अम्मा मेरे बाबा को भेजो री ( अहा ! ज़िंदगी में प्रकाशित )

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फागुन में बेटी का ब्याह क्या तय हुआ,पिता की परीक्षा उसी दिन से शुरू हो गई। बुआ को बुलाना है,मौसी नहीं आएंगी तो पक्का नाराज़ हो जाएंगी।
गुजरात वाले फूफा तो अक़्सर नाराज ही रहतें हैं उनका क्या…लेकिन नोएडा वाले मौसा को जल्दी फोन तो करो.. वरना शादी के समय कुछ गड़बड़ होने पर कौन ताना सुनेगा की “आजकल के लोग सारे फैसले अपनी मर्जी से ले रहे हैं।”

लीजिये इसी चिंता में शादी के चार दिन पहले बुआ आ गईं,मौसी आ गईं..फूफा और मौसा भी आ गए..

घर शादी के सामान से भर उठा।देखते ही देखते गाय के गोबर से आंगन लीपा गया। साँझ को शगुन उठा,देवता-पीतर सबको शादी में बुलाया गया..ढोलक बजी, हजामिन के साथ गंगा पार वाली मामी के ठुमके देखकर समूचा घर हंसी-ठिठोली और गीत-मंगल से गमक उठा।

रात भर शादी की रस्में हुईं, कन्यादान हुआ…जिस सुबह बेटी की विदाई हुई। घर-परिवार ही नहीं,गाँव का कोना-कोना रो उठा,..पशु-पक्षी ही नहीं,खेतों-खलिहानों तक के कन्ठ उस मार्मिक गीत को गा उठे..

“निमिया के डाँढ़ जन कटीहs ए बाबा
निमियाँ चीरइया के बसेरा हो”

हे बाबा चिरइया तो एक दिन उड़ ही जाएगी..लेकिन अपने आंगन में लगी नीम का ख्याल रखना बाबा…न जाने कितनी चिरइयाँ उस पर हैं। काट न देना उसे। बेटी समझाती है और डोली पर बैठती जाती है। बाप का कलेजा फटकर धरती में समाता जाता है।

बाप आधे आंसू को पोछता है,,आधे को छिपाता है। और भारी मन से बेटी को वचन देता है “कि तुम घबराना नही मेरी चिरइया…बाबा जब तक है,नीम को कुछ न होगा। तुम बस खुश रहना अपने घर।

मैंनें पालकर पोसकर बड़ा किया. तू बस खुश रहs. बाप की खुशी उसी में हैं।”

और इस दिलासा के बाद वो बाप भारी मन से खेती-बारी,नौकरी और कारोबार में जुट जाता है।

कुछ ही दिन बीतते हैं कि फिर गाँव फागुन के रंग में रंगा जाता है। होली आ आती है। हवा की रंगत औऱ मौसम का बसन्ती स्पर्श बढ़ने लगता है।उल्लास के रंगों से मन का गाढ़ापन जरा हल्का होने लगता है।

नए अनाज की आवक, फसल पकने का उत्साह,एक किसान के घर आंगन में बन रहे पुए की महक में घुलती जाती है। और बाप आंगन में बैठकर होली के गीत गाते,रंग-अबीर लगाते अपनी बेटी,अपनी चीरइया को याद करता जाता है। ।

पछुआ बहती है,कोयल महुए पर बोलती है और खेत में पक रही गेहूँ की बालियाँ अपने बेटों को बुलाने लगतीं हैं। किसान दौड़ता है..

पता चलता है कि फसल पक गई। जल्दी से काटा न गया तो अनाज खेत मे नुकशान होगा। इधर रामनवमी के पहले नए गेंहू के आटा से ही तो पूजाई होगी।

खुद ही काटो कोई नही मिला तो बनिहार बुलाओ। रामनवमी का कलश कुम्हार के यहाँ से कौन लाएगा.. घर में इसकी बहस चलती ही है कि इधर बाहर खेत कौन काटेगा!, इसकी बहस शुरू हो जाती है..इधर सूरज चमकता जा रहा है।उधर मंसूरी गेंहू चना के दाने हसंते जाते हैं।

गर्मी बढ़ती जाती है।

शिव जी के मंदिर में चैता गाए जाना लगता है..

“चइते मासे राम के जनमवा हो रामा..”

कोरस की टेर,ढोलक की थाप,झाल-मंजीरे की टनकार सुनकर चार कोस का कोना-कोना स्पंदित हो जाता है।

और आधा बैसाख बीतते धूप का रंग इतना चटख हो जाता है कि मन छाँव खोजने लगता है। खेतों में घूमकर गाय-गोरू को चराने वाले खेतो से दूर पेड़ों की ओट खोजने लगते हैं..चौपाए तालाब और नदी।

सूर्य देवता प्रचंड रूप धारण करते ही हैं कि जेठ का आगमन हो जाता है।

इस जेठ में एक महीना पीपर-पाकड़,बाग-बगइचा सब जलतें हैं। नदी-तालाब को भी प्यास लगती है। इसी जेठ में चैत का अंखुआया पौधा प्रचंड धूप से खुद को बचाता है। और एक दिन ये मौसम मन को उजाड़कर धीरे से तब चला जाता है।  जब दूसरे दिन देखते ही देखते आसामान काला पड़ जाता है।

बादल घिर आतें हैं। एक महीने की गर्मी से अतृप्त मन आसमान की ओर बड़ी उम्मीद भरी कातर नेत्रों से देखता है। तपने के बाद भीगने का सुख कोई कैसे कहे..?

आम के बगीचे में आम और लीची की रखवाली करते  रामकैलाश को उनकी बेटी याद आती है। किसान सोचता है,”हे काली माई डीह बाबा बस इस बार फसल अच्छी हो..तुम्हारे यहाँ बाजा बजवाऊंगा..

वस धान की बोआई ठीक से हो जाए..की बेटी को विदा कराके गाँव लाऊं..कुछ न हो तो जरा हाल-चाल ले आऊं।”

इसी उम्मीद में एक दिन धान का बीज लगता है। और कुछ दिन बाद रोपनी शुरू हो जाती है।

सारे खेत हरियर ताज़गी से भर जातें हैं। बारिश होती है..मेघ गरजतें हैं.. रोपनी करने वाली बनिहारिने माथे से लट को हटाकर,साड़ी का पल्लू कमर में बांधकर गा उठती हैं..

“शिव शंकर भोला दानी हो..
कब सुनब अरजी हमार..!”

“जय हो औघड़ दानी..तोहार महिमा केहू न जानी”
हे शिव जी खेत में काम करने वाला हो या ऑफिस में सावन में सबको उम्मीदे शंकर भोले दानी से ही तो हैं।

सिर्फ खेत और ऑफिस में  काम करने वाले को ही नहीं,सावन में एक बेटी को भी उम्मीद है कि हे शिव जी ब्याह हुए फागुन से आज चार महीना ब्याह हुए हो गए,नइहर की खबर लेकर कोई नहीं आया…मां ने चिट्ठी में लिखा तो था कि बाबा जाएंगे.. लेकिन कहीं उनकी तबियत खराब हो गई हो तो ?

बेटी का मन तरह-तरह की शुभ-अशुभ कल्पनाओं से डरता है। इधर जैसे-जैसे सावन बीतता है..वैसे-वैसे बेटी का  इंतज़ार बढ़ता जाता है..उंगली पर दिन गिना जाने लगता है। की अब कोई नइहर से आएगा..छोटा भाई आएगा राखी बंधवाने..बड़े भैया आएंगे..भौजी की खबर लाएंगे..बाबूजी आएंगे अम्मा का हाल-चाल बताएंगे.

जरा बताएंगे पीपर पाकड़ का हाल,बताएंगे कि गाँव की बुढ़िया आजी का दमा ठीक हुआ कि नहीं ?

नदी पर पुल बन गया कि अब भी बरसात में तैरकर जाना पड़ता है। इमली का वो बड़ा पेड़ है न कि कट गया ?

कैसी है मनोहरा की पतोह.. लौकी बोई है कि नहीं ? दुबराई है कि मोटा गई..लालमुनि की गइया ने बछिया दिया है कि नहीं.. ? माई आजकल इतना उदास क्यों रहती है ? कह देना की मैं ठीक तो हूँ.. कुछ तो नहीं हुआ। किसकी सास नहीं बोलती रे पागल, किसकी ननद से झगड़ा नही होता ? अरे! मेरी माई.. दामाद तुम्हारे साक्षात राघव जी हैं..वो ठीक हैं तो सब ठीक हैं।”

बेटी ये सब सोचती है..और कभी मुंडेर पर बोल रहे कौए को तो कभी दरवाजे के हिलते परदे को बार-बार देख आती है। कभी सोच लेती है कि भाई को बनाकर क्या खिलाएगी.. बाबा को ये पसन्द आएगा की नहीं ? वहाँ थी तो पापा को मैं ही तो खिलाती थी। अब न जाने कैसे खाते होंगे।

कभी ये सोचती है कि चलो मान लो अभी कोई गाँव से आ गया तो चेहरे से अपने ग़म को कैसे छिपाएगी। सच है कि ससुराल में जरा दुख  है। लेकिन भाई जान जाएगा तो मां पर क्या बीतेगी ? पापा तो अपनी चिरइया का हाल देखकर बीमार ही हो जाएंगे।

अचानक उसका मन विद्रोह करता है। दिल से आवाज़ आती है, “नहीं वो इतनी कमज़ोर नहीं है।” आँसू पोछकर शीशे में मुँह देखकर मुस्करा उठती है

खिड़की से आने वाला रास्ता दिखता है..सामने बगीचा..हरे-भरे पेड़..खेतो में रोपनी करतीं बनिहारीनें.. ननद के हाथों पर मेंहदी।जेठानी के मुंह से फूटती कजरी..

“सइयां मेहंदी मंगा द मोतीझील से
जाके साइकिल से ना..”

लेक़िन इन्हीं मोहक कल्पनाओं के बीच किसी बेटी को पता चले कि इस बार सावन में उसके गाँव पर न उसके भैया ही हैं न ही बाबूजी..पता कौन आएगा..तब क्या होगा..? क्या बीतेगी उस पर ?

अरे! सबकी किस्मत एक जैसी नहीं होती है न! विधना का विधान भी तो है….बहुतों के भाई ही नहीं होते की वो सावन में बहन से राखी बंधवाने आएं।बहुतों के बाप चलने फिरने में असमर्थ  रहते हैं। बहुतों का भाई इतना छोटा होता है कि वो आ ही नहीं सकता।

बहुतों के भाई राखी वाले दिन भी दिन-रात ड्यूटी करते हैं और बहन की भेजी राखी को ख़ुद से बाँध लेते हैं। बहुतों के भाई विदेश में होते हैं,उन्हें छुट्टी नहीं मिलती।

लेकिन बेटी का मन करे तो क्या करे..साल में एक बार सावन आता है..एक बार ही राखी..इंतज़ार न करे..उम्मीद न करे तो क्या करे..मन को इतनी आसानी से कैसे समझाए ? कैसे मान के कि सावन में उसके गाँव से कोई नहीं आएगा, उसे ले जाने,उसका हाल-चाल लेने।

दुःख और बढ़ जाता है जब देखती है कि उसी घर में देवरानी के घर से बाप भाई सब आए हैं और उसके घर से अब तक कोई नहीं.. ? क्या होगा ईश्वर ?

क्या बीतेगी उस पर।

लोग क्या जानें नइहर का दुःख। वो तो बस अगले ही दिन से ताना देना शुरू करेंगे। सास-ससुर देवरानी-जेठानी और ननद यही तो सोचेंगी कि इसके नइहर वाले इसका हाल-चाल लेना भी ठीक नहीं समझतें हैं। बुलाने तक कि तो छोड़ो सावन में कोई झांकने नहीं आया..

बेटी क्या करेगी ? रोने के सिवा और कोई चारा है क्या ?

क्या जरूरत थी ऐसे सावन के आने की..?

अब तो बेटी आंसू को स्याही बनाकर चिट्ठी ही न लिखेगी कि “हे माँ देखो न सावन आ गया। हो सके तो भेज देना किसी को। उसको छूकर मैं छू लूँगी गांव को। देख लूँगी उसकी आँखों में झांककर की तुम ठीक तो हो। बाबा का हाल जान जाऊँगी। देख लूँगी झूला कैसा है,जो पिछले सावन में लगाकर चली आई थी। मेंहदी का पेड़ बड़ा हुआ की नहीं ? मेरे आने के बाद छोटी ने पानी डालना तो नहीं बन्द कर दिया ?

बेटी की कलम चलती है। इधर इस करुण कल्पना से मन ऐसा पसीजता है कि नेपथ्य में अमीर खुसरो गा उठतें हैं।

“अम्मा मेरे बाबा को भेजो री की सावन आया..”

लेकिन क्या हो कि अगले दिन माँ को पत्र मिले.. और पत्र पढ़कर मां की आँखों में भादो की काली छाया घेर ले। मन असहाय होकर रो उठे। सांसे थम जाएं..

माँ कैसे कहे कि बाप बूढ़ा हो गया। भाई पढ़ने चला गया। आस-पास किससे कहे कि जावो जरा, हमारी चिरईया का हाल-चाल लेते आओ… मिठाई रखा है..नई साड़ी लाई हूँ.. हरी-हरी चूड़ियां और लाल बिंदी भी हैं।साड़ी और लड्डू -कसार, बुनिया भी। आम का मीठा अंचार खूब खाती थी वो भी तो रखा है। दे आवो उसे.. देख आवो कैसी है..कहीं रो तो नहीं रही ?

मां ये सब कहते हुए रोती है। और आंसू पोछती है। खुसरो फिर मां के कंठ से गाते हैं..

“बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री, के सावन आया,”

“हे बेटी मैं चारो ओर देखकर थक गई.भाई तेरा छोटा है,बाप बूढ़ा हो गया..कोई नही जाने वाला..अपना दुःख मैं किससे कहूं…बस तू वहां ठीक रहs यहाँ पर सब ठीक है।

आगे क्या कहूँ तुम्हारे बिना गइया उदास रहती है..बुढ़िया आजी का दमा क्या ठीक होगा..तुझको याद करके रो पड़ती हैं। लालमुनि की माई तो रोज हमसे पूछती हैं, “कहो बबिता का हाल” ? कैसी है ? मनोहर बो कल ही कह रही थी कि वो जिस दिन मामी बन गई,उसी दिन तुझे साड़ी भेजवाएगी।

हे ! बेटी जाने वाला तो कोई नहीं। यहीं से आशीष है तुझे, मां की दुआएं गाँव की मिन्नते सदा तेरे साथ हैं। मैं कल रहूं या न रहूं सदा तेरे साथ रहेंगी। तू सावन की तरह खिली रहे।

न जाने क्यों ? हर साल मां-बेटी के ये करुण मनोभाव को उदास कर जातें हैं।मन सोचकर बस बेचैन सा हो उठता है।

ये जानते हुए भी कि अब वो दौर नहीं रहा। न ही आज किसी बेटी को सावन में ज्यादा इंतज़ार करने की जरूरत है। न ही किसी मां को बार-बार रोने की।

अब संचार के साधनों नें दूरियाँ मिटा दी हैं। एक क्लिक पर सब लोग उपलब्ध हैं ।

आज फेमिली ग्रुप बनाकर मिनटों-मिनटों क़ा ब्योरा लिया जा रहा और दिया जा रहा है।

फेसबुक,व्हाट्सएप,और बढ़ते बाजारवाद ने सावन के इंतज़ार,राखी के त्योहार, झूला और कजरी के मनुहार में छिपी संवेदना की उष्मा को धीमा जरूर कर दिया है।

लेकिन उसके मर्म को कोई खतम करने की ताकत भला किसी में है क्या ?

शायद नहीं

बस समय बदलता है। प्रेम का ढ़ंग बदलता है। लेकिन प्रेम का रंग नहीं बदलता।

प्रेम का रंग सावन की तरह उतना ही गाढ़ा,उतना ही निर्मल होता है। और सदा रहेगा।

तभी तो आज भी गाँव में सावन में पहले बेटी को राखी के अलावा कपड़ा-मिठाई भेजने की परंपरा जिंदा है। जिसे पूर्वांचल में तीज भेजना कहतें हैं।
जिसे भेजकर मां खुशी के मारे नहीं अघाती.. जिसे पाकर बेटी फूले नहीं समाती। बाप बेटी का समाचार जानकर चैन से सोता है। भाई बहन की खुशी सुनकर  डबल ड्यूटी करता है।

ये सच है कि आज परंपरा पर आधुनिकता की लाख छाया हो लेकिन लोक के इस संवेदना की यही विशिष्टता उसे सदा प्राणवान और जीवंत बनाती है।

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