गरीब भाई के राखी (कहानी)

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एही जेठ में बबीता के बियाह भइल नइहर छूटल की आँखि से लोर छूटल…डोली में चढ़ली त खेत सीवान मन परे लागल कइसे बाबूजी खाती खाना लेके खेते जाईं.उ बरमेसर रा के बगइचा में महुआ बिनल आ खो खो खेलल…उ सखी सलेहर जेकरा संगे आपन मन के बात हरेमसा बबिता करत रहली.उ भाई भौजाई जे बेटी लेखा उनका के मनले रहे…आ सबसे बड़ माई आ बाप जेकर आँखि के पुतरी रहली…इ सब छूट गइल.
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रोवत-रोवत ससुरा अइली त इहाँ दउरा में डेग पड़ल गांव भर में हाला भइल की बड़ा सुंदर कनीया बिया…..पूरा गाँव मिठाई बटाइल…खाजा टिकरी बुनिया से घर गम गम महकत रहे…..मय टोला के मेहरारू बबिता के सुघर आ गुणवान कहल लो…उनका हाथ से कढ़ाई कइल परदा आ बेडशीट के डिजाइन के चर्चा मय टोला भर के लइकि कइली स। उनकर मरद उमेस भी अइसन सुघर आ नेक कनिया पाके अपना संघी संघाती में एकर चरचा करस…सब आनंद में रहे..

दू दिन चार दिन बाद बबिता के सास आ जेठानी उनकर बक्सा खोलल लो.सब मिलल सामान के चेक कइल लो….त पनरह गो साड़ी निकलल…कुछ साड़ी पवनी के आ कुछ रिश्तेदारन के..बाकी बबिता के सास  खुश ना रहली बबिता के जेठानी मुंह चमका के कहली की “हुंह एह  ले ढेर त हमरा के तीज प मिलेला…बड़ा सुंदरता आ गुण के बखान होता एकदम कंगाले के बेटी बाड़ी ई”ना ढंग के पलंग देले बाड़न स ना तोसक तकिया ना कुर्सी मेज ना एगो रंगीन टीवी.रूप लेके केहू पूजा करी..अरे जे आई उ समाने न देखी.मन भर सास के कान भर दिहली.

सांझी खा उमेश आ उनकर बाबूजी खाये बइठल लो त उमेश के माई कहली..”अउर कवनो कंगाल ना मिलल ह बियाह करे के..एकदम नाव हंसवा दिहनी…ना सुध एगो साडी मिलल बा ना सुध एगो समान…अरे सुरेस के बीयाह भइल त चार गाँव में केहू के ओतना सामान ना मिलल रहे.”

उमेश के बाबूजी आ उमेश खा लेले रहेलो.उनकर बाबूजी कहलन की देखा हम सामान प बियाह नइखी कइले हम बेकत देख के बियाह कइले बानी आ हमार पतोह लाखों में एक बिया सामान त उमेस के नोकरी लागि त कबो किना जाइ.बाकी नीमन बेकत आ कनिया बाजार में ना मिलेला की कबो केहू कीन ली.सामान लेके आइल त बाड़ी सुरेश बो.ना केहू से बोले के लूर ना बड़ जेठ के आदर सम्मान करे के सहूर.अरे आबो से सुधर जा लो.

उमेश भी माई के समझवले.जाय दे माई सामान नइखे मिलल त का ह तोर पतोह ठीक बिया न.माई त चुप हो गइली…
बाकी बबिता के जेठानी लुका के सुन लेले रहली.आ सास के आवते उनकर गोड़ दबावे चल गइली.ओह दिन उमेस के माई बड़ा आश्चर्य में  रहली की सूरज केने से निकललन दादा.आज ले एक गिलास पानी ना   दिहली आ एगो चार दिन के दयादिन के आवते गोड़ मिसे लगली.बाकी मने मन चुप रह गइली.गोड़ मिसत मिसत जब कुछ देर भइल त जेठानी अपना सास से कहली.ए अम्मा जवन झुमका देले बाड़े स उहो हमरा रोल गोल के लागत बा.अब त उमेस के माई कपार पीट लिहली…आही ए करम आतना बड़ विश्वासघात.

उमेस के माई बबिता से पुछलि.काहो इहे नकली झुमका दिहल हलो.अरे जब पइसा ना रहे त कवन काम रहे बेटी बियहला के.ना साड़ी ढंग के ना एकहू कपड़ा.ओह दिन राती खा बबिता खूब रोवली.उमेस उनका के अंकवारि में ध के समझवलन की जाये द हम नोएडा जाइब आ कमाइब सब ठीक हो जाइ..हम माई आ भाभी के समझा देत बानीं ।बबीता चुप हो गइली।सबेरे बबिता के  रसोई छुवावल गइल…ओह दिन पूड़ी आ रसियाव् बना के बबिता सभके खियवली.उमेस के बाबूजी बड़ा खुस रहलन उमेस भी..दू दिन चार दिन में किचन के सगरी जिम्मा बबिता नीमन से सम्भार लिहली….

चार दिन बाद उमेस नवेडा गइलन त बबिता खूब रोवली…उमेस के  आँख में भी लोर रहे.उनका के समझवलन की अच्छा से रहिहा.हम दीपावली में आइब.उमेस के गइला के बाद बबिता बड़ा उदास रहे लगली.मानो केहू प्रेम के दुनिया बसा के उजाड़ देले होखो.केहू ग आपन मन घर के काम आ सिलाई में लगावस।

एक दिन दुपहरिया में उनकर जेठानी के  लईका पिंकू पढ़ के अएलन आ बबिता से खाना मंगलन..बबिता फोन पर माई से ससुरा के हाल चाल बतावत रहली.उनकर माई जान के बड़ा खुश होत रहली की बेटी वडा सुख में बिया.बाकी बबिता आपन सभ बात ना बतवली.तले पिंकू रोवे लगलन..उनकर मने बबिता के जेठानी आ गइली.आ जोर देके बबिता से कहली की सुनात नइखे लइका तबे से खाना मांगत बा.बबिता रोवा गिरा के कहली की  ए दीदी जी माई के फोन रहल ह सुन ना पवनी ह.

अब त जेठानी जी के पारा गरम रहे.खाना बनावल आ रहन-सहन खाती पहिले ही उनका के ताना मिलत रहे.अब बबिता के अइला से अउर इनकर माथा सनकल रहत रहे.मोका के तलास में रहली.सास के बोला के बहुत फजीहत कइली.आपन सभ खीस निकाल दिहली.इहाँ तक कह दिहली की.”पता न कवना नइहर के इयार से बतियावत रहली ह”.मने भतार के जाते आपन रंग में आ गइली बड़का सत्ती सबितरि बनत बाड़ी.

ओह दीन बबिता के लागल की केहू गरम लोहा क के कान में डालत बाटे.सास भी खूब बोलली.भिखमंगा के बेटी इहे कुल करबे तें.आवे दे उमेस के बाबूजी के। साँझ खा बाबूजी अइलन उनका आवते बबिता पानी लेके गइली आ सभ बात रो रो के बता दिहली.बाबूजी कहलन की अच्छा तू ठीक से रह हम सभके समझा देब.

एही तरे दिन बीतत रहे.बबिता जइसे तइसे रो गा के दिन गुजारत रहली…कबो उमेस से फोन प रोवस कबो माई से.माई समझवली की देखा सावन में छोटका बबुआ रजेस जाइ.चिंता मत करा.

एही में  सावन आइल.सभ बेटी  के तरे बबिता के भी उम्मीद रहे की बाबूजी आ भाई आई लो.जब जब बूनी पड़े तब तब बबिता के नइहर के झूला मन पड़े.राखी के दिन नियराये लागल उनकर माई फोन प कहली की रजेस जइहन.बबिता मने मन खुस रहली की भाई आई त सभके हाल चाल मालुम चली.रक्षा बन्धन आ  गइल सबेरहि से बुनी पड़े लागल.ओह दिन बबिता खीर पूड़ी बनवली रोरी चदन माँगा के रजेस के ई इन्तजार कइली.

दस बजल बारह बजल रजेस ना अइलन.एक बजे  उनका जेठानी के भाई आइल आ  खूब राखी मिठाई आ कपड़ा बहिन के मोबाइल देके चल गइल.जेठानी जी खूब उतरा के अंगना में चलस…आ ताना मार के कहस की…”भिखमंगा हवन स जान बुझ के ना भेजले होइहन स की पइसा लागि.एगो हमार भाई बा।”

अब बबिता के ई सुनला के बाद आँख से लोर रुकबे ना करे.तीन बजे लागल राजेस ना अइलन.बबिता फोन कइली.माई कहली उनकर कि उ त सबेरहि के गइल बा…पहुँचत होइ.बुनी बरखा के दिन साधन ना मिलत होइ..

सांझी खा  6 बजल बबिता के रोवला के ओर ना.तले दुआर से बाबूजी अइलन की तहार भाई आइल बा हो.बबिता लोर पोछत दुआरी प  गइली त देखत बाड़ी की रजेस के एगो हाथ में बैंडेज बा दोसरका हाथ में मिठाई के डिब्बा.बबिता सुन्न…!रजेस के धके खूब रोवली.रजेस चुप करवलन की..हम ठीक बानी बहिन आवत रहनी ह त ट्रक धक्का मार दिहला सिहा…जवन पइसा बाबूजी देले रहलन सब मरहम पट्टी में लॉग गइल ह.

हम बहुत रोवत रहनी की अब का होइ..तोरा के का मिठाई लेके जाई आ राखी बन्हवाइ…आवत रहनी ह रोवत त चट्टी प बाबूजी भेटा गइनी ह….उहाँ से सब बात बतवनी ह…उहाँ के भगवान बानी…हई देख मिठाई किन के देले बानी आ हई बनारसी साडी आ तोरा सास जेठानी के कपड़ा.

इ सुनल के बाद बबिता के रोवला के ठेकान ना….सुख मिश्रित दुःख के आंशू निकसे लागल….अइसन भाई आ ससुर पावला के ख़ुशी भी रहे आ भगवान से शिकायत भी की  गरीब के काहें बेटी देला भगवान.

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