एक प्राचीन देश की यात्रा

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इधर ज़िन्दगी की रेल महीनों से बेपटरी हो चुकी है। समझ नहीं आता कि हॉल्ट कहाँ है और जंक्शन कहाँ..उतरना कहाँ है और चढ़ना कहाँ ?

आज आगरा से वापसी है। घड़ी में देख रहा दिन के ग्यारह बजने को हैं। लूह ऐसे चल रही है मानों हवा में माचिस की तीलियाँ जल रहीं हों।

देख रहा मरुधर एक्सप्रेस कत्थक करती चल रही है। यात्री गण मगन हैं। एक सीनियर सिटिजन एक बालक को समझा रहें हैं कि जवानी में कौन-कौन सा काम नहीं करना चाहिए…और कौन-कौन सा जरूर करना चाहिए..

बालक टिक-टाक के वीडियो देखकर उनको समझा रहा है कि जवानी में कुछ करना चाहिए या नहीं करना चाहिए ये तो बात की बात है। लेकिन बुढ़ौती में चुप रहना चाहिए..ये सबसे बड़ी बात है।

इधर सामने वाली सीट पर एक दिल जला आशिक शौचालय में बीड़ी पीने के बाद सरस सलिल में “ढाबे वाली रात” और “प्यासा ड्राइवर” वाली कहानी को तीन बार पढ़कर उकता चुका है।

और अचानक मोहम्मद अजीज की शरण में जाकर तेज़ आवाज़ में एक दर्दीले नग़में से छेड़खानी कर बैठा है। फलस्वरूप ट्रेन का ये डिब्बा नब्बे के दशक वाला छत हो गया है..जिसमें गाने बजाने वाले को पूरा विश्वास रहता है कि उसकी महबूबा अपने घर पर पक्का ये गाना सुन रही होगी..

“तुम्हें दिल से कैसे जुदा हम करेंगे..
की मर जाएंगे हम…क्या हम करेंगे”

आशिक मानों रो रहा है।

मेरे मन में आता है कि सरस सलिल के पन्नों को फाड़कर उसके आंसू पोछ दूं और समझा दूँ कि “बबुआ तुम काहें मरोगे बे…? जिस मोहब्बत को “कल्याण” समझकर पढ़ रहे थे.. वो दरअसल “सरस सलिल” ही है।…..

अरे! अब भी समय है बाहर निकल जावो.. उसकी यादों को किसी दियरखा पर रख दो..जाड़े में अलाव जलाने के काम आएगी..और कुछ नहीं तो चार खांची माटी फेंककर उस पर बैठ जावो… थोड़ा मोहब्बत के पैरों को आराम मिलेगा।

तब पीछे वाली सीट से अचानक सुनील शेट्टी न जाने क्यों चीखनें लगतें हैं।

“उस चिता से उठता धुंआं तुम्हारे प्यार का ही होगा।”

समझ नहीं आता कि मरुधर एक्सप्रेस बनारस जाने वाली है या नब्बे के दशक में उठाकर कहीं पटकने वाली है।

मोहब्बत के इस चिंतन को विराम लगता ही है कि कि अचानक कानों में आवाज जाती है…

पानी-पानी

मैं पानी की तलाश में खिड़की से झांकता हूँ…बिसलेरी की जगह बिलेरी की बोतल के बीस रुपया देकर,आईआरसीटीसी और इस पानी बेचने वाले
बिलेरी कम्पनी के एमडी सीईओ को नमन करके जैसे ही आँख खोलता हूँ तब तक.. सहसा नज़र रेलवे स्टेशन के नाम पर रुक जाती है।

अमेठी..

हाय!

दिल श्रद्धा से झुक जाता है।

भारत की राजनैतिक राजधानी..

अरे! अमेठी आ गए हम..

सहसा विश्वास नहीं होता।

न जाने कितने दिनों से अरमान थे दर्शन के…सोचता था दूर से ही दर्शन हों.. लेकिन हों।

तब तक यात्रियों में खुसर-फुसर मच जाती है।

मानों आज सबमें राजनैतिक चेतना का उत्थान हो गया हो..देख रहा मेरे सामने थोक के भाव अर्नब और कुछ राजदीप बैठे हैं। मारे हल्ला के अंजना ओम कश्यप का गला सुख रहा है। सुधीर चौधरी अपना डीएनए भूल रहें है।

अभिसार शर्मा ट्रेन में ही गेंहू की जगह धान काट रहें हैं। सिद्धार्थ वरदराजन मौलाना अंसार रजा की दाढ़ी बना रहे हैं। और न जाने कितने विश्लेषकों को बोलने का मौका नहीं मिल रहा..

मेरा हाल तो यारों का यार राजा रवीश कुमार हो जाता है।

लेकिन आँखें खुल जातीं हैं।

सामने देख रहा अमेठी रेलवे स्टेशन है। इसे देखकर लगता है कि सच में हम एक प्राचीन देश के वासी हैं। और चांद पर पुदीना भले हम बो लें लेकिन हम अपनी पुरातनता से खिलवाड़ कत्तई नही कर सकते।

स्टेशन पर भरसक अपनी प्राचीन विरासत को बचाने का प्रयास किया गया है। मानों अंग्रेज रेलवे स्टेशन बनाकर अभी-अभी बस घर जा रहें हैं।

स्टेशन की छत सिर्फ छत नही लगती..न ही दीवारें सिर्फ दीवारे…ऐसा प्रतीत होता है कि रेलवे स्टेशन के आगे राजकपूर बैलगाड़ी में बैठे वहीदा रहमान का इंतज़ार कर रहें हैं।

अलबत्ता पीयूष गोयल जी ने चौथी कसम खाते हुए इस प्राचीनता से खिलवाड़ करने की भरपूर कोशिश की है। कई जगह तोड़-फोड़ कर दी है। जिसकी मुझे निंदा करने का मन करता है।

और कहीं पीयूष गोयल मिलें तो कहूँ की रेलवे स्टेशनों ने क्या बिगाड़ा है श्रीमान जो देश के हर रेलवे स्टेशन को आप तोड़े जा रहें हैं ?

अरे! इस तोड़ने वाली सरकार का तोड़ना कब रुकेगा.. ? ये समाज तोड़ रही,देश तोड़ रही। और अमेठी जैसी अभूतपूर्व प्राचीन विरासत को भी नहीं बख्स रही है। इसे इस बार जाना ही चाहिए…

हमें ये तोड़ने वाली सरकार नहीं, हमें जोड़ने वाली सरकार चाहिए..जो हमारी प्राचीन संस्कृति को हमसे जोड़े रखे… उस पुरातनता की अलौकिकता को बचाकर रखे…

देख रहा ट्रेन खुल चुकी है।

अब सारे राजदीप बहस करके अर्नब के साथ खैनी खा रहें हैं। आशिक सरस् सलिल से मुंह तोपकर सो चुका है। मिट्टी के घरों के आगे बनें पक्के शौचालयों की दीवारों पर एक-एक करके संजय गाँधी, राजीव गाँधी और राहुल गाँधी मुस्करा रहें हैं।

एक बुजुर्ग अभी भी शांत नही हुए हैं.. “अरे! सर आप का बात करेंगे…संजय जी के जमाने से हम देखते आ रहें हैं…

अरे! पाँच साल में एक बार आकर कह जातीं हैं…भइया को जीता देना.. नौकर हैं हम का..

दूसरा कह रहा है..शरम करिये..

एक विश्लेषक अभी भी मजा ले रहा है..अरे चश्मा लगाकर उनका नाक देखिये…छोड़िये ये सब।

मैं उस बहस से उठकर खिड़की पर आ जाता हूँ।

मन में आता है कि माइक लेकर चिल्ला दूँ.. अमेठी वालों- ज्यादा मंडुआडीह स्टेशन मत बनो…अपनी इस प्राचीन विरासत को बचाए रखो..इसे जिंदा रखो..

अपनी इस वैभवशाली विरासत की स्मृति को जिंदा रखना है तो किसी स्मृति के चक्कर में मत चक्कर में पड़ो..तुम्हें वायनाड की कसम है।

ट्रेन लय में आ गई है…

जैसे-जैसे तेज होती जाती है। दिल की धड़कन बढ़ती जाती है। थकान से आंखें बन्द हो रही हैं।

और उन बंद आंखों में भारत का भविष्य काफी अंधकारमय और लोक तंत्र खतरे में दिख रहा है।

बस ईश्वर न करें…कहीं ईवीएम हैक हो जाए।

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