अश्लीलता के टेम्पो पर सवार भोजपुरी

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bol bum song

शादी-ब्याह के दिन में शगुन उठ रहा हो या घर में कोई शुभ कार्य हो रहा है..जैसे ही घर की बुढ़िया माई अपना आँचल सीधा करके गाती हैं। “गाई के गोबरे महादेव अंगना लिपाई” गजमति चौका पुराई,सुनी हे शिव, शिव के दोहाई..” वैसे ही हमारा चंचल मन पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोक संस्कृति के इस मधुर नाद में खो जाता है।

और सिर्फ शादी ब्याह ही नहीं,हम ध्यान से देखें तो पिड़ियाँ लगाने से लेकर जिउतिया व्रत रखने तक शायद ही कोई तीज-व्रत और त्योहार हो जहां भगवान शिव को गोहराया न जाता हो.. उनका नाम लेकर उनका बखान करने से लेकर उनसे मनुहार करने और उलाहना देने का काम न किया जाता हो।

भला कौन होगा जिसने अपनी दादी के मुंह से न सुना होगा कि..”कइसे के शिव के मनाई हों शिव मानत नाहीं..

कौन मां होगी जिसने अपने बेटी की शादी में अपने दामाद को शिव और बेटी को गौरा मानकर “आपन गौरा न बियहबो शिव बउरहवा से” न गाया होगा।

कौन ऐसा गाँव होगा जहां फागुन की किसी सांझ को ढोलक और झाल के साथ शिव शंकर खेलत फॉग गौरा संग लिए” न गाया गया होगा।

ध्यान से देखने पर समझ में आता है कि चैत,वैशाख से लेकर सावन भादो और कार्तिक से लेकर फागुन तक कहीं न कहीं हमारे लोक गीतों से शिव ऐसे जुड़े हैं जैसे हमारे गांव से शिवाला।

लेकिन आज के आधुनिक भोजपुरी गायक सावन के पवित्र मास में शिव भजन के नाम पर जो अश्लीलता परोस रहें हैं,उसे देखकर और सुनकर सिर्फ दुख ही नहीं होता वरन मन उचाट होकर सोचने पर विवश हो जाता है कि क्या सच में शिव जी का भजन गाया और बजाया जा रहा है ?

क्या “छलकता हमरो जवनिया ए राजा” की तर्ज पर “छलकता हमरो गगरिया ए राजा” गाना और उसे उसी अंदाज में उत्तेजक दृश्यों के साथ फिल्माना क्या शिव भजन है ?

क्या 2017 के एक महा अश्लील गीत “पलँग करें चोंय-चोंय” कि तर्ज पर “कांवर करे चोंय-चोंय” गाना शिव भजन है ?

या फिर “रात दिया बुता के पिया क्या-क्या किया” और “पियवा से पहिले हमार रहलू’ के ही ट्रैक पर थोड़ा सा लिरिक्स बदलकर गाना शिव भजन है ? या फिर भोजपुरी गायकों द्वारा पार्वती जी से ये कहलवाना की “हरदिया काम न करि राजा.दरदिया दे देबs ए राजा” ये शिव जी की स्तुति है।?

नहीं..ये शिव जी के भजन नहीं हैं। ये शिव जी के नाम पर नँगा नाँच है जिसे भोजपुरी के सुपरस्टार कहा रहे गायक अभिनेताओं द्वारा गाया और बजाया जा रहा है और हम मूक दर्शक बनकर बस तमाशा देखे जा रहें हैं।bol bum song

रही सही कसर दूसरी पंक्ति के भोजपुरी गायकों ने पूरी कर दिया है। एक अदद हिट की तलाश में ये इतना नीचे गिर चूके हैं कि इनका गीत संगीत अगर शंकर जी सुन लें तो सबसे पहले अपने तीसरे नेत्र से इन्हीं का संहार करेंगे।

आज इस दुर्दशा को देखकर मन में कई बार ये सवाल आता है कि क्या यही भोजपुरी थी..? जिसे भिखारी ठाकुर,महेंद्र मिसिर से लेकर गायत्री ठाकुर और भरत शर्मा,शारदा सिन्हा,मदन राय,गोपाल राय जैसे सैकड़ो गायकों नें समय-समय पर अपने संगीत से समृद्ध किया था ?

और जब आप गम्भीरता से इन प्रश्नों का उत्तर खोजने की कोशिश करेंगे तो एक ही उत्तर आएगा…”नहीं..ये तो हमारी भोजपुरी नहीं है। ये गीत हमारे गीत नहीं हैं।

ये तो भोजपुरी के नाम पर कोई उत्तेजक और अश्लील सी शराब है जो हमारे कानों के माध्यम से हमारे अवचतेन में भरी जा रही है।

ये तो भोजपुरी के नाम पर फूहड़ता की एक आँधी है जिसने स्वस्थ समाज को भोजपुरी गीत-संगीत से दूर करके इसे अश्लीलता का पर्याय बना दिया है।

आज इस विकट सांस्कृतिक प्रदूषण के दौर में इस खेल को समझना और सावधान रहना जरूरी हो गया है…कि ये खेल कहाँ से शुरू हुआ है। और अब हम न चेते तो ये कहाँ तक पहुंचने वाला है।

सबको पता है कि भोजपुरी संगीत का वो एक सुनहला दौर था जब किसी गायक के ग़ले में सुर और गीत में भाव देखकर म्यूजिक कम्पनियां उसका कैसेट रिकार्ड करतीं थीं।

समाज उसे बड़ी प्रतिष्ठा की नज़र से देखता था। तब कैसेट कलाकार होना अपने आप में एक स्टेटस सिंबल माना जाता था। कैसेट होना किसी गायक के सांगीतिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

लेकिन आज हम 4g से 5g में जाने वाले हैं..ये दौर आडियो, सीडी और डीवीडी से ऊपर उठकर डिजिटल भोजपुरी का वो दौर बन चुका है,जहां हर गायक खुद में एक म्यूजिक कम्पनी है,वो अपने गीत का कम्पोजर है, एडिटर भी है और उसके साथ अपने म्यूजिक का प्रमोटर भी है जिसे गाने,बजाने,रिकार्ड करने और श्रोता खोजने के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं है।

बस एक क्लिक पर हजारों लोग उसका गीत-संगीत देखने के लिए तैयार बैठे हैं।

उसको कैसेट कितना बिका,और बकाया पैसा कब मिलेगा इसकी चिंता नहीं है। वो तमाम म्यूजिक वेबसाइटों को बेचकर तुरन्त पैसा ले लेता है। उसके  वीडियो पर दिख रहे एडवरटाइजिंग से जैसे ही सौ डॉलर की इनकम होती है यू ट्यूब हर महीने उसके एकाउंट में पैसा ट्रांसफ़र कर देता है।

इसलिए उसके लिए सुर,ताल,भाव,शब्द ये दूर की कौड़ी हैं.उसके लिए सबसे बड़ी समस्या ये है कि हम अपने गीत-संगीत में ऐसा कौन सा मसाला डाल दें कि उसके गीत पर मिलियन व्यूज हो जाए।

इस मिलियन व्यूज के लिए गायक कुछ नहीं करता बस वो साल के सबसे हिट गाने की धुन को देखता है। जैसे “सैयां हमार आवतारे टेम्पो से” अगर इस का हिट गाना है..तो उसी ट्रैक पर शंकर जी आवत बाड़े टैम्पो से गा देता है।

और इसी तर्ज पर एक दो नहीं हजारों गायक-गायिका इसी अंदाज में दो कौड़ी की तुकबंदी का सहारा लेकर सावन में शंकर जी को टेम्पो पर चढ़ा देते हैं,नवरात्रि में दुर्गा जी को और छठ के सीजन में छठ माता को। पूरे साल यही क्रम चलता है।

बस इसी प्रचलन ने भोजपुरी संगीत का बेड़ा गर्क कर दिया है। आज अगर एक गीत हिट हुआ कि पांच हजार गायक उसी गीत को गाने लगते हैं।

समझ में नहीं आता कि आज जहाँ तमाम छोटी-छोटी क्षेत्रीय भाषाओं के फिल्म और संगीत को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिल रहा है..वहीं 22 करोड़ से ज्यादा बोली जाने वाली भोजपुरी का सिनेमा और संगीत चोली,नाभि,और मार देंम,फॉर देम करते हुए टेम्पो,ट्रैक्टर और जनरेटर तंबू से ऊपर उठने को तैयार नहीं है।

इसने एक खास श्रोता वर्ग बना लिया है जो इनके गीत-संगीत और वीडीओ को देखता और सुनता है।

इस विषम हालात को अब बदलना जरूरी है.सांस्कृतिक संकट की इस घड़ी में पढ़े-लिखे चिंतनशील भोजपुरी वर्ग जो खुद को एलीट घोषित कर चुका है उसकी जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वो अब सामने आए।

और अपनी मातृभाषा भोजपुरी के श्लील और अश्लील के अनुपात को कम करे। साफ-सुथरे और भाव प्रधान गीत-संगीत को ज्यादा से ज्यादा सुने उन्हें प्रोत्साहित करे। ऐसे गायकों कलाकरों को सम्मानित करे। ताकि साफ-सुथरा और कर्णप्रिय संगीत गाने बजाने की एक प्रतिस्पर्धा पैदा हो सके।

यकिन करें तभी हम भोजपुरी में भोजपुरी में भोजपुरी को बचा पाएंगे वरना आप आठवीं अनुसूची में शामिल करवाकर क्या कर लेंगे जब आपकी गुड़ से मीठी भोजपुरी के गीत अश्लीलता का पर्याय बन जाएंगे.

( दैनिक अखबार जनसंदेश टाइम्स के लिए लिखा गया ब्लॉग )

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