का दिल आ गया है।

मेरी रातों की नींद और दिन का चैन सब गायब होंने लगा। समझ न आया कि क्या करूँ, कहाँ जाऊँ!

आख़िर एक दिन सुबह मैनें कहरवा की तिहाई लगाई। मकान मालकिन से नजदीकी बढ़नी शुरू कर दी..और मौका लगते ही धीरे से कह दिया कि आँटी जी ये ऊपर वाली का लच्छन कछू ठीक नहीं लग रहा है,कृपया इस पर नज़र रखिये..यहाँ कई कुँवारे लड़के हैं जो सँगीत और संस्कृत पढ़ने आएँ हैं। इनको तो बिगाड़ ही देगी आपके पति….

आँटी जी हर शादी-शुदा औरत की तरह काफी समझदार थीं। उन्होंने झट से मेरी हाँ में हाँ मिलाई और रात को अपने सरदार जी को भरपूर डोज दिया। जिस डोज की आवाज खिड़कियों से होते हुए मेरे कमरे तक आई…

फलस्वरूप अगले ही दिन ऊपर वाली मोहतरमा नें कमरा खाली कर दिया। मैनें चैन की सांस ली। बाबा को जाकर जल चढ़ाया। और धीरे से कहा..जै हो बाबा, जै हो अन्नपूर्णा माई !

समय बीतता गया।दो साल बाद स्कूल छोड़ दिया.. तब कुछ वृन्दावन तो कुछ अयोध्या के कलाकार दोस्त बन गए। फिर उनके साथ दूसरी ही कथा शुरू हो गई। जो फिर कभी सुनाऊंगा।

लेकिन इस पक्का महाल वाले कमरे में एक साल बाद सरदार जी और सरदारीन जी से इतनी करीबियां बढ़ गई कि सुबह चाय बने तो अतुल आवो, पकौड़ी बनें तो अतुल आवो..उधर से आ रहे हो अच्छा जरा समोसा लावो,खाया जाए..! ये कमरे की चाभी रख लो सरदार आए तो दे देना।

ये क्रम तीन साल चला.. और ऐसा चला कि जब दो हज़ार सोलह के मई महीने में मैं कमरा खाली करने लगा तो पहली बार किसी मकान मालिक का चेहरा किसी किराएदार के जाने से खुश नही बल्कि बहुत उदास था। मैं भी लगभग रोने लगा था।

लेकिन छूटना और जूटना तो नियति है। वो कमरा छूटा और आज देखिये न समय का चक्र ऐसा आया कि बनारस भी छूट गया !

इस मुम्बई के एक मॉल में बैठकर न जाने किस ब्राण्ड की काफ़ी पीकर ये पोस्ट लिखते समय न जानें क्यों पक्का महाल की याद आ रही है। बनारस दिल में हूक उठा रहा है।

सोच रहा कि वहाँ सब कुछ बिखरा था,गलियाँ तंग थी। सुबह कूड़ा उठान से पहले नाक पकड़कर बाहर निकलना पड़ता था। लेकिन लोग कितने फुर्सत में थे।

यहाँ सब कुछ व्यवस्थित है…सब कुछ करीने से सजा। झोपड़ियों के आगे भी कार खड़ी है। और शाहरुख खान के बंगले के पीछे एक ठेले वाला किसी करोड़पति से कम भौकाल नही बनाया है। लेकिन यहाँ किसी मकान मालिक को तो छोड़िए किसी आदमी को फुर्सत नही कि आपसे मिल सके।

सब भग रहें हैं। सोचता हूँ मुझे भी आज नहीं तो कल भगना ही पड़ेगा।

बस डर लगता है कि कहीं इस रेस में मेरे हिस्से का रुका हुआ वो पक्का महाल कहीं छूट गया तब ?

ये छोटे शहरों की स्मृतियाँ ही हमारी संचित निधियां हैं…किसी दिन इस पर भी एक डिजायनदार परत चढ़ गई तो ?

पता नहीं क्या होगा…

बस दिल कहता है कि जो होगा अच्छा ही होगा…! हम बचाएंगे अपने दिल में उस पक्का महाल को जिसकी तंग गलियाँ हमारी स्मृतियों को पहाड़ बनातीं हैं।

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(तस्वीर- बीएचयू का हॉस्टल ( रीवा कोठी अस्सी घाट ) छोड़ते समय… मई 2018

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