उस्ताद..आज आपके साथ थोड़ा बनारस भी बिक गया
सादर प्रणाम
उम्मीद है आप जहाँ भी होंगे सकुशल होंगे..देखिये न आज आपके बनारस में सूरज दिल खोलकर निकला है,हवा पंख खोलकर बह रही है...पक्षी दिल खोलकर उड़ रहे हैं.कहीं दूर एक बांसुरी की...
सरकारी सुहागरात योजना
हमारे यहां लौंडे की शादी के दिन जैसे-जैसे नजदीक आते जातें हैं.वैसे-वैसे उसके स्वभाव में ही नहीं वरन पहनावा,चाल-चलन,कालर ट्यून से लेकर वालपेपर तक बदलते जातें हैं.यहाँ तक की उसके सुहाग रात के सपने...
पियवा से पहिले हमार रहलू ( सन्दर्भ सहित व्याख्या )
प्रश्न - भोजपुरी के लोकप्रिय गीत 'पियवा से पहिले हमार रहलू' की सन्दर्भ सहित व्याख्या करें।
अथवा
"रात दिया बुता के पिया क्या-क्या किया" की सारगर्भित विवेचना करें।
उत्तर - प्रस्तुत करेजा फॉर गीत "पियवा से पहिले...
भारतीय वीरांगनाओं की कहानी,जो इतिहास की किताबों में दर्ज नहीं है
संगीत के ग्रंथों में परस्पर विरोधाभास नें आज संगीत के छात्रों के सम्मुख बड़ा ही भ्रमात्मक स्थिति उत्पन्न कर दिया है.ग्रंथों में इतने मतभेद हैं की समझ में नहीं आता की सच किसे माना...
बबुनी बीड़ी पियत जात रहली डोली में…..
हमारे भोजपुरिया क्षेत्र में नाच का कभी जबरदस्त क्रेज था.तब आर्केस्ट्रा की फ़ूहड़ता का प्रभाव ठीक से नहीं हुआ था.मैं भी पैदा नहीं हुआ था.लेकिन मनोज तिवारी पटरी भाठा लेकर स्कूल जाते थे.निरहू और...
भिखारी ठाकुर की भोजपुरी साफ्ट पोर्न का हब कैसे बनी ?
वो साठ का दशक था, तब मनोरंजन के इतने साधन नहीं थे,ले-देकर दशहरा के समय दरभंगा और अयोध्या से आने वाली रामलीला मण्डली का आसरा था। कहीं से खेलावन बाबा को पता चलता कि...
आप गायत्री ठाकुर को जानते हैं ?
जब घरे घरे टीवी , टेप आ रेडियो ना रहे मनोरंजन के साधन कम रहे हतना गायक आ कलाकार लो ना रहे लो लोग खेत से काम कर के आवे सुते के बेरा घर...
भोजपुरी का नया सिनेमा- इन पांच शार्ट फिल्मों को नहीं देखा तो क्या देखा...
रोज सैकड़ों अश्लील एलबम, हजारों अश्लील गीत, भोजपुरी में भोजपुरी को छोड़कर सब कुछ दिखातीं दर्जनों फिल्में।
मस्तराम के मामा को मात देने को बेताब डब्बू डेंजर और सलिल सहकल जैसे रोज पैदा होते करोड़ों...
भोजपुरी संगीत अश्लील क्यों है ? ( इतिहास और वर्तमान पर एक नज़र )
वो साठ का दशक था,तब मनोरंजन के इतने साधन नहीं थे। ले-देकर दशहरा के समय दरभंगा और अयोध्या से आने वाली रामलीला मण्डली का आसरा था। कहीं से...
गाँव-जवार का फगुआ गान (अहा ! ज़िंदगी के मार्च अंक में प्रकाशित )
गांव के ताल-पोखरा हो या अमराई,महुवा के चिकनाते पत्ते हों या बंसवार में फूटते कोंपल.काली माई का दुआर हो या लाई-दाना भूजने वाली घोसार.गांव मन ही मन होली की तैयारी करने लगा है। सुबह...

















