सावन में गाँव : कविता,डेंगू और इश्क

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VILLAGE VOICE,VILLAGE STORY,VILLAGE ISSUE
आज गाँव में प्रवेश करते ही सावन ने हमला कर दिया ..देखते ही देखते बचपन में पढ़ी वो पंत जी की कविताएं एक-एक कर याद आने लगीं..आहा…!
“फैली खेतों में दूर तलक
मखमल सी कोमल हरियाली..”

मल्लब कि जिन घासों को बैल और गधे तक नहीं चरते उनका भी सौंदर्य आज देखते बन रहा है. जिन पेड़ों के पत्ते बसन्त की भी नहीं सुनते वो सावन में हरियरी के मारे नाच रहें हैं…
वाह ।..अपने अर्धविकसित गाँव के इस पूर्ण विकसित सौंदर्य को देखकर मेरा मन मयूर नागिन डांस करने लगा..देश की सभी पँचवर्षीय योजनाओं पर फख्र होने लगा..
और थोड़ी देर में ही ग्राम प्रेम के वसीभूत होकर भीतर से पंत,निराला,प्रसाद,किट्स,मिल्टन एक-एक कर जागने लगे…सोचा क्यों न एक लाइन मैं भी कुछ कहूँ… रामाधीन भीखमखेड़वी स्टाइल में ही सही..दो लाइन चिपका ही दूँ….

लेकिन साहेब.. कभी-कभी कविता न लिखना भी साहित्य जगत में बड़ा योगदान देना है.
सो इस रोमांटिक मौसम में कवि बनने के बिजनेस से ज्यादा मैने गायक बनना उचित समझा…
और गुनगुनाते हुये थोड़ी देर बाद समझा कि हिंदी के पुरस्कृत कवियों ने गाँव की कविताएँ शहरातीयों के लिए ही तो लिखीं हैं…लोग शहर में रहकर गाँव को महसूस करें..
गाँव के लोगों को कविता लिखने और उसे पढ़ने की फुर्सत कहाँ है..

अब देखिये न… क्या ख़ाक कोई कविता पढ़ेगा.. काहें की मखमल सी कोमल हरियाली और काहें का सावन..
कल दो लोग मलेरिया से ग्रस्त होकर शहर के अस्पताल में भर्ती हैं..सुखबेलास का छोटका बबुअवा को तो डेंगू का लक्षण लग रहा..काली माई डीह बाबा उसकी रक्षा करें..
और मात्र चार दिन से गांव में बिजली नहीं आई है….
आती भी है तो दो-चार मिनट के लिए, ताकि गाँव के लोग ये न कहें कि हमारे गाँव में बिजली के खम्भे और तार नहीं हैं. ..
कल पता चला आटा चक्की भी बन्द है..लोग दूसरे-तीसरे गाँव में गेंहू पिसवाने जा रहे हैं…मोबाइल चार्ज कराने के लिए दस रुपया में जनरेटर जिंदाबाद है..

उधर हमारे अखिलेश भाई फिर से एक बार कह रहे हैं कि…”इस बार हम लर्निंग सीएम थे. एक बार फिर सीएम बनवाइये..इस बार चौबीस घण्टा बिजली देंगे”.
पिछली बार भी यही कहे थे..शायद उस बार कहना सिख रहे थे..

खैर बिजली आएगी या नहीं लेकिन इस बरसात में गाँव की गलीयों में अनगिनत समाजवादी गड्ढे हो गये हैं..जिनमें रात के अँधेरे में गिरने पर समाजवाद से सीधा साक्षात्कार हो जाता है..और दिल अपने आप लोहिया,जेपी, और मन से मोलायम जी के चरणों में झुक जाता है..
तब यही गाँव चिल्लाता है…
“काश हम सैफई होते…”
पर हाय! रे उसकी किस्मत…..पता न किस कलम से लिखी है सरकार ने…

हाँ… अन्धेरा होते ही यही रोमांटिक सा सावन भादो की काली और डरावनी रात में बदल जाता है..तब शहर में रहकर कविताई करने वालों की सारी कविताएँ सांप-बिच्छु और चोर के डर से काँपने लगती हैं…
छोड़िये महराज… इधर आइये जरा….

देखिये न हमारी खेदन बो भौजी कल से परसान हैं..रोपनी करा के खेदन गए तो बेमार पड़ गये..भौजी मना करते रह गयीं..”ए जी बेबी के पापा. तनी दू चार दिन रह-सह के जाइए न..
तनिक आराम कर लिजिये..अरे! दुनु टाइम गरम-गरम दू गो परवठा आ नेनुआ के तरकारी खाइयेगा हमार हाथ से..नवेडा जाकर तो खिचड़ी खाकर ओवर टाइम करना ही है..”
लेकिन खेदन काहें माननें जाएं..उनको तो नोट छापने की जल्दी थी…चले गये..
अब भौजी उदास हैं…न मेंहदी लगाई हैं न, चूड़ी पहनी हैं….केकरा पर श्रृंगार करें…कौन है देखने वाला…जा रे तहार नवेडा…
अब देखते हैं कि नइहर से तीज लेके कवन आता है..भाई को फरीदाबाद राखी भी तो भेजना है…
इसी में काली माई,डीह बाबा,बरम बाबा की पूजाई करनी है…बड़ी लोड है भौजी पर..

इधर पिंकिया ने कल मंटुआ को फोन किया…

-ए मंटू
का जी
-सुनो न
का बोलो
-बक….लाज लग रहा
अरे..अरे बोलो न..मेरी सिया सुकुमारी..
-कह रहे न
का ?
-कल हम न ममतवा संगे रेवती आएँगे..तुम भी आओ न..
अच्छा..क्या करने रेवती जी?

-अरे राखी न खरीदना है बबुआ..
किसलिए
-नहीं जानते का
नहीं..
-तुम्हारे लिए
बक
-हाँ सच में….अब जल्दी से मलेटरी में भर्ती होकर बियाह नहीं करोगे तो का करेंगे हम? राखी बांधकर तुमको मामा बना देंगे…फेर
मुंह में कमला पसन्द और रजनी गन्धा खाकर अल्ताफ राजा का गाना सुनना…
हम चले जाएंगे रोते हुये किसी बीटेक्स वाले के संगे..

हाय!…जा रे दरद..पता चला है कि मंटुआ इस धमकी के बाद चार बजे भोरे उठ कर दौड़ रहा है…दूपहरिया में भी डंड,बैठक रियाज मार रहा है..रात को ग्यारह बजे तक पढ़ाई कर रहा है..
माई-बाबूजी परेशान हैं कि “आखिर लौंडे को हो का गया है…जो डांटने-समझाने और बड़ी मारने-पिटने पर भी नहीँ पढ़ा वो आज अपने आप..”
माई बाबूजी का समझे कि प्यार में आदमी आन्हर हो जाता है..
खैर भगवान से मनाइये डीह बाबा मंटुआ का मनकामना पूरा करें..

बाकी सब ठीके है..घर आने के बाद पड़ोस में वही पारम्परिक सवाल..कहिया ले पढ़ोगे और माताजी का वही सुझाव..तनी खाने-पीने पर ध्यान दो बबुआ ?

पड़ोस में जो देखता है..कुर्सी निकालता है..”बईठ बबुआ..”
कई बार पूछने का मन होता है..
“काहें कुर्सी भाई..कवन विशिष्ट अतिथि हैं हम..रिश्तेदार..की अजनबी अतिथि जैसा व्यवहार किया जा रहा…”

लेकिन कुर्सी पर बैठते हुये सोचते हैं..कुर्सी निकालने वालों का क्या दोष..
कमबख्त मेरे और कुर्सी के बीच में वो बनारस न आ गया है…और वो तरह-तरह की चर्चाएँ..”गाँव का नाम यही लड़का रोशन करेगा..”
बक महराज… रोशन की ऐसी की तैसी
आज फिर हिंदी के मेरे प्रिय कवि केदारनाथ सिंह जी के उस कविता की वो लाइन याद आ गयी हैं. जिसको कभी उन्होंने अपने गाँव चकिया आने पर लिखा था..

“किस तरह मिलूं की…
बस मैं ही मिलूं
और बीच में दिल्ली न आए..

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