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सोशल अड्डा

कहते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है..लेकिन आजकल के हालात को देखते हुए कहीं से नहीं लगता कि आदमी रत्ती भर भी प्राणी का गुण रखता है,वो देश -दुनिया और समाज को बनाने-बिगाड़ने की तो खूब बातें करता है..लेकिन बड़ी विडम्बना है कि खुद को छोडकर पूरा समाज बदल देना चाहता है..यहाँ  हमारा समाज   में चर्चा करेंगे विभिन्न ज्वलंत और सामाजिक मुद्दों पर.पहल करेंगे खुद को बदलने की

सोसायटी का लोकतंत्र और कुत्ता राजनीति : एक हास्य कथा

सोसायटी अध्यक्ष एक रिटायर्ड अफ़सर थे और जीवन के खाली दिनों में लेखक बन चुके थे। उन्होंने सोसायटी कमेटी ग्रुप में एक डिजिटल सूचना लिखी थी, जिसका मजमून कुछ यूं था,

डोपामाइन डिटॉक्स – डिजिटल जंगल की आयुर्वेदिक जड़ी !

जिन चीज़ों को करने से हमारी खुशियों के व्याकरण की परिभाषा तय होती हो, एक वक़्त के बाद वही चीजें ज़िंदगी की स्लेट पर धुंधली पड़ने लगती हैं और फिर मन उचट...

एक गुमनाम आईआईटीयन

वो सुबह की ठंडी हवा की तरह यूँ ही टकरा जाते। कभी तुलसी घाट पर स्न्नान करते तो कभी विश्वनाथ गली के भेडियाधसान में पान खाते। किसी सुबह हम...

नवकी बहुरिया का सिनेमा

आम के दिनों में सरेआम मार खाने का सुख याद करने बैठूं या आम के बगीचे में झूला झूलते हुए टहनी के टूट जाने का दुःख ? गिल्ली-डंडा के लिए मैदान खोजने...

कौन जात हैं मास्टर साहब ?

पिछले दिनों बनारस के आसमान में एक अनजानी सी खुशी फैल गई। देखते ही देखते सामने घाट से लेकर गोदौलिया तक की गलियों के वो सारे कमरे खाली होने लगे, जिनमें कभी...

राशन कार्ड में डाटा…

आजकल शरीर मल्टी विटामिन और मिनरल्स की कमी से जूझने के बाद भी उतना कमजोर नहीं दिखता, जितना दो जीबी डॉटा खत्म हो जाने के बाद दिखता है। बड़े...

आई स्टैंड विद…..

दूसरों का झगड़ा-बवाल पूरे मनोयोग से देखने की ललक मनुष्य में कब पैदा हुई, ये आज भी व्यापक शोध का विषय है। मामला अगर जूतम-पैजार तक चला जाए तो...

डॉक्टर, ये देश बीमार है….!

वो छोटे शहर के बड़े नेता थे। अभी जनता नें उन्हें चुनाव जीताकर देश सेवा करने का मौका नहीं दिया था। इसलिए उन्होंने समाज सेवा करने का निर्णय लिया था।

अश्लील हरकतें ना करें……!

चढ़ाई बहुत लंबी हो। रास्ता गुमनाम हो। दूर-दूर तक कोई आता-जाता दिखाई न दे। बड़ी मुश्किल से कुछ दिखाई भी दे तो वही बिसलेरी की बोतलें,फटे जूते,चिप्स के...

भारतीय बुद्धिजीवी और ऑरगेज्म का बाज़ार !

आजकल महुआ,आम,लीची ही रस से आच्छादित नहीं हैं..फेसबुक टाइमलाइन भी रसमय होकर फीमेल प्लेज़र और आर्गेज्म से आच्छादित हो चुका है। एक पक्ष अपने मदन छतरी में सुख को...

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