आँगनबाड़ी वाली भौजी ( स्त्री विमर्श की एक कथा )

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गाँव के बाहर पुल पर बैठे पश्चिम टोला के बबलूआ ने नन्हकू बो भौजी को देखते ही मोबाइल कि आवाज को बढ़ाया गनवा उहे था.जिसमें महान अश्लील गायक सीरी खेसारी लाल जादब जी अपनी बेसुरी आवाज में खूबसूरत गाने का घटिया प्रयास कर रहे थे.

“एक हजार के नोकरी प……..दू हजार के साड़ी
आँगन बाड़ी रे दिहली स……घरवा बिगाड़ी ।”

गाँव का एक-एक लौंडा जानता है कि नन्हकू बो भौजी प इ गनवा एकदम सटीक बैठता है.बबलूआ भी जानता था कि ई साडी आ लिपस्टिक संग लिपलाइनर में कटाह लग रही भौजी के पीछे खाली आँगन बाड़ी का मामूली तनख्वाह नहीं है.इ रंग तो बच्चों के लिये आये पुष्टाहार अउर नमकीन,बिस्कुट बेचकर चढ़ा है.

हई महंगा मोबाइल,पर्स आ महंगे ब्यूटी पार्लर में कटे भौजी के बालों देखकर कोई विश्वास नहीं करेगा कि नन्हकू दिन भर जीप की डराइबरी करतें हैं.लेकिन गाँव जानता है कि भौजी के रोज रोज नेताइन बनने के चक्कर में जिला पर होने वाले खर्चे का जुगाड़.आंगनबाड़ी के दलिया,चूरा,भूजा,बर्तन,कॉपी,किताब.,कलम बेचकर ही होता है.

बस कथा से पहले आपको बता दें कि हमारे यहाँ आँगन बाड़ी वह केंद्र है.जिसमें आँगन उसी तरह से गायब होता है जिस तरह आजकल ‘समाजवाद’ से समाज गायब है.
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मल्लब साफ़ शब्दों में कहें तो आँगन बाड़ी वह बाड़ी है,जहाँ पढ़ाई छोड़कर सब कुछ होता है.यहाँ तक की.. घोटाला ,लूट,खसोट और मन चरचा से लेकर शिवचर्चा भी।

रोज कोई बबलूआ भौजी को छेड़ता है.बाकी नन्हकू बो भौजी चवनिया संग अठनिया मुस्की काटकर अपने पर्स से सतरह हजार वाला मोबाइल निकालतीं हैं..और धीरे से कहतीं हैं…”कम्पनी बाग़ बलिया  पहुँचीये …कहिये सब से नारा  वारा लागायें.”आँगन बाड़ी जिंदाबाद…हमारी मांगे पूरी हों..यूपी सरकार शर्म करो”

भौजी को तेइस मीटर दूर से देखते ही कोई समझ सकता हैं कि आज जिला मुख्यालय पर धरना है.और आज हर गाँव की ऐसी ही भौजाइयाँ अपनी पनरह सूत्रीय मांग को लेकर सरकार क़ि ऐसी की तैसी करने वाली हैं.तीस पर सीएम भी जानतें हैं कि आँगन बाड़ी आ प्राइमरी स्कूल के मास्टर बैठे बैठे तनखाह ले रहें हैं.इनकी मांग पनरह से सतरह सूत्रीय भले हो जाये बाकी विधानसभा चुनाव से पहले एक्को नहीं मानी जायेगी.

इधर धरना कुछ कमजोर हुआ है.मालूम चलल है कि अकलेस भाई शर्म के साथ कुछ  मुलायम होकर ,एक एक ठो टैबलेट अउर साइकिल सब आंगनबाड़ी केंद्रों को देने का वादा किये हैं.इसी ख़ुशी में कल एक और बात पता चला कि नन्हकू बो भौजी के पैर भारी हैं..गाँव के एक चरित्रवान नर्स और अबॉर्शन स्पेशलिस्ट सिमंगल बो ने नन्हकू के कान में धीरे से कहा.”अरे खुश हो जा चौधरी..लगता है इस बार साक्षात एसडीएम साहब आने वालें हैं”.नन्हकू मन ही मन लजाये “अरे का भौजी तूहूँ.नर्स जी ने चोन्हाकर कहा “अरे जा मिठाई ले आवा…

उ गइल जमाना जब यूपी में यादव जी लोग के घर लड़के पैदा होते थे.अरे मन से मोलायम जी के कसम अखबार नहीं पढ़ते का.आजकल खाली एसडीएम पैदा होतें हैं..एसडीएम…नन्हकू मेहरारू जैसी हँसी हंसते हुए मेहरारू संग बाहर निकले.मारे खुशी के गोड़ जमीन पर नही पड़ रहा था.

तब तक का हुआ कि परसों हुआ बवाल..गाँव के किसी लौंडे ने नन्हकू से कह दिया..”तुम दिन भर जीप चलावो…उधर तुम्हारे मेहरी के संगे,सुकदेव चौधरी का लइका परमोदवा शीशमहल सनीमा हाल में ‘निरहुआ रेक्शा वाला’ देखते हुए रेक्सा चला  रहा है.”

तब साहब उस दिन नन्हकू चौधरी अपने पूरे रोआब में आकर दाँत पीसते हुए ठेहुना छूकर वो सब गालियां मेहरी को दे दिए.जो उनकी आजी कभी उनकी माई को दिया करतीं थीं. “हर्रर्र***  रं** कहिं के…हमरा संगे आजतक पांच मिनट वाला भी फिलिम नहीं देखी….अउर उस कमीने के साथ तीन घण्टे…. आज से सब नेताइन बनना अउर बलिया आना जाना बन्द.”

ओह.अब नन्हकू बो भौजी आहत.गहरा आघात..”जो रे परमोदवा. हाय रे निरहुआ तोर माटी लागो.”.अब का करें भौजी.? किसी ने उनको समझाइस दिया कि “देखो आंगनबाड़ी में पढ़ाई वढ़ाई तो होता नहीं.बलिया आना जाना बंद कर उसी में शिव चर्चा करो……शिव जी खुश त….सब पाप खतम।” भौजी को आइडिया बड़ा पसन्द आया….अब भाषण की जगह परवचन करने को मिलेगा.बस साहेब  बूझिये की आजकल आंगनबाड़ी में शिव चर्चा जोरों पर है.

आपको बता दें  इधर शिव चर्चा बिहार से लेकर पूर्वी यूपी उत्तर प्रदेश और बंगाल तक संक्रमित हो चुका है….इसको शुरू करने वाले बिहार के हरेंदर भइया आ नीलम दीदी नाम के दो महात्मन  हैं…..जो त्रेता युग में शंकर जी के साथ मांटेसरी स्कूल में पढ़ते थे.
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ज्यादा जानकारी करनी हो तो आप अतवार के दिन सुबह बलिया से डिएमयू पकड़ लिजिये.गाजीपुर आते आते आपको शिव जी का इष्ट न हो गया तो कहिएगा.

आजकल हर गाँव में काम धाम निपटाकर भर दुपहरिया भयंकर आनंद बरसता है.गाँव की अधिकतर अनपढ़ टाइप की पढ़ी औरतें खूब नाच नाच कर शिव जी को पागल और बउराह साबित करतीं हैं.वहां का गाना बजाना और नाच अगर शिव जी देख लें तो उन्हें तांडव छोड़कर कुछ दिन प्रभुदेवा से डांस सीखना पड़ेगा.लेकिन एक्के संगे जब ढोलक झाल प..

“हरेंदर भइया अइहें हो नीलम दीदी अइहे संगवा में शिव गुरु अइहे  हों..जहाँ होला शिवचर्चा……”

जमता है तो पूरब टोला से लेकर पश्चिम टोला हील जाता है..”धीरे धीरे हो भसुर हो धीरे धीरे.हमरा अंगना में अइहा भसुर धीरे धीरे” के तर्ज पर.धीरे धीरे हो शिव गुरु धीरे धीरे हमरा चरचा में अइहा.गवाता है तो सुनकर एक बार सोचना पड़ता है कि लोकगीतों को सिर्फ अश्लील गायकों से ही खतरा नहीं.शिव जी के चरचा से भी बरियार खतरा है।

कल बबलुआ ने भौजी को देखकर फिर खेसारी लाल जादब जी का गाना गाया……

“एक रुपिया कमाई पर  आठ  आना के खरचा
नन्हकू भइया हो भौजी के ले गइल शिव चरचा”

भौजी ने एक कटाह हंसी के संगे बबलुआ को देखकर बुदबुदाया.”पूरा मउग हवा का?..बबलुआ हंसने लगा और हम सोचने लगे कि इहाँ न नन्हकू बो भौजी का दोष है, न आंगनबाड़ी का,न शिव चरचा का, न हरेंदर भइया और नीलम दीदी का…इ तो अभाव से पीड़ित और दिन रात मेहनत से थकी…पति और ससुर की सताई हुई हुई मजदूर वर्ग कि औरतों को भगवान के नाम पर फुसलाकर अपना धार्मिक धंधा चमकाने की साजिश है.

बस गाना बजाना को शामिल कर दिया गया है…लोकगीत सब गातीं हैं…उसी पर शिव गुरु और हरेंदर भइया नीलम दीदी का भजन गाना है….यहां वो आकर कुछ पल सब सुख दुःख भूल जाती हैं.उनको शिव गुरु रहें चाहें चेला रहें उससे का मतलब.

उनके पास न अभी स्मार्ट फोन है,न टीवी,न कायदे  से बिजली,बत्ती,पंखा और न ही ढंग का कपड़ा मिलता है…न  किसी मॉल में जाकर, ठंडा पीते हुये ऑसम फील कर फेसबुक स्टेट्स अपडेट में  500 लाइक और 423 कमेंट पा सकती हैं.बस थोड़ा इसी शिव चर्चा के बहाने और नन्हकू बो भौजी के आँगनवाड़ी के चलते एक उन्मुक्त माहौल मिलता है…कुछ देर जी जातीं हैं बेचारी.भौजी भी आजकल बच्चों वाला पुष्टाहार बेचना बन्द कर उसे शिवचर्चा का प्रसाद बना देतीं हैं….आनंद मंगल हो जाता है |

अरे!.कुछ दिन स्त्री विमर्श का सरकारी टेंडर लेकर चुकीं पुरुष टाइप स्त्रियों को जाकर शिव चर्चा में  देखना चाहिए न..?इससे पहले महर्षि वात्स्यायन इनके उपन्यास पढ़कर कामसूत्र फिर से लिखें.या इनके कहानी में सम्भोग का अलंकारिक वर्णन पढ़कर पढ़कर मस्तराम कि आत्मा पानी मांगने लगे.

इन्हें स्त्री के मनोभावो को फिर से समझना चाहिए न?..कहीं इनसे चूक तो नहीं हो गयी.विमर्श करते करते  पुरुष को स्त्री का सबसे बड़ा दुश्मन बताकर खुद एक लण्ठ पुरुष हो चुकीं इन विमर्शकारों को सोचना चाहिए न कि स्त्री के लिए मनोरंजन भी कोई चीज है..?

उन्हें अब अपने कविता कहानी और उपन्यास में स्त्री के अवैध कामुक सम्बन्धो का साहित्यिक वर्णन कुछ दिन बंद कर देना चाहिए न ? कब तक उनकी कविता,कहानी,और उपन्यास में स्त्री अपना सार्वजनिक गर्भपात करवाती रहेगी ?.वो कब समझेंगी की स्त्री केवल देह नहीं.वो आत्मा है.उसे शारीरिक सुख और शरीर की आजादी से ज्यादा मानसिक और आत्मिक सुख की जरूरत है.एक भावनापूर्ण और प्रेम और सम्मान पूर्ण सम्बन्ध में वो जीना चाहतीं हैं.

अगर नहीं समझती हैं तो ऐसा स्त्री विमर्श दो कौड़ी का है…..जिसे सवा लाख लानतें भेजा जाय तो कम ही होगा…..।

“प्रेम से बोलिये नन्हकू बो भौजी की…जय ।” आंगनबाड़ी जिंदाबाद।

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