रोज सैकड़ों अश्लील एलबम, हजारों अश्लील गीत, भोजपुरी में भोजपुरी को छोड़कर सब कुछ दिखातीं दर्जनों फिल्में।
मस्तराम के मामा को मात देने को बेताब डब्बू डेंजर और सलिल सहकल जैसे रोज पैदा होते करोड़ों गायक। हर गली-मोहल्ले में धड़ल्ले से रोज खुलती स्टूडियोज.उतनी ही मात्रा में रोज पैदा होते टिनहिया हीरो।
और इधर भोजपुरिया बुद्धिजीवियों का हाल बेहाल.ई लोग बस दिन भर खेसरीया,निरहुआ……पवनवा
फलनवा,चिलनवा को गरिया रहें हैं,और जो बचे-खुचे हैं,वो उनको डिफेंड कर रहें हैं।
न इन्होंने आज तक कायदे की कोई फिल्म बनाई है,न एक ठीक ढंग की वेबसाइट,न कोई यू ट्यूब पर कायदे का चैनल,न ही साहित्य के लिए कोई बढ़िया ब्लॉग,न ही व्यापक पहुंच वाली कोई पत्रिका।
अश्लीलता फैलाने वाले तो अपना काम प्रोफेशनल ढंग से कर रहें हैं.क्या भोजपुरी का कथित सभ्य समाज इस अश्लीलता का जबाब रचनात्मक तरीक़े से दे रहा है ? या फिर केवल विरोध ही जारी है। जी साहेब-
कुछ दिन पहले ये बात काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सरदार वल्लभ भाई पटेल और आचार्य नरेंद्र देव छात्रावास के ठीक सामने वाली सड़क पर झाल-मूढ़ी खाते हुए दो मित्रों ने सुर में सुर मिलाकर पूछा था।
सवाल बड़ा जायज था और उन जैसे कई ग़ैर भोजपुरी भाषी को जानने का पूरा हक भी कि “क्या भोजपुरी का मतलब ‘कमरिया करे लपालप लॉलीपाप लागेलू’ और ‘निरहुआ रिक्शावाला’ ही है.. ? या आज बढ़िया के नाम पर और कुछ भी हो रहा है”।
इधर इस तरह के सवाल अक्सर मुझे भी परेशान करते हैं कि डीजिटल प्लेटफॉर्म पर भोजपुरी में बढ़िया और खराब के बीच इतना लंबा फासला क्यों है। ? वो क्या कारण है कि आप यू ट्यूब पर जब भी भोजपुरी सर्च करते हैं,आपके सामने ढेर सारा अश्लील कंटेंट आ जाता है।
हाल ये है कि एक दिन मैनें गूगल में bhojpuri film टाइप किया तो मेरे सामने ऐसा दृश्य था,जिसकी कल्पना नहीं थी,शार्ट फिल्मों के नाम पर वही प्यासी पड़ोसन, रंगबाज ड्राइवर, ।
लेकिन मैं इन सबसे निराश नहीं होता,जब मैं डिमांड और सप्लाई के खेल में डूब-उतरा रही भोजपुरी में नीतिन चंद्रा के बनाए छठ के गीत को वायरल होते देखता हूँ,या फिर शैलेन्द्र मिश्र की आवाज में ‘होली हमरा ना भावे’ को यू ट्यूब इंडिया में ट्रेंड करते हुए।
किसी उज्ज्वल पांडे को बयालीस डिग्री में कैमरा लेकर दियरा की खाक छानते हुए।
केवल फिल्म बनाने के डुमराँव के किसी अमित मिश्रा को इंजीनियरिंग की शानदार नौकरी छोड़ते हुए।
या अपने घर की मर्जी के बिना बलिया के राकेश विक्रम सिंह को थियेटर करके फिल्म बनाते हुए,तो मेरा उत्साह चार गुना बढ़ जाता है..
भोजपुरी में क्या अच्छा और क्या सकारात्मक हो रहा है.इस सवाल की कड़ी में आज के ब्लॉग की पहली पोस्ट, पिछले एक साल के भीतर बनीं,चार फिल्मकारों की यू ट्यूब पर उपलब्ध पांच शार्ट फिल्मों को समर्पित है।
इन फिल्मों में आपको तमाम बेसिक कमियाँ दिख सकतीं हैं,लेकिन किसी बुलंद इमारत की नींव तैयार होने में समय तो लगता है,इन फिल्मों को देखने के बाद यकीन होता है कि एक न एक दिन भोजपुरी सिनेमा बदलेगा। और अश्लीलता की आलीशान इमारत भरभराके के गिरेगी।
1- ललका गुलाब- 
अवधि– 15:10 मिनट
रिलीज दिनांक- 27 अप्रैल 2017
आज जबकि हमारी जिंदगी बाबा के दालान से 2bhk फ्लैट में शिफ्ट हो रही है..घर के बच्चे बाबा-दादी की कहानियों से दूर होकर किड्स स्कूलों में पढ़कर दिन भर अंग्रेजी में गिटिर-पिटिर कर रहें हैं.
तब युवा निर्देशक अमित मिश्र ने बाबा और नाती की एक ऐसी मार्मिक कहानी को बुना है.जिसकी जड़ों में गुलाब है,और तने पर प्रेम का खूबसूरत रंग,
ललका गुलाब निश्छल प्रेम के उस उदात्त स्वरूप को प्रगट करता है..जिसके आगे समस्त वैज्ञानिक तर्क बौने से लगतें हैं।
बतौर फिल्म निर्देशक अमित की ये दूसरी शार्ट फिल्म है..तीसरी फिल्म की वो शूटिंग में व्यस्त हैं जिसका इंतजार सबको बेसब्री से है।
2- कोहबर –
अवधि- 10:19 मिनट
रिलीज दिनांक- 21 सितंबर 2017
कोहबर बस नाम नहीं है,ये भोजपुरिया लोक सँस्कृति की झाँकी है,जहाँ दुलहा-दुलहिन शादी के बाद बैठते हैं..और फिर शुरू होता है..साली-सरहज से हंसी-ठिठोली,मजाक..बेचारे दुलहा समझ नहीं पाता कि जूते के पैसे देकर अपनी इज्जत बचाएँ या सालियों के नटखट सवालों के जबाब देकर।
इसी हुज्जत में एक बकलोक दुलहा की कहानी पर बनीं कोहबर एक ऐसी फिल्म है जिसे घर की मां-बहन एक बार देखने के बाद बार-बार दिखाने का आग्रह करतीं हैं। और पूछती हैं कि “ई दुलहवा जवन राजू उपाधिया बनल बाड़े इनका से तू मिलल हवा” ?
अच्छी बात ये है कि कोहबर अब फीचर फिल्म बनने जा रही है.उज्ज्वल पांडेय के सिनेमाई जुनून को देखकर लगता है कि भोजपुरी का सिनेमा उज्ज्वल होने वाला है।
3- धिया-पूता 
अवधि- 16:53 सेकेंड
रिलीज दिनांक– 21 अक्टूबर 2017
कहानी एक गांव की है,छठ का त्यौहार नज़दीक है,इधर गाँव में अकेले रह रही एक बूढ़ी मां जिसे समूचा गाँव ककीया कहता है,अपने कमासुत बबुआ को फोन मिला रही है
इधर घर पर कोई नहीं है.वो बेटे को बार-बार फोन करती है कि वो छठ पर घर आ जाए.लेकिन बबुआ बेचारा पइसा छापने में व्यस्त है.उसे ऑफिस के काम से घर आने की तो छोड़िए मां से ठीक से बात करने तक कि फुर्सत नहीं है।
मां थक हारके अपनी बेटी को फोन करती है.बेटी क्या जबाब देती है.ये जानने के लिए अमित झा के निर्देशन में बनीं फिल्म धिया-पूता को एक बार जरूर देखना चाहिए।
4- भोर
अवधि– 18:24 मिनट
रिलीज दिनांक- 16 दिसम्बर 2017
पचास-साठ के दशक में बनीं दो बीघा जमीन के बलराज साहनी से लेकर आज के सिनेमा तक जब हम अपने आस-पास नज़र दौड़ाते हैं तो पाते हैं कि भारत और भारत का सिनेमा तो बहुत आगे चला गया है..
लेकिन किसान बेचारा आज भी वहीं का वहीं है,जो किसान कभी विमल रॉय की फिल्म दो बीघा जमीन में था,2017 की कड़वी हवा में वैसा ही है।
वही सूखा,बाढ़,प्राकृतिक आपदा से जूझता,सेठ साहूकार और बैंकों के चक्कर काटता,फाँसी के फंदे पर झूलता..
पुरुआ के बैनर तले भोर की कहानी भी एक ऐसा ही किसान की कहानी है..उज्ज्वल पांडे निर्देशित इस फिल्म में क्या किसान आत्महत्या कर लेता है ? इस सवाल का उत्तर फिल्म देखने के बाद ही मिलता है।
5-दहेज-
अवधि– 14:59 मिनट
दिनांक– 27 अप्रैल 2018
दहेज हमारे सभ्य समाज का अभिशाप है.इस तरह के सुभाषित तो हम रोज सुनतें हैं.रोज लाखों लोग कहते हैं.”दहेज लेना पाप है”। सरकार भी दहेज को अवैध बता रही है,कानून ने दहेज उत्पीड़न की सज़ा को कड़ाई से लागू करने में कोई कसर नहीं छोड़ा है..
लेकिन जब हम किसी सुबह अख़बार खोलकर बैठतें हैं..तो क्या देखते हैं.वही न पारम्परिक सा समाचार.. “दहेज के लिए बहू को जिंदा जलाया” और फिर हम अगला पन्ना पलट देते हैं.
लेकिन आपको पता है समस्या समाप्त नहीं होती बल्कि और बढ़ जाती है,क्योंकि अगले दिन समस्याओं में और इज़ाफ़ा हो जाता है.
कारण कि यूपी-बिहार के अधिसंख्य लोगों में ये मानसकिता घर गई है कि बेटी को पढ़ाओ मत,उसे अपने पैरों पर मत खड़ा करो.पैसा बचाकर बैंक बैलेन्स बनाओ ताकि एक दिन दहेज देकर उसकी शादी खूब धूम धड़ाके से की जा सके.
इन्हीं विडम्बनाओं को बड़े मार्मिक तरीके से पड़ताल करती फिल्म दहेज के निर्देशक राकेश विक्रम सिंह हैं..बलिया जनपद के निवासी राकेश ने थियेटर की पढ़ाई महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा से की है.दहेज में दिख रही तमाम कमियों के बावजूद उनसे सम्भावनाएं बहुत हैं..
एक महत्वपूर्ण बात-
आपने नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा में शेक्सपियर का हैमलेट देखा है…और देखते ही डेढ़ इंच मुंह फैलाकर कहा है कि “wow क्या लाइट है,क्या साउंड, क्या कैमरा,क्या एक्शन है”
और आप माज़िद मजीदी की फिल्म बहुत बड़े फैन हैं..या फिर आपके सुबह की शुरुआत पण्डित कुमार गन्धर्व के निर्गुण और रात की शुरुवात बेगम अख्तर के ठुमरी से होती है.
तो आपको इन bhojpuri film में अभिनय,फ्रेम,लाइट, कैमरा,एक्शन,लोकेशन,कास्टिंग,मेकअप और म्यूजिक से हजारों शिकायत हो सकती है.
लेकिन साहेब..इतना जानिएगा कि इन सभी फिल्मों में एक्टिंग करने वाले हीरो ने कैमरामैन को पूड़ी,पत्तल,गिलास चलाया है,लाइट का पैसा डाइरेक्टर ने कर्ज लेकर दिया है।
फिल्म के राइटर ने फिल्म को एडिट करने के लिए चंदे का जुगाड़ किया है..और फिल्म में दिख रही हिरोइन ने दिन भर शूट करने से पहले सुबह जल्दी उठकर सबके लिए खाना भी बनाया है।
क्या है कि…खूब बढ़िया अभिनय,फ्रेम,लाइट,कैमरा ,एक्शन तो खेसारी लाल यादव और पवन सिंह की उन फिल्मों में भी होता है..जिनको परिवार के साथ देखना तो दूर अकेले देखने में भी कई बार सोचना पड़ता है कि “यार कोई देख तो नहीं रहा न..”
इन सबको भुलाकर एक बार इन नए और जुनूनी फिल्मकारों की फिल्में जरूर देखी जानीं चाहिए जिनमें तमाम कमियों के बावजूद इतनी सी अच्छाई है तो है कि भोजपुरी सिनेमा और संगीत की दिन-दशा बदलने का सपना हम देख सकतें हैं।
दूसरी बात कि फिल्मों का क्रम मैनें रिलीज होने की तारीख से निर्धारित किया है न कि श्रेष्ठता का पैमाना मानकर..दर्शक को क्या अच्छा लगता है उसके ऊपर छोड़ देना चाहिए। इसलिए फिल्म देखने के बाद यहीं नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय दें.और अच्छा लगे तो फेसबुक,व्हाट्सप्प,ट्वीटर पर शेयर करना न भूलें. धन्यवाद 😊











