गाँव-जवार

शहर में रहते-रहते खेत खलिहान और बाबा का दालान कब छूट गया पता न चला,अब तो बस यादों में गाँव बसा है.फ़िल्म और टीवी में ही देखकर हम खुश हो जाते हैं..और सबसे बड़ी बात कि गाँव की बातें और चिंता तो सभी करते हैं लेकिन अफ़सोस कि गाँव की ओर कोई जाना नहीं चाहता है...आइये  हम आपको ले चलते हैं खेत-खलिहान और गाँव की ओर,मिलवाते हैं गाँव के मजेदार किस्सों से..महसूस करवाते हैं गाँव की खूबसूरती को..

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ओ पिया परदेसिया ये धान की रोपनी ( विरहन व्यथा )

पिछले साल बैसाख में भौजी गवना करा के आई थी,ककन छूटे दू दिन हुआ था और मेहँदी अभी छूटा नहीं था कि चार दिन बादे गेंहू का कटिया शुरू हो गया। हाय! रे किसानी...   मजबूरी...
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आँगनबाड़ी वाली भौजी ( स्त्री विमर्श की एक कथा )

गाँव के बाहर पुल पर बैठे पश्चिम टोला के बबलूआ ने नन्हकू बो भौजी को देखते ही मोबाइल कि आवाज को बढ़ाया गनवा उहे था.जिसमें महान अश्लील गायक सीरी खेसारी लाल जादब जी अपनी...
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आधुनिकता ने काट दी प्रेम की डोर

लाख हनी सिंह का दौर हो पर गाँव में रहने वाला लौंडा आज भी दिल टूटने पर 'ब्रेक अप की पार्टी रख ली' नहीं सुनता ।आज भी अल्ताफ राजा उसके महबूब गायक हैं..गाँव के...
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हमार भोजपुरी ग़ज़ल

  जे कबो सबका के रस्ता बतावत रहे देखीं उहे आज रस्ता भुलाइल बा काल्ह घर घर में जाके हमके जोहत रहे आज उहे अपना घर में लुकाइल बा इहे भइल खता उनसे मुहब्बत भइल इ दिल ना ,दरिया ह...

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